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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 537

From जैनकोष



न सास्ति काचिद्वयवहारवर्तिनी न यत्र वाग्विस्फुरति प्रवर्तिका ।ब्रवन्नसत्यामिह तां हताशय: करोति विश्वव्यवहारविप्लवम्​ ॥537॥

सम्यक्​ज्ञान ही सत्यवाणी ― देखिये व्यवहार में भी लोग जो कुछ बोलते हैं वह सब स्याद्वाद भरी वाणी है । जैन शासन में वस्तुस्वरूप के विवेचन करने का मार्ग स्याद्वाद बताया है । जैन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है तो वस्तुस्वरूप के प्रतिपादन करने की है ― और कल्याण सब कुछ वस्तुस्वरूप की सही जानकारी पर निर्भर है । लोग हैरान होते हैं कि मोह नहीं छूटता और मोह ही दु:खदायी तत्त्व है और किसी प्रकार का दु:ख ही नहीं मनुष्यों को । सब मनुष्य हैं, अपने अधिष्ठित एक-एक शरीर में रहते हैं, अपने आपमें बसते हैं, इनको कौन सा क्लेश है, पर मोह जो लगा रखा है परवस्तुवों में यह मैं हूँ, यह मेरा है इस तरह की जो कल्पनाएँ चलती हैं वे परेशान किये रहती हैं । मर गए शरीर छोड़कर चल दिया । जहाँ जाने का भवितव्य है चले गए । क्या रहा यहाँ ॽ जिस वैभव में मोह करके इतनी परेशानी उठाई जा रही है उसमें तत्त्व क्या है ॽ सार बात क्या है ॽ किसको दिखाना है कि हम बड़े भारी हैं । ये तो सभी मोही हैं, अज्ञानी हैं, दु:खी हैं, किसको बताना ॽ मोह ही इस समस्त जगत को परेशान किए हुए है । वह मोह कैसे छूटे, इसका उपाय जैन शासन ने सम्यग्ज्ञान बताया है । हम समस्त पदार्थों को यथार्थ भिन्न-भिन्न पहिचान लें । भिन्न हैं सब इसलिए भिन्न-भिन्न जानने की बात कही जा रही है । कुछ तो प्रकट नजर आते हैं । धन वैभव कुटुंब मित्र परिजन ये सब क्या आपके आधीन हैं ॽ रहना है तो रहते हैं, जब जाने का समय होता है तब चले जाते हैं, बिछुड़ जाते हैं, तो वे प्रकट पर हैं । पर को पर जान लो तो तुम्हारी कल्पनाएँ मिट जायेंगी । तुम पर को मान रहे कि ये मेरे हैं, उससे तुम्हारी इच्छा बढ़ती है । ये पदार्थ यों परिणमें, यों बने, ऐसी अनेक इच्छाएँ जगती हैं और उसके अनुकूल बाहर में होता नहीं है तो दु:खी रहते हैं । तो मोह कैसे छूटे ॽ जब वस्तु का सही ज्ञान हो तब मोह छूटे ।सम्यक्​ज्ञान का उपाय स्वाध्याय ― वस्तु के सही ज्ञान का उपाय है स्वाध्याय । जैसे व्यवहार में भी हम किसी पुरुष को जानते हैं तो स्याद्वाद के द्वारा जानते हैं । किसी भी व्यक्ति का परिचय एक मार्ग से नहीं होता, अनेक मार्गों से होता है । जिसे आप रोज-रोज देखते हैं, जानते हैं कि यह अमुक का पिता है, अमुक का पुत्र है, अमुक व्यवसाय वाला है, अमुक प्रकृति का है, आप पचासों ढंग से उसे पहिचानते हैं तो उसकी पहिचान पक्की है । तो ऐसे ही आत्मा की पहिचान भी जैनशासन में पचासों ढंग से करायी है । यह आत्मा अमूर्त है, यह आत्मा कर्मों से बंधा है । यह आत्मा ज्ञानानंदस्वभावरूप है, यह आत्मा वर्तमान में विकारी है, यहि किसी गति से आया है, किसी गति से जायेगा । वर्तमान में इसमें अनंत प्रकार की पर्यायें गुजर रही हैं । सब कुछ हम अनेक ढंग से जानते हैं, इसी का नाम है स्याद्वाद ।

