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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 540

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धन्यास्ते हृदये येषामुदीर्ण: करुणांबुधि: ।वाग्वीचिसंचयोल्लासैर्निवापयति देहिन: ॥540॥

करुणावान के शांति ― लोक में अनेक मनुष्य जन्म लेते हैं, मरण करते हैं किंतु वे पुरुष धन्य हैं जिनके हृदय में करुणारूपी समुद्र का उदय होता है और वचनरूपी लहरों के उल्लास से जीवों को शांति प्रदान करते हैं । मनुष्य के साथ न तो कुछ आया है ओर न कुछ जायेगा, और जितने काल भी मनुष्य जीवन है उतने काल भी इसका हित, इसकी शांति किसी अन्य पदार्थ के कारण नहीं है और जिसका जितना भाग्य है प्रयोजनवश उतनी उसकी पूर्ति चलती ही रहती है, फिर मनुष्य में जो शांति का उदय होता है वह धन वैभव के कारण नहीं है किंतु अपने ज्ञानविकास के कारण है और जिनके हृदय में सम्यग्ज्ञान बसा है उनका चित्त करुणा से भरा हुआ होता है । जो पर्याय बुद्धि लोग हैं, केवल अपने देह और अपने इंद्रियविषयों को ही महत्त्व देते हैं उन पुरुषों के वास्तविक करुणा नहीं जगती है क्यों कि उनका उपयोग इंद्रिय विषयसुखों की ओर दौड़ गया है । वैसे मरण को तो सभी प्राप्त होते हैं पर ऐसे पुरुषों के हाथ अंत में कुछ भी नहीं रहता ।

स्वरूपपरिचयवान के यथार्थ दया ― सत्य श्रद्धान हो और फिर जीवन में तपश्चरण हो तो उसका फल अवश्य ही मधुर मिलता है । लेकिन संदेह की कोटी में रहकर कोई तपश्चरण भी करे तो उससे उसको निश्चित अपूर्व लाभ नहीं होता । जिसने अपने आत्मा के स्वरूप का परिचय पाया है और जाना है कि यह आत्मा तो अकिंचन ही है, इसमें कहीं कुछ नहीं है । यह मात्र अपने स्वरूपमय है, ऐसा जिन्हें विश्वास है उनका चित्त हित और करुणा से भरा हुआ रहता है । प्रथम तो उसने अपनी ही दया की, अपने आपको सबसे न्यारा लखा और इस उपाय से अपने में रागद्वेष मोह नहीं आने दिया, यथार्थ ज्ञातादृष्टा रहा तो यह हुई अपनी दया और ऐसा ज्ञानी पुरुष किसी परजीव के प्रति कुछ कर्तव्य करे तो चूँकि उसकी समझ में जीव का सत्यस्वरूप है अतएव जीवों पर अन्याय न कर सकेगा । वचन बोलेगा तो हितकारी बोलेगा । जिसके हृदय में करुणारूपी समुद्र का उदय है और उस करुणा के आशय में वचन निकले उन वचनों के द्वारा जगत को जो तृप्ति करते हैं ऐसे पुरुष धन्य हैं ।

विवेकपूर्ण वचनों से शांति ― करुणामयी वचनों को सुनकर दु:खी जीव भी सुखी हो जाते हैं । शुभ वचनों में ऐसी शीतलता सामर्थ्य है, ऐसी वे शीतलता प्रदान करते हैं जो शीतलता न चंद्रों से आये, न बर्फ के घरों से आये । किसी जीव को किसी मोहवश व्यग्रता उत्पन्न हुई हो और उसे बर्फ के घर में रख देवे तो क्या उसे शांति मिल जायगी ॽ शांति तो उसे विवेक के वचन सुनने से मिलती है । जिससे मोह दूर हटे, अपने आपको परिपूर्णता मान ले, कृतार्थ मान ले, ऐसा आशय जिन वचनों के निमित्त से बने वे वचन इसे शांति प्रदान करेंगे । वे पुरुष धन्य हैं जिनके ऐसे पवित्र वचन निकलें जिनको सुनकर लोग शांत हों, निर्भय हों, सुखी हों ।


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