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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 536

From जैनकोष



असद्वदन वल्मीके विशाला विषसर्पिणी ।उद्वेजयति वागेव जगदंतर्विषोल्बणा ॥536॥

असत्य वाणी में दु:ख की व्याप्ति ― जैसे किसी बामी में महाभयानक विषभरी सर्पिणी निवास करती है और वह अपने आपमें भी बहुत विषकर भरी हुई है और जगत को विष से व्याप्त करके पीड़ा देती है इसी प्रकार असत्य बोलने वाले मुखरूपी बामी में असत्यवाणीरूपी सर्पिणी खुद अपने आपमें विष भरी है और जगत के जीवों में विष व्याप करके पीड़ा दिया करती है । असत्य वचन को विषसर्पिणी की उपमा दी है । जैसे विषभरी सर्पिणी जगत को पीड़ा देती है इसी प्रकार असत्य वाणी भी लोक को पीड़ित कर देती है । घर से ही अनुभव कर लो, घर की स्त्री अथवा पुत्र कोई झूठ बोलता हो तो उस झूठ बोलने वाले पर कितना क्रोध आता है । अपराध भी किया हो किसी ने और वह सच बोल दे तो गुस्सा शांत हो जाता है । अपराध भी माफ कर दिया जाता है । अपराध किया हो और झूठ बोले तो अपराध पर अपराध हुआ और क्रोध बढ़ेगा । तो असत्य वाणी पड़ौसियों को, समाज को घर को सब को पीड़ित करती है । जो पुरुष असत्य बोलते रहते हैं उन पुरुषों को आत्मा के ध्यान की पात्रता नहीं जगती ।

सत्यवादियों के ही आत्मध्यान की पात्रता ― लोक में शरण है तो केवल अपने कारण समयसार का ध्यान, अपने में बसे हुए ज्ञानानंदस्वरूपी प्रभु का ध्यान ही शरण है । शेष जो बाहरी उपयोग भटकता है वह सब भटकन इस जीव को संसार में रुलाने वाली है । उस आत्मध्यान की पात्रता उन ही प्राणियों के होती है जो सत्यवादी हैं, जगत के प्राणियों को हितमयी वचन बोलने में अपना भला समझते हैं ।


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