स्याद्वाद से वस्तुस्वरूप का निर्णय ― अपेक्षा लगाकर वस्तु के स्वरूप का निर्णय करने का नाम है स्याद्वाद । जगत में व्यवहार में प्रवर्ताने वाली जो भी वाणी है वह सब स्याद्वादरूप सत्यार्थ वाणी से स्फुरायमान है । लेकिन ऐसी स्याद्वाद वाणी को भी मिथ्यादृष्टिजन जिनका चित्त मोह से व्याकुल हो, असत्य कहते हुए समस्त व्यवहार का लेप करते हैं ।

स्याद्वाद बिना लौकिक कार्य भी नहीं ― देखिये स्याद्वाद के बिना किसी का कुछ काम नहीं चलता । किसी को पैस उधार दिया । अब उसके बारे में आपको दो निर्णय हैं कि नहीं कि यह पुरुष वही है, 6 माह बाद भी आप यह जानते हैं ना कि यह पुरुष वही है जिसको हमने पैसा उधार दिया था ? साथ ही यह भी जानते हो ना कि 6 माह गुजर गए अब समय नया आ गया ? अब इससे ब्याज लेना है और माँगना है । तो ये दो किस्म के ज्ञान हुए कि नहीं ? एक तो हुआ नित्य का ज्ञान और एक हुआ अनित्य का ज्ञान । यदि कोई ऐसा ही माने कि मैं तो वह नहीं हूँ जो आपसे रुपया ले गया था वह आत्मा तो नष्ट हो गया, यह मैं आत्मा दूसरा हूँ तो व्यवहार चल सकेगा क्या ? और आत्मा यदि बदले ही नहीं, उसमें कोई परिवर्तन ही न हो तो भी व्यवहार चलेगा क्या ? पिता पुत्र कुटुंब रिश्ते ये सब व्यवहार हैं, स्याद्वाद के बल पर चल रहे हैं । किसी भी व्यक्ति के संबंध में क्या आप एकांत से कह सकते कि यह बेटा ही है ? यदि ऐसा कह सकते तो इसका अर्थ है कि सबका बेटा है, सब तरह बेटा है, तो व्यवहार कहाँ चलेगा ? तो जिस स्याद्वाद के बल से व्यवहार तक भी चल रहा है, मोक्षमार्ग भी चलता है उस स्याद्वाद का निषेध करते हैं सर्वथा एकांतवादी लोग।

स्याद्वाद शैली से बोले गये वचन सत्य ― उनका कुछ आशय ही नहीं है । जो मन में आया सो बताया । करना क्या है उन्हें यह बात उनको भी विदित नहीं । यदि कोई कहे कि हमको संसार से छूट कर मुक्ति में जाना है तो भला यह बतलाओ कि अपने आपको कथंचित्​ नित्य और कथंचित् अनित्य माने बिना किसी उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है क्या ॽ नित्य तो यों मानना होगा कि मैं ही संसार में रुलता हूँ और मुझे ही संसार से छूटकर मुक्ति में पहुँचना है । मैं वही का वही हूँ । इस संसारी पर्याय को तो मुझे नष्ट करना है और निर्वाण की पर्याय को हमें प्राप्त करना है । तो अनित्य का ज्ञान हुआ कि नहीं हुआ ॽ संसारी पर्याय दूर करें और मोक्ष की पर्याय प्राप्त करें तो कथंचित नित्य और कथंचित अनित्य मानने पर ही मुक्ति का मार्ग जाना जा सकेगा, प्राप्त किया जा सकेगा । इसके विरुद्ध जो असत्य वचन बोलता है, समांतविरूपणा करता है वह मिथ्यादृष्टि आत्महित को तो नष्ट करता ही है, मोक्षमार्ग का तो विरोध करता ही है पर समस्त व्यवहार का भी लेप कर देता है । स्याद्वाद शैली से जो वचन बोले जायेंगे वे सत्य वचन होंगे ।


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