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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 539

From जैनकोष



मर्मच्छेदि मन:शल्यं च्युतस्थैर्यं विरोधकम्​ ।निर्दयं च वचस्त्याज्यं प्राणै:कंठगतैरपि ॥539॥

मर्मभेदी वचनों से जीवन भर शल्यता ― चाहे प्राण कंठगत हो जायें अर्थात्​ चाहे मृत्यु आये तो भी ऐसे वचन न बोले जायें जो मर्म को छेद दें । बल्कि मर्मछेदी वचन बोलने से मौत जल्दी आ सकती है । दूसरे को क्रोध आ जाय, वह आक्रमण कर दे तो मर्मछेदी वचन से कौन सा लाभ लूटा जाता है ॽ खूब ध्यान से मनन कीजिए । अपने आपमें क्रोध उत्पन्न किया, अपने आपको जलाया भुनाया और उस क्रोध के कारण अपनी बुद्धि भी बरबाद कर ली । अब कुछ सोचने की शक्ति इतनी अधिक नहीं रही कि यथार्थ बात सोची जा सके । क्रोध में जो सोचा जाता है वह अटपट सोचा जाता है । कुछ नहीं तका जाता कि इसमें दूसरों का हित है अथवा नहीं है । हित है या नहीं है यह कुछ विचार में नहीं आता । तो मर्मभेदी वचनों से क्रोध बढ़ता है, बुद्धि शिथिल होती है, आकुलता बढ़ती है और बैर की परंपरा बढ़ जाय तो जीवन भर शल्य की तरह चुभती है । मर्मभेदी वचन चाहे प्राण कंठगत हो जायें फिर भी न बोलना चाहिए । जो वचन मन में शल्य उत्पन्न करें ऐसे वचन न बोलना चाहिए ।

आत्मज्ञान बिना संसारिक क्लेश ― हमें अपने आपके आत्मा का कोई शांति का मार्ग प्राप्त करना है । इस अनादि संसार के रहते-रहते अनंतकाल व्यतीत किया । कभी स्थावर हुए, कभी कीड़ा मकोड़ा हुए, कभी बड़े देव अथवा मनुष्य भी हुए पर धर्मदृष्टि के बिना अब तक संसार में, क्लेश ही पाया है । पूर्वभव की भाँति इस भव में भी जो कुछ मिला है वह भी स्वप्न सम है । जैसे पूर्वभव के समागम हमारे लिए इस समय कुछ भी नहीं हैं, क्या था क्या न था, उनका स्मरण तक भी नहीं है ऐसे ही इस भव के समागम ये चंद दिनों की बातें हैं । या हम इन समागमों को छोड़कर चले गए या हमारे जीते जी ये समागम नष्ट हो जायेंगे । ये सब समागम स्वप्नवत्​ असार हैं । इन किसी भी समागमों की प्राप्ति के लिए हम चित्त में अनीति का संकल्प करें, अपने मन में शल्य बनायें तो यह अपने अहित की बात है ।

शल्यकारी वचन न बोलने का उपदेश ― हम किसके लिए ऐसी बात बोलें जो मन में शल्य उत्पन्न करा दे और अपने जीवन को बिगाड़ दे । ऐसे भी वचन कभी न बोलना चाहिए जो चंचलतारूप हों, खूब विचारकर बोलें । जो बोलें वह दृढ़ता से बोलें, सही निर्णय करके बोलें । किसी भी बात को बारबार अदलें बदलें नहीं । जो मौलिक बात है उसे बोलें । ऐसी बात न बोलें जो किसी से विरोध उत्पन्न करा दे, ये सब कषाय की चेष्टाएँ हैं । कुछ लोग इसमें ही मौज मानते हैं कि एक दूसरे को भिड़ा दिया, लड़ा दिया, खुश हो रहे हैं उनकी कलह को निरखकर, ये तीव्र कषाय की बातें हैं । वचन वे बोलना चाहिए जिससे दूसरों को साता उत्पन्न हो । जो बात दया से रहित है, क्रूरता भरी हो वह बात भी न बोलना चाहिए । हमारा आपका सुख दु:ख से संबंध जुड़ाने वाले ये वचन हैं, जहाँ तक बने हम मौन सहित रहें, कम बोलें और जब बोलें तो हित मित प्रिय वचन बोलें । इस तरह के वचन की हमारी चर्या रहेगी तो हमें अपने आपके हित के विचार में बहुत अवसर मिलेगा और हम सुगमतया अपने आपके शुद्धस्वरूप की दृष्टि कर सकेंगे । आतमध्यान का यह एक विशदमार्ग है, कि हमारा व्यवहार, हमारा वचनालाप सीधा, सरल सत्य, हितकारी हो तो ऐसे व्यवहार से गुजर कर हम अपने आपकी दृष्टि से केवलज्ञान शीघ्र प्राप्त कर सकेंगे ।


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