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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 579

From जैनकोष



संत्रासोद्भ्रांतचेतस्कश्चौरो जागर्त्यहर्निशम्।

वध्येयात्र ध्रियेयात्र मार्येयात्रेति शंकित:।।

अनादि से पर को शरण मानने की भूल- अनादिकाल से लोक में भ्रमण करते हुए इस जीव को आज तक कहीं भी कुछ शरण नहीं मिला। यद्यपि इस जीव ने मोहवश प्रत्येक पर्यायों में जो इसे मिला मोह करके शरण उसे माना। जैसे कि आजकल भी लोग अपने घर के कुटुंब को वैभव को शरण मानते हैं, उनसे हमारा हित है ऐसा विश्वास रखते हैं इस ही प्रकार इस जीव ने भव-भव में अनेक परद्रव्यों को शरण माना है, किंतु यह अब तक भी शरण नहीं प्राप्त कर सका। सबका वियोग हुआ, और जितने काल रहे परपदार्थ उतने काल भी वे मात्र स्वयं में परिणमते रहे, मुझमें कुछ उत्पाद व्यय न कर सके, मैं ही भ्रमवश शरण की कल्पना करता रहा, तो वास्तव में तो इस आत्मा को बाह्य में कुछ शरण है नहीं। इसका शरण तो केवल आत्मस्वरूप ध्यान है। मैं यथार्थ क्या हूँ, इस प्रकार के सहज आत्मस्वरूप का श्रद्धान होना, ज्ञान होना और इस ही ओर लगना यही वास्तविक शरण है। यह इस जीव ने अब तक किया नहीं। अब इतना विशुद्ध कुल पाया, शासन पाया, नरभव मिला, अब भी यदि अपने हित के लिए कुछ चेतें, कुछ विचार करें तो भी भला है।

हमारा शरण आत्मदेव- हमारा शरण हमारे आत्मतत्त्व का ध्यान ही है। वह कैसे मिले, उसका उपाय इस ग्रंथ में बताया जा रहा है। आत्मध्यान के अंग हैं तीन- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र। यही है वास्तविक मूल निधि। यदि यह रत्नत्रय न प्राप्त हुआ और ध्यान के लिए प्राणायाम करना, श्वास रोकना, अनेक क्रियायें भी कर रहे तो भी मोक्षमार्ग की बात नहीं मिल सकती। मुख्य अंग ये तीन हैं, सम्यग्दर्शन का अर्थ है स्वयं जो सम्यक् है अर्थात् अपने स्वरूप से जो यथार्थ है उसका उस ही रूप में श्रद्धान होना और उस ही रूप में ज्ञान चलना और ऐसा ही उपयोग बनाये रहना, ये तीन अंग ध्यान के पूरक है। उसमें सम्यक्चारित्र का यह वर्णन किया जा रहा है। सम्यक्चारित्र के प्रकरण में अहिंसामहाव्रत और सत्यमहाव्रत का वर्णन किया गया है। जिसका मूल प्रयोजन है ज्ञानानंदस्वरूप आत्मा का घात न होने देना और उस ही शुद्ध आत्मा के हित के वचन बोलना, यही है अहिंसा और सत्य। अब अचौर्यव्रत में यह कह रहे हैं कि जो पुरुष परधन को नहीं चाहता है उसके संबंध में विकल्प भी नहीं करता वह अचौर्यव्रत का धारी है और उसमें यह पात्रता है कि आत्मध्यान कर सके।

शंकाशील पुरुषों में आत्मध्यान की अपात्रता- जो पुरुष परधन के हरण का प्रयत्न रखते हैं, उनके संताप उत्पन्न होता है, वे शंकित होकर जगह-जगह भटकते रहते हैं, मैं कहीं पकड़ा न जाऊँ, पीटा न जाऊँ, मारा न जाऊँ ऐसे चोर के चित्त में सदैव शंका रहती है और शंकाशील पुरुष ध्यान का पात्र नहीं होता। यद्यपि प्राय: साधारण भी इज्जत वाला पराये धन को नहीं चुराता है लेकिन किसी भी अंश में चोरी संबंधी विकार बना रहे तो निश्चय ही समझिये कि वह आत्मध्यान का पात्र नहीं है, और, चोरी पाप वही है सर्वत्र घटा लो कि जिस कार्य को करने पर मन में यह इच्छा बनी रहे कि इस कार्य का भेद किसी को न पड़े वे वे सब चोरियाँ हैं। केवल पराया धन हरने भर की बात नहीं है। जो जो भी बात गुप्त होकर करना चाहे, इसका किसी को रहस्य तक भी न मालूम हो, और किसी को इसका रंच तक भी न मालूम पड़े इस प्रकार की इच्छा करके जो भी प्रवृत्ति की जाती हैं वे सब चोरियाँ हैं। जब कभी पद के विरुद्ध कोई कार्य करता है उसको भी छुपकर करने का भाव रखता है वे सब चोरी हैं। जैसे किसी की बड़ी पोजीशन है वह बाजार में जाकर कहीं दूकान पर खड़े होकर चाट खाने लगे तो उसके चित्त में यह बात उठती है कि कोई देख न रहा हो, नहीं तो लोग क्या कहेंगे कि इतने बड़े साहूकार, इतनी पोजीशन वाले, ऐसे धर्मात्मा और ये बाजार में चाट खा रहे हैं तो यद्यपि अपने ही पैसों से खरीदकर खाया, किसी की चोरी नहीं की जा रही है लेकिन छुपकर खाने का भाव बने तो वह भी चोरी है। यों ही हर एक बात में समझिये।

