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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 578

From जैनकोष



न जने न वने चेत: स्वस्थं चौरस्य जायते।

मृगस्येवोद्धतव्याधादाशंकय वधमात्मन:।।

चोर के चित्त की सर्वत्र अस्वस्थता- चोर का चित्त कहीं भी स्थिर नहीं रहता। मनुष्यों के बीच में बैठा है तो भी उसके चित्त में स्थिरता नहीं है, वन में जाय तो वहाँ भी निश्चिंत नहीं है। आप कहेंगे कि चोर वन में क्यों जायेंगे? तो वे रहे कहाँ? वे वन में ही तो छुपकर रह पायेंगे। डाकुवों का स्थान वनघर है, साधुवों का भी स्थान वनघर है, पर डाकू तो वन में भयभीत रहा करते हैं और साधु आनंदमय रहा करते हैं। उन चोरों का चित्त वन में भी निश्चिंत नहीं रहता। जैसे किसी मृग के पीछे शिकारी लग जाय तो वह बहुत डरता है, विह्वल रहता है, पीड़ित रहता है, इसी प्रकार चोरों को भी अपने पकड़े जाने का भय बना रहता है तो वे स्थिर नहीं रह सकते। चोर के बोलचाल से, उसके रहन-सहन से भी प्रकट हो जाता है कि इसने चोरी की है। जो लोग चोर पकड़ने में कुशल हैं ऐसे पुलिस के लोग या समझदार लोग भाप लेते हैं कि इसकी चोरी की प्रकृति है और यह कहीं से चोरी कर लाया है। चोर का चित्त स्थिर नहीं रह सकता। घर में भी जो घर की झौंपड़ी उसमें भी उसका मन ठीक नहीं रह सकता। निरंतर व्यग्रता है क्योंकि छुपकर पाप किया है।

अत्यंत गोपनीय पद्धति का पाप- यह समझ लीजिए कि जो पाप इतना छुपकर करना पड़ता, जिसके संबंध में यह सोचा जाय कि यह किसी को मालूम भी न पड़ना चाहिए वह काम नियम से पाप है। आप कहोगे वाह कोई मनुष्य टट्टी जाता है तो वह किवाड़ बंद करके संडास में शौच करता है तो क्या वह भी पाप की बात है? अरे शौच तो वह बताकर भी जाता, लोगों को जताकर भी जाता, उसमें किसी का भी संकोच नहीं, सब लोग समझ जाते कि यह शौच करने गया है तो वह पाप कैसे हुआ? और, जो चोरी आदिक पाप हैं उनमें तो उन चोरों का यह विचार रहता कि लोग जाने कि यह बड़ा सज्जन है, ईमानदार है, पर चोरी करने के लिए छुपकर जाता है, संकोच करता हुआ जाता है। ऐसी ही मैथुन प्रसंग की बात है। मैथुन प्रसंग करने वाला व्यक्ति छुपकर जाता है, संकोच करके जाता है पर घर के सभी लोगों को इस बात का पता रहता है कि यह इसका पति है, घर गया है, ऐसा सबको विदित रहता है। तो जिसके संबंध में किसी को पता भी नहीं पड़ सके किसी भी प्रकार ऐसे छुपकर जो कार्य होते हैं वे सब पाप हैं, अनर्थ हैं, जीव को संकट में डालने वाले हैं।

चौर्य से अनेक संकट- चोरी आदि अनर्थों से जीव पर सबसे बड़ा संकट यह है कि उसे निज ज्ञायकस्वरूप भगवान के दर्शन होने की पात्रता नहीं रहती। इस लोक में कहाँ सुख है, किसमें आप चित्त लगायें, कौन ठिकाना, ऐसा है जो आपको शांति ला दे, खूब निरख लो बाहर में। महल, फैक्टरी, दुकान या कोई भी समागम ऐसा है क्या जो जीव को शांत बना सके? यदि लोक में बड़ी इज्जत हो रही है, बड़ी प्रशंसायें हो रही हैं उनको सुनकर भी वह अपने में आकुलताएँ ही मचाता है, अपने स्वरूप की सुध खो बैठता है; उससे बड़प्पन मानता है तो वहाँ क्या मिला इसे? धन वैभव मिल गया तो क्या मिला इसे? यह आत्मा तो अमूर्त है। भीतर में इच्छावों का त्याग करे तो शांति मिले। वैभव कितना ही सामने आ जाय उससे क्या शांति होती है? तो जिसको स्व और पर का विवेक नहीं है, पर के संचय में, पर के कारण ही अपना बड़प्पन माने ऐसा पुरुष अंधकार अज्ञान में पड़ा हुआ है, उसके विवेक नहीं है। ऐसे ही लोग परधन के हरण करने का भाव रखा करते हैं। तो चोर पुरुष का चित्त न तो मनुष्य के बीच में स्थिर रहता है और न अकेले वन में, न जंगल में कहीं पड़े रहने में स्थिर रहता है, वह निरंतर भयभीत रहता है। कोई जान न जाय, किसी को भेद प्रकट न हो जाय, मुझे कोई पकड़ न ले और उस शिकारी द्वारा पीछा किए गए हिरण की नाईं वह सदा भयभीत रहता है और जगह जगह भटकता रहता है। अपनी रक्षा के लिए अनेक ठौर ढूँढ़ता रहता है।

अस्तेय महाव्रत से आत्मध्यान की पात्रता- चोर पुरुष को आत्मध्यान की पात्रता नहीं होती और आत्मध्यान ही जीव का शरण है, वास्तव में। किसी अन्य पदार्थ से, किसी अन्य समागम से जीव को कुछ लाभ नहीं है। तो वह ध्यान जगे उसके लिए यह आवश्यक है कि यह चोरी नामक पाप से अत्यंत दूर रहे। सभी पापों से दूर रहने में आत्मा का कल्याण है। उसके ही प्रसंग में यह चोरी के त्याग का प्रकरण चल रहा है। साधुजनों के अचौर्यमहाव्रत होता है, अतएव वे निर्भय और निरंतर प्रसन्न रहा करते हैं और ज्ञायकस्वरूप निज भगवान की उपासना के लिए उनकी उमंग रहा करती है तथा अपने आत्माभगवान का दर्शन पाकर वे प्रसन्न होते हैं और कर्मों से छूटने का वे उद्यम करते हैं।


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