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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 577

From जैनकोष



भ्रातर: पितर: पुत्रा: स्वकुल्या मित्रबांधवा:।

संसर्गमपि नेच्छंति क्षणार्द्धमिह तस्करै:।।

चोर के संसर्ग की अवांछनीयता- चोर का कोई भी सगा नहीं है। चोर चोर भी चोर के साथी नहीं हैं। तो जो सज्जन हैं वह चोर का कैसे साथी बन सकता है। चोर का चोर से साथ नहीं, चोर का किसी सज्जन से साथ नहीं। भाई हो, पिता हो, पुत्र हो, स्त्री हो, मित्र हो कोई भी चोर का क्षणमात्र के लिए भी संसर्ग नहीं चाहता। चार चोर थे तो कहीं से मान लो 2 लाख का धन चुरा लाये। तीन चार बजे रात को किसी शहर के बाहर किसी जंगल में छुप गए। उन्होंने विचार किया कि यह धन तो बटेगा ही, पर ऐसा करें कि दो भाई तो चलें, शहर से बढ़िया भोजन लायें, खूब खायें फिर आनंद से धन बाँट लेंगे। तो उनमें से दो चोर तो चले गए शहर से भोजन सामग्री लेने। अब जो भोजन सामग्री लेने गए उन चोरों के मन में आया कि ऐसा करें कि भोजन में विष मिलाकर ले चलें, विष भरे लड्डू वे दोनों खा लेंगे तो मर जायेंगे। फिर हम तुम दोनों एक एक लाख का धन बाँट लेंगे। यहाँ तो यह विचार किया और उसी समय उस अड्डे पर बैठे हुए दोनों चोरों ने क्या सलाह किया कि उन दोनों को आते समय अपन बंदूक से मार दें, जब मर जायेंगे तो हम तुम दोनों एक एक लाख का धन बाँट लेंगे। अब शहर से वे दोनों चोर विषभरे लड्डू लाये और इधर दोनों चोर बंदूक ताने बैठे। जब पास में वे पहुँचे तो दोनों ने उन्हें बंदूक से मार दिया। वे दो तो गुजर गए। अब वे दोनों सोचते हैं कि अब तो एक एक लाख का धन बाँट ही लेंगे, पहले ये जो मिठाई आयी है उसे खा लें। ज्यों ही उन दोनों ने मिठाई खायी तो वे भी गुजर गए। यों चारों के चारों चोर गुजर गये और धन की जगह धन पड़ा रह गया। तो चोर तो चोर के भी सगे नहीं होते, दूसरे की बात तो जाने दो। चोरों की परस्पर में क्या मित्रता?

चौर्यवृत्ति से अनर्थ- चारी नामक पाप महा अनर्थ का परिणाम है। चोरी का पूर्णरूप से त्याग साधुजनों के पलता है, गृहवासियों के तो किसी न किसी प्रकार का थोड़ा बहुत चोरी का दोष लगता ही रहता है। इसीलिए गृहस्थों के अचौर्य अणुव्रत बताया है, अचौर्य महाव्रत साधु के ही होता है। तो जहाँ चोरी का परिणाम रहता है वहाँ अनुमान कीजिए कि कितनी कलुषता रहा करती है, कितना गंदा भाव बनता है और कितना अज्ञान भरा है। चोरी के परिणाम वाले पुरुष में धर्म की पात्रता नहीं जगती। वह क्या धर्म करेगा? चोरी व्यसन में भी है, पाप में भी है। चोरी की आदत बन जाना भी व्यसन बन जाता है और जिसके कोई नियम नहीं, आड नहीं; ऐसा पुरुष कोई चोरी कर ले तो उसकी फिर आदत बन जाती है। कोई व्रती हो, किसी के प्रतिज्ञा हो, नियम भी हो और किसी कषाय के आवेग में रहकर कोई साधारण सी चोरी कर ले किसी कारण किसी परिस्थिति में तो वह संभल सकता है। और जिसके व्रत नहीं है, चोरी की इल्लत लगी है उसकी तो आदत बन जाती है।

चोर का शुभकार्यों में सम्मिलित होने का अनधिकार- जिसे चोरी की आदत बन गयी है वह व्यसनी है, उसे शुभकार्यों में सम्मिलित होने का अधिकार नहीं है। मंदिरों में लिख भी दिया जाता है कि जो पुरुष व्यसनी है उसे पूजा करने का अधिकार नहीं है। जिसको जुवा खेलने का व्यसन लग गया है उसे भी धर्मकार्यों में सम्मिलित होने का अधिकार नहीं है। हाँ कोई सबके बीच में इन व्यसनों को त्याग दे और कभी न करने की प्रतिज्ञा करे तो उसका यह पाप धुल जाता है, फिर उसके ऐसी स्वच्छता जगती है कि वह पूजा करने का पात्र होता है, ऐसे ही मद्यमांस भक्षण की जिनकी प्रकृति है वे प्रभुपूजा करने के अधिकारी नहीं हैं, और करे कोई ऐसा तो यह कलिकाल की बात है। यह तो इस समय बात होती है, पर मांसभक्षी जीव को पूजा करने का अधिकार नहीं है। माँसभक्षण छूटे तो धर्म धारण की पात्रता जगे। ऐसे ही जो मदिरापान से बेहोश रहा करते हैं उन्हें भी क्या धर्म का अधिकार है? वे धर्मधारण कर ही नहीं सकते। धर्मधारण करने की पात्रता उनमें ठहर ही नहीं सकती। ऐसे ही चोरी करने का जिसका स्वभाव है उसमें भी धर्म की पात्रता नहीं ठहर सकती। निरंतर क्लेश संक्लेश रहते हैं और उसका तो चित्त ही स्थिर नहीं है। चोर जा रहा है, कहीं जरा सी पत्ती भी खुरकी तो झट वह भयभीत हो जाता है। कोई आ तो नहीं रहा, किसी ने देख तो नहीं लिया। तो ऐसे ही परस्त्रीसेवन की बात है। ये सब व्यसन हैं, इन सब व्यसनों में रहने वाले लोगों को शुभकार्यों में हाथ बटाने का अधिकार नहीं है। तो चोरी की जिसकी प्रकृति है ऐसे पुरुष का कोई साथी नहीं होता, कोई सगा नहीं होता।


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