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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 580

From जैनकोष



नात्मरक्षां न दाक्षिण्यं नोपकारं न धर्मतां।

न सतां शंसितं कर्म चौर: स्वप्नेऽपि बुद्धयति।।

परधनहरण के आशय में आत्मरक्षा के समझ की भी अपात्रता- जो चोर पुरुष है परधन का हरण करने के स्वभाव वाला है अथवा स्पष्ट रूप से भी परधन का हरण नहीं किया, किंतु किसी भी अन्य रूप में परधन को हर लिया तो ऐसा पुरुष अर्थात् चोर पुरुष न तो आत्मरक्षा को जानता है कि हमारी रक्षा किसमें है और न उसमें चतुराई रहती है। न वह धर्म परोपकार आदिक कर्तव्यों को समझ पाता है और संत पुरुषों का जैसा कार्य करने की तो स्वप्न में भी उसे याद नहीं रहती है। चोर का चित्त निरंतर चोरी में परधनहरण में मग्न रहता है, इस कारण वह उत्तम कार्य नहीं कर सकता। आत्मरक्षा है अपने आपको अधिकाधिक रूप से केवल ज्ञानमात्र सबसे न्यारा प्रतीति में बनाये रहने में। यह बड़ी मूल की बात कह रहे हैं। कितनी भी स्थितियाँ हैं, सबकी रक्षा करते, सबके बीच रहकर अनेक कार्य करने पड़ते, इतने पर भी सब ही भाईयों में एक बात तो अवश्य समानरूप से रहे और यह विचारें कि मुझे अपने आत्मा के यथार्थ सहजस्वरूप में ही निरखना है। वास्तविक और अंतिम कल्याणभूत कार्य यही है, इस बात को वह पुरुष क्या जाने जिसका चित्त परधन के हरण में बना रहता है। चोर पुरुष आत्मरक्षा की बात को नहीं समझ सकता और न उसमें चतुराई आ सकती। चतुराई और विवेक की कला उसमें क्या होगी जिसके निरंतर परधन हरण की बात चित्त में रहती हो। यों समझिये कि परधन हरण की बुद्धि एक प्रकार से अत्यंत कलुषित है। और जैसे मांसभक्षण करने वाले का चित्त निरंतर कलुषित रहता है इसी प्रकार चोर पुरुष का चित्त कलुषित रहा करता है। वह पुरुष विवेक, बुद्धि, चतुराई, दया, परोपकार आदि संत पुरुषों के करने योग्य कार्य को कैसे कर सकता है।

आत्मातिरिक्त अन्यसंगों में असारता- अनेक भवों में भ्रमण करते-करते आज मनुष्य भव में आये हैं, तो यहाँ सार की बात क्या है, सो सोचिये। क्या महल खड़े कर देने में कुछ सारभूत बात मिलती है, अथवा कोई धन वैभव की बुद्धि कर लेने में सारभूत बात नजर आती है? लोगों के द्वारा कुछ अपना नाम, यश बढ़ा है इसमें कोई सारभूत बात समझ में आती है? ये सब स्वप्नवत् बातें हैं, ये सब पराये हैं। किसी भी पर से मेरे आत्मा का उत्पाद व्यय नहीं होता। प्रत्येक पदार्थ अपना अपना ही परिणमन रख रहा है। भले ही अशुद्ध उपादान वाले पदार्थ किसी अशुद्ध उपादान वाले पदार्थ का निमित्त पाकर विकाररूप परिणम जायें इतने पर भी जो विकाररूप परिणमा वह अपने ही परिणमन से परिणमा। किसी वस्तु का किसी भी वस्तु में अधिकार नहीं है, ऐसा तो यह स्वतंत्र जगत है, और यहाँ हम किन्हीं मलिन पुरुषों को प्रसन्न रखने के लिए ही अपना विकारपरिणाम बनायें तो यह कोई विवेक का काम नहीं है।

