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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 544

From जैनकोष



मन्ये पुरजलावर्त्तप्रतिमं तन्मुखोदरम्​ ।यतो वाच: प्रवर्तंते कश्मला: कार्यनिष्फला: ॥544॥

वचन से मनुष्य की परख ― आचार्यदेव कहते हैं कि मैं तो ऐसा मानता हूँ कि असत्य का प्रतिपादन करने वाले दर्शकों को अथवा लोगों का जो मुखरूपी छिद्र है वह नगर के गंदे जल से भरे हुए पनाले के समान है । जैसे नगर के पनाले का जल मैला होता है और किसी के काम नहीं आता इसी प्रकार असत्यवादी पुरुषों के मुख से जो वचन निकलते हैं वे भी मलिन होते हैं और नि:सार हैं । मनुष्य का धन वचन है । मनुष्य की परख न तो हाथ पैर से होती है और न धन वैभव से होती है । मनुष्य की परख का बाह्य साधन कुछ है तो वह वचन हैं । वचनों से ही जाना जाता है कि यह शिक्षित पुरुष है, वचनों से ही समझा जाता है कि यह अनपढ़ है, असभ्य है, तुच्छ हृदय का है । मनुष्य के हृदय की बात सब वचनों द्वारा प्रकट होती है ।

सत्य से प्रत्येक कार्य की संपन्नता ― जो असत्यवादी पुरुष हैं उनके वचनों से एक तो कुछ काम भी नहीं निकलता, निसार हैं, लोक में प्रतिष्ठा नहीं पाते और कभी प्रतिष्ठा पाते भी हैं तो लोग जब यह समझते हैं कि यह सच बोल रहा है तब प्रतिष्ठा पाते हैं । अगर ये वचन झूठे हैं ऐसा जाहिर हो जाय तो फिर प्रतिष्ठा हो जाय, यह नहीं होता । तो प्रतिष्ठा झूठ की नहीं हुई सत्य की हुई । क्योंकि जिन्होंने प्रतिष्ठा की उन्होंने सत्यवचन समझकर प्रतिष्ठा की । जैसे दुकानदार लोग ग्राहकों से झूठ भी बोलें और झूठ बोलकर कुछ पैसा भी कमा लें लेकिन ग्राहकों ने झूठ नहीं समझा तब पैसा दिया, सच समझा तब पैसा दिया । तो व्यापार सच से चला या झूठ से ॽ प्रकट रूप में देखो तो लोगों ने सच समझा तब पैसा दिया । तो व्यापार सच से चला चाहे उसके भीतर मायाचार झूठ भरा हो, पर झूठ खुल्लमखुल्ला हो जाय तो व्यापार नहीं चल सकता । तो प्रतिष्ठा हमेशा सत्य से ही रहती है और कभी सत्य की मुद्रा में झूठ भी पनप जाय, लेकिन वह झूठ कब तक पनप सकता है ॽ कभी न कभी खुलेगा । बहुत-बहुत बार झूठ बोलने वाले लोग, अंत में जब झूठ खुल जाता है तब उनकी प्रतिष्ठा नहीं रहती ।

असत्यवादियों में मलिनता ― असत्य बोलने वालों के वचन एक तो निसार हैं, दूसरे मलिन हैं, लोगों द्वारा प्रतिष्ठा नहीं पाते और दर्शक जो असत्यवादी हैं, तत्त्व के संबंध में असत्य प्रतिपादन करने वाले जो दर्शक हैं उनके वचन तो ग्रंथनिबद्ध हो गए । अब उनका वह झूठ का कलंक, उनकी वह मलिनता चिरकाल तक के लिए रहेगी । तो जैसे शहर की गंदी नाली का पानी निसार है, मलिन है, किसी के काम नहीं आता ऐसे ही झूठ पुरुषों के वचन निसार हैं, कार्यहीन हैं, किसी के काम नहीं आते । और, स्वयं मलिन हैं, ऐसे वचन बोलने की जिनकी प्रकृति है उन पुरुषों को न आत्मा की दृष्टि रहती है, न आत्मतत्त्व की साधना का यत्न रहता है ।

