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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 557

From जैनकोष



यस्तपस्वी जटी मुंडो नग्नोवा चीवरावृत: ।सोऽप्यसत्यं यदि ब्रूते निंद्य: स्यादंत्यजादपि ॥557॥

सत्य भाषण का महत्त्व ― सज्जन पुरुषों की गोष्ठियों में भी इन दो तत्त्वों का बड़ा आदर किया जाता है ― एक असत्य और एक सत्य । लोक प्रसिद्ध युक्ति है ― सत्यमेव जयते सदा । सत्य की सदा विजय होती है । सत्य से आत्मा की विजय होती है । कोई पुरुष बड़ा तो तपश्चरण करता हो अथवा कोई पुरुष जटाधारी हो, मुंड हो, अथवा कचलोच भी करता हो अथवा नग्न हो या वस्त्रधारी हो, किसी भी भेष में हो, कोई सा भी धर्म का भेष बनाया हो पर एक असत्य की रुचि हो, असत्य बोलता हो तो वह जगत में प्रशंसनीय नहीं माना जाता है, किंतु लोग घृणा के साथ देखते हैं । सत्य भाषण में लोक में कितना विशेष महत्त्व है । और जो सत्य भाषण करता है उसका आशय विशुद्ध है अतएव वह पुरुष आत्मा के ध्यान का पात्र है ।

आत्म स्मरण द्वारा परमात्म तत्त्व निकालने की शिक्षा ― लोक में शरण आत्म स्मरण है और वह भी परमात्म तत्त्व के रूप में आत्म स्मरण है । देखिये जो परमात्मा बने हैं उन्होंने कौन सी नई चीज बनाई जिससे वे परमात्मा कहलाये ॽ जैसे कुम्हार मिट्टी का खिलौना बनाता है, तो वह मिट्टी, पानी वगैरह चीजें जोड़ जोड़कर खिलौना बनाता है, क्या इस तरह से कोई परमात्मा बना है ॽ अथवा जैसे पत्थर में मूर्ति बनायी जाती है तो वहाँ कारीगर कुछ जोड़कर मूर्ति नहीं बनाता किंतु हटा-हटाकर मूर्ति बनाता है जिस पाषाण में कारीगर मूर्ति बनाना चाहता है उस पाषाण में कारीगर को मूर्ति समझ में आ गयी कि यह चीज इसमें से निकालना है । अब कारीगर उन पाषाणों को हटाता है जो पाषाण मूर्ति का आवरण करने वाले हैं । बस उन पाषाणों को निकालने का ही काम वह कारीगर करता है । पहिले बहुत बड़े-बड़े पत्थर निकाला, फिर छोटे-छोटे टुकड़े निकाला, फिर महीन छेनी से बिल्कुल छोटे-छोटे कण निकाले जाते हैं । निकालने-निकालने का ही काम वह कारीगर करता है मूर्ति प्रकट हो जाती है । ऐसे ही समझिये कि परमात्मा बनाने के लिए केवल निकालने-निकालने का ही काम पड़ा है, कुछ जोड़ने का काम नहीं पड़ा है, क्योंकि परमात्मा होने पर जो बात प्रकट होती है वह निकालने-निकालने से ही प्रकट होती है, जिस चीज पर मैल चढ़ा हो उसको धोकर निकाल दो वह चीज साफ हो गयी । किसी चीज को साफ करने के लिए कुछ चीज लायी नहीं जाती किंतु केवल हटाने-हटाने का काम किया जाता है । बेंच पर मान लो बींट वगैरह लगा है तो उसके साफ करने का अर्थ है कि जो परवस्तु लगी है उसे बिल्कुल हटा दें । चूँकि केवल छुड़ाने से बिल्कुल नहीं हटता तो पानी से धोकर हटाया जाता है हटाने से चीज वह वही केवल रह गयी, उसमें दूसरी उपाधि नहीं रही, इसी के मायने परमात्मा हो गया ।