आत्मोपयोग के अर्थ प्रभुपूजा- विवेक यही है कि जिस किसी भी प्रकार बने यह अनुभव जगे कि मैं सबसे न्यारा केवल ज्ञानानंदस्वरूपमात्र हूँ, ऐसा अनुभव जगने के लिए प्रभुपूजा की जाती है। प्रभु का स्वरूप केवल है, ज्ञानानंदमात्र है, न वहाँ शरीर, न वहाँ विकार, न वहाँ कर्म, न वहाँ कोई तरंग है, ऐसी केवलज्ञान की शुद्ध तरंग चल रही है, जिसमें समस्त लोकालोक स्पष्ट प्रतिभात होता है फिर भी उस संबंधी विकल्प नहीं है ऐसा प्रभु का शुद्ध ज्ञानस्वरूप हमारी दृष्टि में आये तो अपने आत्मा की सुध होती है। तो अपने सहज आत्मतत्त्व की सुध लेने के लिए अर्थात् मैं केवल ज्ञानस्वरूपमात्र हूँ ऐसा ही अनुभव बनाने के लिए प्रभुपूजा की जाती है।

आत्मोपयोग के गुरूपास्ति एवं स्वाध्याय- गुरुवों की उपासना का भी यही उद्देश्य है। गुरुजनों की सेवा इसलिए की जाती है कि ये गुरुजन भी उसी एक पथ पर चल रहे हैं, अर्थात् मेरे आत्मा का मुझे दर्शन परिचय बना रहे, मैं अपना अनुभव किए रहूँ, ऐसी बात इन गुरुवों के चल रही है तो इनके निकट बैठकर और इनकी सेवा में रहकर हमें भी वैसी ही दृष्टि प्राप्त हो, जिससे हम भी अपने को सब जगत से न्यारा केवलज्ञानरूप मान सकें। इसीलिए गुरु सेवा की जाती है। स्वाध्याय भी इसीलिए है। हम किन्हीं भी अनुयोग के ग्रंथों को पढ़े तो पढ़ने का उद्देश्य यह होना चाहिए कि मैं स्व का अध्ययन कर लूँ, मैं यथार्थ निरपेक्षरूप में कैसा हूँ, मेरा सहजस्वरूप क्या है ऐसा मैं अध्ययन कर लूँ उस बात का रहस्य निकाल लूँ ऐसी दृष्टि रखकर स्वाध्याय किया जाता है।

आत्मोपयोग के अर्थ संयमन- जो नाना संयम किये जाते हैं- इंद्रिय का संयम, अमुक चीज न खाना, अमुक इंद्रिय के भोग का त्याग करना आदिक प्रकार से जो इंद्रिय संयम चलता है उसका भी प्रयोजन यही है कि हमारा असंयम में चित्त न जाय। अविरत के काम में हमारा उपयोग न फंसे, संयमरूप रहे तो मैं अपने आत्मा की सुध रख सकता हूँ। तब अपने आपको केवल ज्ञानमात्र अनुभव करने का ही सबसे बड़ा काम है और आप इसे बिल्कुल सत्य निर्णय करके मानें कि मैं यदि यह अनुभव की कला प्राप्त कर सका तो मैंने वास्तविक अमीरी प्राप्त कर ली। मोक्षमार्ग मिल जाना, इससे बढ़कर भी कुछ है क्या लोक में? बड़े बड़े जन भी राजा महाराजा करोड़पति लोग भी प्रभु के चरणों में आते हैं और मोक्षमार्ग की बात चाहते हैं और किसी को मोक्षमार्ग की बात मिल जाय, चाहे पूर्व कर्मवश परिस्थिति कैसी ही हो, दरिद्रता भी आ जाय लेकिन एक यह अनुभूति कला प्रकट हो जाय तो वही वास्तविक अमीरी है और वह संसार के सारे संकटों का त्याग कर अपने आपमें सत्य विश्राम पायेगा, निर्वाण पायेगा। तो संयम भी आत्मरक्षा के लिए किया जाता है।

