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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 545

From जैनकोष



प्राप्नुवंत्यतिघोरेषु रौरवादिषु संभवम्​ ।तिर्यक्ष्वथ निगोदेषु मृषावाक्येन देहिन: ॥545॥

असत्यप्रतिपादन से नरकों की पात्रता ― मृषा वाक्य से अर्थात्​ असत्यप्रतिपादन से यह प्राणी अत्यंत भयानक रौरव सहित नारकों में उत्पन्न हुए दु:ख को भोगता है अथवा जो अत्यंत निम्न श्रेणी है, तिर्यंच है, निगोद है उनमें दु:ख को भोगता है । हम आपको जो यह शरीर मिला है इसके कारण कलाप पर विचार करें कि यह शरीर बन कैसे गया है ॽ यह शरीर मिल कैसे गया है ॽ क्या कोई अलग से ईश्वर या कोई पुरुष था ऐसा जिसने बैठकर इस शरीर को गढ़ा हो ॽ

शरीर उत्पत्ति कैसे ― शरीर की उत्पत्ति का कारण क्या हो सकता है, विचार कीजिए । लोग ज्यादा से ज्यादा यह कह देंगे कि माता पिता ने पैदा किया, कोई कहेगा कि ईश्वर ने पैदा किया । इन दोनों बातों पर विचार कर लो । ईश्वर ने क्या किया कि यह शरीर बन गया ॽ जैसे लोग फैक्टरियों में कोई सामान बनाते हैं अर्थात्​ कैसा निमित्त है, कैसा उपादान है, किस चीज से ढालते हैं, किसको कैसे बनाते हैं, जैसे यह बात आँखों देखी समझ में आती है इस तरह की क्या कुछ समझ इससे बन सकती है कि किसी फैक्ट्री में किसी मैटर से किसी साधन से इस शरीर को गढ़ डाले ॽ कुछ बात नहीं बनती । माता पिता ने भी क्या किया जो इस शरीर को बना दिया ॽ उनकी भी कुछ करतूत नहीं । यह सब अगम्य जो वचनों द्वारा प्रतिपादित नहीं हो सकता ऐसे निमित्तनैमित्तिक भाव का परिणाम है । यह जीव कुछ भाव बनाता है । और उन भावों के अनुकूल कुछ अन्य चीज इस जीव के साथ बंध जाती है । चूँकि जीव अमूर्त है तो इस अमूर्त के साथ बंधने वाली चीज भी अमूर्त तो नहीं है क्योंकि अमूर्त से अमूर्त बंधे तो बंधन नहीं कहलाता । होगा तो कोई मूर्त पदार्थ मगर अत्यंत सूक्ष्म होगा, जिसको जैनशासन में कर्म कहा है ।

अशुद्ध परिणामों से नरक निगोद की प्राप्ति ― जीव ने अपना परिणाम बनाया कि ये कर्म बंध गए । अब उन कर्मों के उदयकाल में ये सब रचनाएँ अपने-अपने आप बन जाती हैं । ये औदारिक वर्गणायें जो शरीररूप अभी नहीं हैं वे ही सब कर्म तैजस जीव के विकार इन सबका संबंध पाकर एक शरीर रूप रचना हो जाती है । ऐसा यह प्राकृतिक सिस्टम है जो निमित्तनैमित्तिक भावों पर आधारित है, यों इस प्रकार यह मनुष्य शरीर बना । तो यों ही समझिये कि इससे भी पहिले कोई शरीर था क्या ॽ ऐसा संभव है कि इससे पहिले शरीररहित था और फिर शरीर बन गया । जो शरीररहित होगा वह अत्यंत शुद्ध है, केवल है, प्योर है । उसमें जब उपाधि ही नहीं है तब फिर उसकी विचित्रता कैसे बने ॽ अनादि से ही यह जीव नाना शरीरों को धारण करता चला आया है । और अब आगे भी यदि इसने कैवल्य परिणाम नहीं बनाया, कैवल्य में रुचि न की, अपने आपके उस अकेलेपन में, उस सहजस्वरूप की उपासना न की तो आगे भी शरीर मिलते रहेंगे । तो जो परिणाम असत्य बनाता है, असत्य प्रलापी है उसको आगे निगोद में, तिर्यंच में और नारकों में ऐसे घोर दु:ख सहन करने पड़ते हैं । असत्य वचनों में मुख्यता है दूसरों का अहितकारी वचन बोलने की ।

सत्य वचन का माप हितकारी वचन ― ऐसे वचन न बोले जायें जिससे दूसरे पुरुषों का वास्तव में अहित हो । अहितकर ऐसे सत्यवचन बोलना भी असत्य कहलाता है । दूसरों के हित करने के कारण ही उसमें सत्यता है । सत्य मायने हित । सत्​ मायने उत्तम कहा है ना ॽ सज्जन सज्जन, उसका अर्थ है हितकारीजन । जो दूसरे पुरुषों का हित सोचते हों, करते हों, ऐसे पुरुषों का नाम है सज्जन । कोई दूसरों का हित तो करे नहीं और अहितकारी ही प्रयत्न करता है तो ऐसे अहितकारी पुरुष को क्या कोई सज्जन कहता है ॽ जो परोपकारी हो, हितकारी हो उसे लोग सज्जन बोलते हैं । तो सत्​ के मायने हित है और सत्​ के प्रसंग में, हित के प्रसंग में जो वचन बोले जायें उन वचनों का नाम है सत्य ।

असत्य का फल ― उस सत्य के विरुद्ध जो वचन बोले जाते हैं उनका फल बस स्थावर बने, कीड़ा मकोड़ा बने, नारकादिक में दु:ख सहे, ऐसे ही दु:ख भोगना असत्य वचनों का फल होता है । जो जीव दूसरों के अहित पर तुले हैं वे इस लोक में अपना भी अहित करते हैं और भविष्य में भी अपना अहित करते हैं ।


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