सारभूत चीज आत्मध्यान ― लोक में केवल सार शरणभूत बात है तो आत्मध्यान है । इन बाहरी पदार्थों में कहाँ-कहाँ ज्ञान लगायें, कहाँ उपयोग फँसायें, ये सभी संगम विनश्वर हैं, भिन्न हैं, उनसे आत्मा को शांति नहीं मिलती । आत्मा स्वतंत्र पदार्थ है, अपने आपमें आप है, अपने में ही रहता हुआ अपना परिणमन करता रहता है । इसको शांति किसी बाहरी पदार्थ से नहीं मिला करती, परिस्थितियों की बात दूसरी है ।

बाहरी पदार्थ शांति के दाता नहीं ― बाहरी पदार्थों से कदाचित्​ शांति प्रतीत हुई हो तो उसका अर्थ है कि उस प्रसंग में बड़ी अशांति कुछ दूर हुई है शांति नहीं मिली किंतु किसी प्रकार की अशांति कम हुई है । बाह्य समागमों में शांति प्राप्त नहीं होती किंतु बाहरी निमित्त नाना प्रकार के हैं । जब कभी किसी निमित्त से शांति मिली तो उसका अर्थ यह है कि अशांति कम हुई है । अशांति कम होने की बात चलती है यहाँ शांति मिलने की बात नहीं चलती । जैसे किसी पुरुष को 105 डिग्री बुखार हो गया और अब उतर कर 102 डिग्री बुखार रह गया तो उससे कोई पूछे कि आपकी अब तबीयत कैसी है, तो वह कहता है कि अब ठीक है । अभी यद्यपि 102 डिग्री बुखार है पर कहता है कि अब तबीयत ठीक है । तो उसका भाव यह है कि अब बुखार में कमी हुई है । उस ठीक का अर्थ अस्वस्थ्यता की कमी है । इसी प्रकार लोक में जितनी प्रकार की शांति हैं, सुख हैं उनका अर्थ अशांति में कमी है । वास्तविक मायने में सुख शांति नहीं है । तो बाहर के किन्हीं भी पदार्थों में अपना संबंध जोड़ने से, अंतरंग से ममता करने से आत्मा को न शांति मिलती, न उसका उद्धार है ।

ज्ञानस्वरूप आत्मा का ध्यान ही परम शरण ― आत्मा का परम शरण तो अपने आपके निर्लेप शुद्ध ज्ञानानंद स्वरूप का ध्यान है । उमर बीतती जा रही है, दु:ख भोगते जा रहे हैं, बहुत काल के बाद भी बहुत-बहुत श्रम करने पर भी अपने आपको रीता ही पायेंगे । जैसे आज भी तो बहुत से बूढ़े लोग हैं जिन्होंने खूब वैभव कमाया, बड़ी प्रतिष्ठा पायी, सब कुछ पाने के बाद भी उन बूढ़ों की परख करो तो वे रीते ही मिलेंगे । आत्मा की पूर्णता तो रत्नत्रय से है, अर्ंतज्ञान से है, अंत: झुकाव से है । इसमें जो शांति और आनंद की अनुभूति होती है उससे भरपूर की बात समझियेगा । बाहरी पदार्थों के समागम के बावजूद भी वे अपने को स्वयं रीता अनुभव भी करते हैं और न भी करते हों तो भी ज्ञानीजन समझते हैं कि वे रीते हैं । लोक में क्या है ॽ आज यहाँ जन्म लिया है, इस थोड़ी सी भूमि पर कुछ हमारा चलना फिरना होता है, मरण के बाद अन्यत्र जन्म लेंगे तो वहाँ चलना फिरना होगा । तो क्या विश्वास है किसी भी जगह का कि यह हमारा कुछ बन गया है । तो है कुछ नहीं संसार में अपना ।

विरुद्धवस्तुस्वरूप बताने वालों का मुख छिद्र मलिन पनाले के समान ― शांति का उपाय भी पर से निवृत्त होकर निज अंतस्तत्त्व में लीन होना है किंतु इसके विरुद्ध जिन दार्शनिकों ने वस्तुस्वरूप बताया है वे असत्यवादी हैं और उनका वह मुख छिद्र एक पनाले के समान है। नगर का पनाला मलिन है और निसार है इसी तरह उनके वचन जो उस मुख छिद्र से निकलता है वह भी निसार है और मलिन है । हम अपने लिए यह निर्णय बनायें कि मेरा ऐसा परिणमन बने कि सत्य की हमें रुचि जगे, सत्य व्यवहार का यत्न बने और हमारा जीवन अहिंसक और सद्​रूप बने। इससे एक तार्तम्य और आत्मीय शांति का लाभ होता है ।


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