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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 524

From जैनकोष



तन्नास्ति जीवलोके जिनेंद्रदेवेंद्रचक्रकल्याणम्​ ।

यत्प्राप्नुवंति मनुजा न जीवरक्षानुरागेण ॥524॥

करुणा के अनुराग का परिणाम कल्याणकारी ― इस जीवलोक में ऐसा कुछ भी कल्याण नहीं है जो जीव रक्षा के अनुराग से न प्राप्त हो । जीवदया का भाव हो तो समस्त कल्याण इस जीव को प्राप्त होते हैं । यह बात कैसे प्रारंभ की जाय ॽ किन जीवों से यह बात प्रारंभ की जाय ॽ तो मनुष्यों से प्रारंभ कीजिए । हमारा बर्ताव व्यवहार ऐसा हो कि मुझसे किसी मनुष्य को मेरी परिणति के कारण पीड़ा न हो । यों तो यह संसार है । हम कितना ही अच्छा चलें फिर भी लोग ईष्या से, स्वार्थबुद्धि से, कषाय से, कल्पना से कुछ भी विचारकर दु:खी होंगे । तो यों दु:खी हो तो हों लेकिन ऐसे दु:खियों के प्रति भी हमारे अभयदान की भावना हो, ये निर्भय हों और सुखी हों । कितना विशुद्ध आशय होता है ज्ञानी का ।

ज्ञानी का विशुद्ध आशय ― किसी के द्वारा कितने ही विरोध और आक्रमण हों फिर भी यह सब जीवों का कल्याण ही चाहता है क्योंकि ज्ञानी यह जानता है कि जो लोग मेरे विरुद्ध अथवा मुझ पर आक्रमण करते हैं कि इन जीवों का मूलस्वरूप में कोई अपराध नहीं है । जो जीव आज मेरे प्रतिकूल है, जो मनुष्य मेरा विरोध करते हैं, वे स्वरूप से तो प्रभु की ही तरह हैं, शुद्ध चैतन्यस्वरूप ही हैं, पर उपाधि का कर्म का ऐसा संबंध है, उनमें औपाधिक भाव ऐसे जागृत होते हैं कि यह विचार भूल गया और इस प्रकार की परिणति करता है । यह विरोधी जीव भी मेरा विरोधी नहीं है । इसका कर्मवश ऐसा परिणमन हो गया है । ज्ञानी जीव ऐसा विचार करता है इस कारण वह किसी भी जीव को विरोधी और बैरी नहीं मानता, महात्मत्व तो यही है । जैसे निकट काल में हुए नेतावों की भी दृष्टि कुछ परखी होगी । महात्मा गाँधी जैसे महापुरुष ने इतने आंदोलन किया कराया । सब कुछ करने पर भी अपने शासकों पर कभी बैर विरोध की बात मन में नहीं लाये । और, सोचा कि ये मेरे न विरोधी हैं, न बैरी हैं, न दुश्मन हैं किंतु न्याय चाहते हैं । न्याय पर ये भी आ जायें, न्याय पर हम भी रहें । केवल एक न्यायप्रिय थे । तो सोचिये कि जिस जीव को आत्मा के स्वरूप का यथार्थ परिचय हो गया है वह किस आत्मा को अपना दुश्मन समझेगा ॽ सब ज्ञानस्वरूप हैं, मूल में कोई अपराधी नहीं । उदय ऐसा है, कषाय ऐसी जगी है, अत: परिणति यों बन बैठी है । मेरा जगत में कोई भी जीव बैरी नहीं है । ज्ञानी पुरुष यों सब जीवों के स्वरूप में हिल मिलकर एक रस बनकर निर्विकल्प होकर अपने आपमें अनंत आनंद का अनुभव करते हैं ।

शुद्ध आत्मस्वरूप का शरण ― यहाँ सारभूत बात इतनी समझना कि मेरा शरण मेरे शुद्ध आत्मस्वरूप का ध्यान है, अन्य कोई शरण नहीं है । यह बात इतने दृढ़ निर्णय के साथ जानें जिसमें रंच भी संदेह का स्थान नहीं है । न परिजन, न मित्रजन, न शासन, न शासक, न वैभव, न देह कुछ भी मेरे लिए शरण नहीं है । ये सब विनाशीक हैं, मोहनिद्रा के स्वप्न हैं । आज लोगों की मान्यता में कुछ हम बढ़ गये तो यह बढ़ना क्या चीज है ॽ कभी बढ़ना एकदम मिट भी सकता है और जितने समय बढ़ा हुआ भी है उतने भी समय आत्मा में कौन सी ऋद्धि सिद्धि मिल गई ॽ शांति तो निर्विकल्प दशा में ही प्राप्त होती है । संबंध में, समागम में, शांति का लाभ नहीं होता । तब समझिये आत्मा का ध्यान ही वास्तव में मेरे लिए शरण है । हमें आशा रखनी चाहिए आत्मध्यान से ।

आत्मा के ध्यान में सहायक प्रभुहित ― आत्मा के ध्यान में सहायक प्रभु के गुणों का स्मरण है इसलिए केवल दो ही तत्त्व शरण हैं ― प्रभु की भक्ति और आत्मा का ध्यान । दो के सिवाय अन्य किसी भी बात से अपने कल्याण की, सुख की आशा न रखिये, और अपना जीवन चाहे किसी परिस्थिति से गुजरे, कितने ही संकट गुजरें, कितने ही आराम में आयें लेकिन दो बातों की प्रधानता न छोड़ें तो अपना भविष्य नियम से सुंदर है और जहाँ प्रभुभक्ति आत्मस्मरण इन दो बातों की सुध खो दिया, चाहे लौकिक वैभव कितना ही इकट्ठा हो जाय, कुछ भी प्राप्त हो जाय इससे आत्मा को कुछ भी न मिलेगा, आत्मा का कुछ भी उद्धार न होगा । 24 घंटे का टाइम है उसको फाल्तू बातों में बिताना कोई विवेक का काम नहीं है । इस 24 घंटे के समय में दो चार मिनट तो अपने आत्मा की सुध लें ।

अहिंसा से सर्वपदों की सिद्धि ― यह मैं आत्मा समस्त परद्रव्यों से न्यारा, सचेतन अचेतन परिग्रहों से जुदा, इस देह से भी विलक्षण, रागादिक भावों से भी विविक्त, केवल ज्ञानानंद स्वरूपमात्र मैं आत्मा हूँ । जो मैं हूँ वह केवल हूँ ऐसी विविक्त ज्ञानानंदस्वरूपमात्र आत्मा की दृष्टि जगे, इस अंतस्तत्त्व के आश्रय में सब समृद्धि बसी हुई है, यह काम न छूटे चाहे कितनी ही परिस्थितियाँ आयें । यही अहिंसक जीवन है, और जिसका अहिंसक जीवन है अर्थात्​ स्वपरजीवों की रक्षा का अनुराग है उसको समस्त कल्याणपद प्राप्त होते हैं । तीर्थंकर होना, देवेंद्र होना, चक्रवर्ती होना जितने भी महान पद हैं वे सब दया के प्रसाद से प्राप्त होते हैं, अर्थात्​ अहिंसा ही सर्वपदों के देने वाली है । इस अहिंसा के प्रसादरूप ही हमें आत्मा की सुध होती है, आत्मध्यान ही हमारा वास्तविक शरण है, रक्षक है, गुरु है ।


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