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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 541

From जैनकोष



धर्मनाशे क्रियाध्वंसे सुसिद्धांतार्थविप्लवे ।अपृष्टैरपि वक्तव्यं तत्स्वरूपप्रकाशने ॥541॥

सिद्धांत में विप्लव आने पर यथार्थप्रकाशन हेतु बोलना ― सत्यमहाव्रत का यह प्रकरण है । वचन के संबंध में सर्वोत्कृष्ट उपदेश तो प्रभु का यह है कि मौनपूर्वक रहो । फिर भी ऐसा कोई अवसर आये जहाँ धर्म का नाश संभव है, क्रिया चारित्र वातावरण दृष्टि ये सब जहाँ ध्वस्त होने को हों, समीचीन सिद्धांत जिसका आश्रय करके लोग संसार संकटों को पार करते हैं उस सिद्धांत में कोई विप्लव आ जाय, कोई लेप हो, हवा हो, उसमें झूठा कोई तत्त्व मिलाये तो ऐसे अवसर पर विद्वान पुरुषों को चाहिए कि वे बिना पूछे भी वस्तु के यथार्थस्वरूप के प्रकाशन के लिए कुछ बोलें । यह सब एक करुणा का प्रभाव बताया है । जिस विद्वान में जीवों के प्रति करुणा है वह ऐसे मौके पर जहाँ धर्म का लेप होता हो, सिद्धांत में बिगाड़ किया जा रहा हो, धर्मपरंपरा ही नष्ट हाने को हो तो ऐसे अवसर पर बिना पूछे भी विद्वान को उसमें बोलना चाहिए, बताना चाहिए ।

धर्मपालन सर्वोत्कृष्ट व्यवसाय ― सर्वोत्कृष्ट व्यवसाय तो धर्मपालन है । यद्यपि आज का युग अर्थप्रधान हो गया है, धन के बिना लोग महत्त्व नहीं आँकते, पर महत्त्व होता है सदाचार से । धन के सामने सदाचार की भी लोग इज्जत नहीं रखते ऐसा कठिन युग है । इस युग में भी जो श्रद्धालु पुरुष अपने आचरण की रक्षा करते हैं, अपने आपको श्रद्धान, ज्ञान, आचरण में लगाये हुए हैं वे पुरुष महिनीय हैं, पूज्य हैं । भले ही अर्थयुग हो और लोग उसका महत्त्व आँके लेकिन दूरदर्शिता से देखा जाय तो उस आत्मा का इस वैभव से भला क्या होगा ॽ आत्मा के साथ संबंध है आत्मा की परिणति का, न कि धन वैभव का । आत्मपरिणति में सुधार हो, अपने आपके स्वरूप का दृढ़ श्रद्धान हो और अंतरंग में ऐसा ही रहने की रुचि जगे तो ऐसे निर्मोह मनुष्य के जो अभ्युदय प्राप्त होगा वह अनिर्वचनीय होगा, लेकिन श्रद्धान निर्मल होना चाहिए ।

धर्मपालन में निर्मल श्रद्धान से सर्वसिद्धि ― शंकाशील रहकर धर्मपालन करने में कुछ तत्त्व की प्राप्ति नहीं होती । धर्म में यों ही डगमगाते हुए अपना श्रद्धान बनायें तो उससे मेरी सिद्धि नहीं है । सबसे मुख्य काम है धर्मपालन और कोई पुरुष उस ही धर्म में कोई गड़बड़ रचना रख दे, उस धर्मक्षेत्र से विपरीत अर्थ बोलने लगे तो ऐसे समय में बिना पूछे ही यथार्थ बात का उपदेश करना चाहिए, वह है सत्य महाव्रत । ऐसी जिनकी प्रवृत्ति होती है वे पुरुष आत्मा के ध्यान के पात्र होते हैं । जिसको जिसकी धुन लगी है उसे उसकी प्राप्ति होगी । जिस आत्मा को अपने धर्म की ही धुन लगी है, केवल ज्ञातादृष्टा रहकर अपने को विशुद्ध आनंद रूप अनुभव करता रहूँ ऐसी ही जिनकी अंतरंग से भावना बनी हो वे पुरुष इस काम को करने में अवश्य सफल होंगे ।

परपदार्थ की आशा में बर्बादी ― परपदार्थों के संबंध में हम कुछ भी भावन बनाएँ, इच्छा, आशा, कामना बनायें उससे पर की सिद्धि हो जाय यह संभव नहीं है, किंतु अपने आपके शुद्ध परिणमन के बारे में भावना बतायें तो वह स्वाधीन चीज है । हम अपने में सुधार परिणति को अवश्य प्राप्त कर सकते हैं । दुनिया में सैंकड़ों आये, चले गए और उन्होंने अपने जीवन में अपनी बुद्धि के अनुकूल बहुत-बहुत दौड़धूप की, लेकिन उनका रहा क्या ॽ अब केवल नाम मात्र शेष रह गया । हुए थे कोई इस नाम के महापुरुष । अथवा उनमें गुण हों तो आदर्श के रूप में उनका लोग स्मरण करते हैं, पर उनके क्या किसी के स्मरण करने से किसी का आदरपूर्वक नाम लिया जाने से दूसरे जीवों को आत्मलाभ, संतोषलाभ, शांतिलाभ नहीं हो जाया करता है ।

स्वरूप परिणमन ही शरण ― सारा जग भी प्रशंसा करे किंतु मैं मोही हूँ, अज्ञानी हूँ, कषाय संयुक्त हूँ तो मेरा कोई परिणमन बदल न देगा, मुझे कोई आनंद दे न देगा, मैं ही अपने आपके स्वरूप को सम्हालूँ और अपना परिणमन स्वरूप के अनुकूल बनाऊँ तो वहाँ मुझे अपना शरण मिलेगा ऐसा धर्म के स्वरूप के बारे में यदि कोई विपरीत अर्थ करता है तो दयामयी पुरुष को विद्वान को उसके प्रसंग में बिना पूछे भी बोलना चाहिए, यह बहुत बड़ी करुणा की बात है । धर्म रक्षा करना जिससे धर्म की परंपरा चलती रहे । यह बहुत श्रेष्ठ कर्तव्य है ।


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