असत्य के निकल जाने पर ही सत्य की प्रगटता ― तो अपने आपमें खोजिये कि हममें कौन-कौन से तत्त्व असत्य पड़े हुए हैं, उन्हें निकालिए । असत्य तत्त्व के पूर्णतया निकल जाने पर यह आत्मा केवल रह जायेगा और वही परमात्मा कहलायेगा । उस सत्य का जिसने आग्रह किया है वह सत्य की दृष्टि के प्रताप से निर्वाण को प्राप्त हो जाता है, शांत होता है । सुखी होता है । और जिन्हें इस सत्य की खबर नहीं है, सत्य का भाषण नहीं करते, लोकव्यवहार में ही असत्य बोलते हैं, आत्मतत्त्व की खबर भी नहीं है ऐसे पुरुष चाहे किसी भी प्रकार के धर्म का भेष रख लें किंतु उनका हित नहीं होता । वे लोक में निंद्य ही हैं । असत्य संभाषण करने वाले की लोक में भी प्रतिष्ठा नहीं है । अपने आपको सत्य का रुचिया बनायें और यह प्रकृति पड़ी है जीव में कि वह सत्य जानना चाहता है ।

दु:खों के दूर करने का उपाय यथार्थ परिज्ञान ― अपना क्या है, यथार्थ क्या है, यथार्थ तत्त्व का परिज्ञान हो जाना बस यही सर्वदु:खों को दूर करने का उपाय है । भ्रम किया है इससे यह दु:खी है । भ्रम दूर हो जाय, दु:ख दूर हो जाय । दु:ख किन्हीं अन्य कारण कलापों से दूर नहीं हो सकता किंतु भ्रम समाप्त हो गया दु:ख दूर हो गया । जैसे आप अपने मकान मे बड़े आराम से सोये हुए हैं और उस निद्रा में ऐसा स्वप्न आ जाय कि हम कहीं जंगल में जा रहे हैं, सामने से सिंह आ गया अथवा अमुक सर्प लिपट गया या कोई शत्रु मार रहा ऐसा स्वप्न आ जाय तो उस काल में आप दु:खी होते हैं या नहीं ॽ पर वहाँ न सर्प है, न सिंह है, न शत्रु है, केवल एक भ्रम हो गया है, एक स्वप्न आ गया है तो ऐसे स्वप्न से जो दु:ख उत्पन्न होता है उस दु:ख को क्या उस कमरे में लगा हुआ पंखा दूर कर देगा, अथवा वहाँ जो सेवक लोग बैठे हों अथवा कोई मित्रजन बैठे हों आपसे बड़ी प्रिय बातें करने के लिए तो क्या वे आपके दु:ख को दूर कर देंगे ॽ

सत्य स्वरूप की दृष्टि में ही आनंद ― अरे स्वप्न में भ्रम से ही दु:ख उत्पन्न हुआ है तो स्वप्न टूट जाय, निद्रा खुल जाय और चेत हो जाय तो तब समझ में आयेगा कि वह तो कुछ नहीं था, मैं तो बड़े आराम से अपने घर के कमरे में लेटा हूँ, उसके वे दु:ख दूर हो जाते हैं । त्यों यों ही असत्य का हमने आग्रह कर रखा है, असत्य को सत्य माना है, शरीर को, वैभव को परिजन को अपना स्वरूप माना है, इनसे अपना महत्त्व माना है अतएव क्लेश होता है और जिन गृहस्थों को भी यथार्थ तत्त्वज्ञान है वे घर में रहते हुए भी जल में भिन्न कमल की भाँति अपने को निर्लेप प्रतीत करते रहने से वे निराकुल रहा करते हैं । तो अच्छा यह है कि हम अपने आपके सत्य स्वरूप की दृष्टि अधिक से अधिक करें, क्योंकि इस अशरण असार संसार में केवल यह आतमतत्त्व ही शरण है ।


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