आत्मोपयोग के अर्थ तपश्चरण- तपश्चरण भी आत्मरक्षा के प्रयोजन से किया जाता है। विषय कषाय के विकल्पों में चित्त बना रहे, यह दु:खदायी है, इस परिणाम से हमें निवृत्त होना है तो क्या उपाय करें? ऐसी प्रेरणा बनाना है कि बार बार जो विषयों में चित्त लगता है क्या उपाय किया जाय कि इनसे उपयोग हटे। तो उसका एक उपाय तपश्चरण भी है। अनशन, ऊनोदर, कायक्लेश, गर्मी सर्दी आदिक सहन करना आदिक बातें केवल उपयोग बदलने के लिए कारण बनती है। यदि अंतरड्.ग में ज्ञान है तो यह आत्मध्यान वहाँ बन लेगा। तो तपश्चरण भी इसीलिए करना होता है कि मैं अपने आत्मा को शुद्धज्ञानस्वरूप अनुभव कर लूँ।

आत्मोपयोग के अर्थ दान- दान की पद्धति एक आत्मरक्षा के लिए है। जो वैभव निकट है उस वैभव से ममत्व न रहे तब ही तो आत्मा की सुध रख सकते हैं। ऐसे गृहस्थ की बात बताई जा रही है जिसे इस परिग्रह से ममत्व नहीं रहता। आवश्यककार्यों में द्रव्य प्रदान करने में रंच भी हिचकिचाहट नहीं है क्योंकि उसे परिग्रह से मोह ही नहीं है, जो परिमाण करके रख रहा है वह गृहस्थी के कर्तव्य के नाते रख रहा है, सो उसे यह पूर्णतया विदित है कि जितना भी परिग्रह हो उतने में ही गुजारा किया जा सकता है। कोई यह बता सकता है कि गृहस्थ का गुजारा कितना वैभवशाली बनने पर हुआ करता है? उसकी बाहरी रूपरेखा है क्या? वह तो अपने मन की बात है और मूल की बात है; जो हजारपति हैं वे भी अपना गुजारा कर लेते हैं कि नहीं? जो करोड़पति हैं वे भी यह महसूस करते हैं कि हमारा ठीक गुजारा चल नहीं पाता है। तो यह तो सम्यग्दृष्टि गृहस्थ में कला है कि जो कुछ भी वैभव प्राप्त हो उसमें ही वह धर्महेतु भी निकालता है और अपना गुजारा भी करता है। उसे परवाह नहीं है। वह किसी भी परिस्थिति में अटक नहीं मानता। उसे तो केवल एक आत्मानुभूति की रुचि जगती है। तो समझ लीजिए कि मनुष्यभव पाने का मुख्य काम है आत्मरक्षा।

परधनाभिलाषा में आत्मरक्षा की असंभवता- जो पुरुष परधन के अभिलाषी हैं वे आत्मरक्षा नहीं कर सकते, अतएव सूक्ष्मरूप में भी, अतिचाररूप में भी हम चोरी के दोष के पात्र न बनें, इस ओर हमारी दृष्टि होनी चाहिए और वह दृष्टि तभी बनेगी जब हम सही निर्णय कर लें और यह संकल्प कर लें कि हमें तो सही आचरण से ही रहना है, हमें किसी अन्य को प्रसन्न नहीं करना है। हम अपने आपको प्रसन्न कर सकें, निर्मल बना सकें, अपने आपके स्वरूप में उपयोग लगाकर अपने को प्रफुल्लित बना सकें तो वह मेरा सही पुरुषार्थ है। सारे जगत को क्या बतलाना? कोई किसी को प्रसन्न कर ही नहीं सकता। कोई प्रसन्न होगा, कोई अप्रसन्न होगा तब ऐसी स्थिति में जो सही काम हो वही किया जायेगा ना। उस सही काम के होने पर कोई प्रसन्न होता हो तो हो, हमें तो अपने आपके परिणाम निर्मल रखना है, सबका हित सोचना है और अपने आपको धर्ममार्ग में, ध्यानमार्ग में, अनुभवमार्ग में लगाना है, और सही ऐसा काम करने वाले के ज्ञानी पुरुष तो अवश्य अनुयायी होते हैं।


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