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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 558

From जैनकोष



कुटुंबं जीवितं वित्तं यद्यसत्येन वर्द्धते ।तथापि युज्यते वक्तुं नासत्यं शीलशालिभि: ॥558॥

आत्महितकारी वचन में सत्यता ― यदि असत्य वचन से अपने कुटुंब की वृद्धि हो, जीवन और धन की वृद्धि हो तो भी शोभित पुरुषों को असत्य वचन कहना उचित नहीं है । जो दूसरे प्राणियों का अहित करें ऐसे वचनों को असत्य वचन कहते हैं । ऐसा भी सत्य जो लोकव्यवहार में तो जो पदार्थ जैसा है मायारूप, उसे वैसा कहे तो लोक में कथन से किसी का हित तो नहीं है और अहित है अनेक का तो ऐसे वचन भी असत्य की कोटी में आ जाते हैं । यद्यपि यह बात बहुत कम होती है । यथार्थ बात नियम से प्राणियों के हित का ही कारण होती है । दूसरों के प्रति हितकारी वचन बोलने में अपना हित है । अहितकारी वचनों से कुछ जीवन, धन वृद्धि भी होती हो तो भी वे वचन अग्राह्य हैं । जीवन क्या, आत्मा तो सदैव अमर है, स्वयं अनंत आनंद का धाम है । बाह्य पदार्थों में इस आत्मा का क्या वैभव, क्या समृद्धि है ​ॽ जो जितना है वह उतना ही रहता है इस आत्मा में जो धर्म हैं, धन है, समृद्धि है वह आत्मा से कभी अलग नहीं होता । जो आत्मा की वस्तु नहीं है वह अनेक उपाय किये जाने पर भी आत्मा में आती नहीं है ।मोह का दु:ख ― मरण के समय में जो लोग दु:खी होते हैं, वे मरण के कारण दु:खी नहीं होते, किंतु परवस्तुवों में उन्हें मोह लगा है और वह है छोड़कर जाने का समय तो उन्हें इस बात का क्लेश होता है कि इतना मोह करके, इतना श्रम करके तो हमने यह वैभव कमाया, दुकान मकान बनाया, इज्जत बढ़ाया और अब ये छूटे जा रहे हैं, मरण समय में परवस्तु के मोह के कारण दु:ख होता है । जाने का दु:ख नहीं होता है । कोई ज्ञानीपुरुष यथार्थ तत्त्व जानता है यह मैं आत्मा अमर हूँ, ये सब वैभव क्षणभंगुर हैं, अहित हैं, पर हैं, इनसे मेरा कुछ संबंध नहीं है, परिचय भी नहीं है । जिन लोगों ने मुझे पहिचाना, मेरे स्वरूप को नहीं पहिचाना किंतु इस मायामयी मनुष्य पर्याय को उन्होंने सब कुछ मान लिया ।

सत्य ज्ञान की संभाल से मरण समय में समतापरिणाम की समर्थता ― यह मैं तो एक ज्ञानमय पदार्थ हूँ ऐसी अपने ज्ञान की संभाल कोई करले तो उसको मरण समय में क्लेश नहीं होता । मरण सबका आयेगा । कर्तव्य यह है कि हम ऐसा ज्ञान बनायें कि मरण समय तत्त्वज्ञान रहे, समाधिपरिणाम रहे, रागद्वेष मोह का फँसाव न रहे और अपने स्वरूप के स्मरण सहित, प्रभु के स्वरूप के स्मरण सहित मेरा यहाँ से जाना हो इस बात का यत्न होना चाहिए और जब मरण का आये तो तब दूसरों को इसी प्रकार का यत्न करायें, उन्हें संबोधें । दूसरों को जो समाधिमरण कराते हैं उनको समतापरिणाम उत्पन्न करने का उपदेश देते हैं, उनमें ऐसा आत्मबल प्रकट हो कि स्वयं अपने मरण समय में समतापरिणाम बनाने में समर्थ हो सकते हैं । क्या है, वैभव मिला तो, न मिला तो, यह जीवन रहता तो नहीं रहता, तो ये सब मायारूप चीजें हैं ।

ज्ञान के बिगाड़ में अपना अहित ― मैं अपने आपमें यदि ज्ञान की ओर से बिगड़ गया तो बस यही मेरा बिगाड़ है । हे प्रभो ! मेरे में असत्य का आग्रह न जगे, सत्य के प्रति रुचि हो और सत्य भाषण का ही मेरा व्यवहार रहे, बस यही मेरे लिए एक वैभव है । यदि असत्य बोलकर कुछ भी बढ़ा लिया मायारूप धन वैभव कुटुंब तो उसमें आत्मा का क्या हित होगा ॽ जो शीलवान पुरुष हैं, तत्त्वज्ञानी आत्मा है वह असत्य भाषण को कभी भी उपादेय नहीं समझता है ।


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