मायाचरण में चौर्य की छाया- जो कार्य यह करता है वह किसी की भी समझ में आये ऐसे कार्य में नि:शंकता रहती है। वह है एक साधुव्रत। तो जो पुरुष चिंताशील रहता है, शंका के कारण आकुल-व्याकुल रहता है वह पुरुष ध्यान का पात्र नहीं है और जो सचेत रहता है, कोई नीच कार्य करने का भाव नहीं करता है वह आत्मध्यान का पात्र होता है। इस चोरी के ही प्रसंग में इतनी भी बात समझ लें कि धर्मकार्य के करते हुए भी जो अपनी मुद्रा, अपने वचन, अपनी चेष्टा को बदलकर और कुछ दिखाने का भाव किया जाता है उसमें भी चोरी का अंश है। जैसे मान लो कोई पुरुष मंदिर में खड़े होकर जैसा चाहे बोल रहा है, राग रागिनी को छोड़कर जल्दी-जल्दी यहाँ वहाँ को निरखकर अटपट बोल रहा है, सिलसिलेवार स्तुति नहीं कर रहा, लेकिन कोई दो चार आदमी आ जायें तो वह कैसा सावधान होकर बोलने लगता है, मुद्रा भी अपनी शांति और भक्ति की बना लेता है। तो पुरानी जो चेष्टा हो रही थी एक सहजस्वरूप की उसको बदलकर एक बड़ा भाव प्रदर्शित करता है, तो आप बतलावो इसमें कुछ मन चोरी जैसा परिणाम पा रहा या नहीं? तो आप समझिये कि हमारे व्यवहार में कितने ढंग से कितनी तरह के चोरी के परिणाम आते हैं। तो इस प्रकार के परिणाम वाले को आत्मा का ध्यान नहीं बनता है।

धर्मपालन से नि:शंकता की उद्भूति- नि:शंक वृत्ति होनी चाहिए, देखिये इसी कारण गृहस्थधर्म बताया गया है कि करना तो चाहिए महाव्रत का कार्य- हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन 5 पापों का सर्वथा त्याग, पर इतनी सामर्थ्य न हो तो अहिंसाणुव्रत पालें। जैसे गृहस्थों को अधिकार है कि ठाठ से भोजन बनायें और खायें, खिलायें। आरंभ का उनके त्याग नहीं है। अहिंसाणुव्रत लिए हैं, कोई साधु जिसने आरंभ का त्याग कर दिया है, अहिंसा का सर्वथा परिहार किया है वह यदि कहीं नदी से या झरने से झरते हुए पानी को भी भरकर पीवे तो समझ लीजिए वह चोरी हुई। और, गृहस्थ वही कार्य करता तो वह चोरी में नहीं आया। अचौर्य अणुव्रत उसने लिया है। तो गृहस्थ नहीं पाल सकता है महाव्रत तो अहिंसाणुव्रत, सत्य अणुव्रत, ब्रह्यचर्य अणुव्रत और परिग्रह परिमाण अणुव्रत ग्रहण किये हैं तो वह अपना कार्य तो नि:शंक कर सकता है। शंका रहना तो आत्मा की उन्नति में बहुत बाधक बात है।

गृहस्थ के दो मुख्य कार्य- गृहस्थ के मुख्य दो ही काम हैं- न्याय से आजीविका करना और धर्मसाधना करना। गृहस्थ को इतना साहस होना चाहिए कि न्यायवृत्ति से रहते हुए यदि हमें गरीबी की परिस्थिति भोगनी पड़े तो उसे भी सहन करेंगे, पर न्याय से, धर्म से चुकेंगे नहीं। हमें किसको अपना रुतबा दिखाने के लिए धन संचय करना है? कौन मेरा साथी है, कौन मेरी विपदा में सहायक है? कोई प्रभु है क्या यहाँ? फिर किसको अपना महत्त्व रुतबा दिखाने के लिए अटपट रूप से धन का संचय किया जाय? ऐसा उसका विशद भान रहता है अतएव न्याय से ही उसकी वृत्ति चलती है। न्यायवृत्ति से रहकर भाग्यवश जो कुछ प्राप्त हो उसही में अपनी व्यवस्था बनाने की कला गृहस्थ ज्ञानी में होती है। तो चोरी करके छुप करके कुछ भी प्रवृत्ति करने की प्रकृति बन जाय तो वहाँ आत्मा के उत्थान का और विकास का अवसर नहीं होता है।


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