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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 59

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वपुर्विद्धि रुज क्रांतं जराक्रांतं च यौवनम्।

ऐश्वर्यं च विनाशांतं मरणांतं च जीवितम्।।59।।

देह की रोगाक्रांतता― हे आत्मन् ! तू शरीर को रोगों से भरा हुआ समझ और जवानी को बुढ़ापे से घिरा हुआ समझ, तथा ऐश्वर्य संपदा को विनाशीक जान और जीवन को मरणवत् जान। अनित्य भावना के प्रसंग में इस श्लोक में 4 बातों पर प्रकाश डाला है, प्रथम तो इस शरीर को रोगों से आक्रांत समझ, कितनी ही प्रकार के रोग इस शरीर में हुआ करते हैं। आयुर्वेद शास्त्रों में इन रोगों की संख्या लाखों में बताई है। शरीर में वात, पित्त, कफ― ये तीन धातुयें हैं। जब इनमें विषमता हो जाती है तो अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। शरीर रोगों से भरा हुआ ही है। एक भी मनुष्य ऐसा न मिलेगा जिसको किसी प्रकार का रोग न हो, बुखार, जुखाम आदि बड़े रोग न हों, पर जो समझते हैं कि मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ वे भी किसी न किसी रोग से भरे हुए हैं। हो सकता है कि कोई स्थायी रोग न हो। प्रतिदिन यह फर्क पड़ जाता है कि सुबह इस शरीर की कुछ स्थिति है, दोपहर को कुछ स्थिति है, शाम को इस शरीर की कुछ स्थिति है। जिन्हें हम स्वस्थ समझते हैं, नीरोग जानते हैं ऐसे नीरोग पुरुष के शरीर में भी एक दिन में कई स्थितियाँ बन जाया करती हैं।

अनित्य शरीर की अप्रेयता― हे आत्मन् ! जिस शरीर को देखकर तुझे अभिमान उत्पन्न होता है उस शरीर को तू रोगों से घिरा हुआ जान। यह शरीर प्रेम के योग्य नहीं है, रोगों से घिरा हुआ है। यह शरीर अनित्य है। अनित्य के दो अर्थ हैं, एक अर्थ तो यह है कि नष्ट हो जायेगा। जब शरीर रोगों से व्याप्त है तो इसके विनाश होने के साधन रोग आदिक ही तो हैं। रोगों से इस शरीर की व्याप्तता बनाने का भाव यह है कि शरीर विनाशीक है। अनित्य का दूसरा अर्थ यह है कि यह शरीर प्रतिक्षण अपनी स्थितियाँ बदलता रहता है। सुबह कैसा शरीर, शाम को कैसा शरीर है? उसमें अंतर हो जाया करता है। रोज ही यह अनित्य है और अंत में इसका विनाश भी है। ऐसे विनाशीक रोगी, असार शरीर से प्रीति मत करो, तू अपने स्वभाव का स्मरण करके अपने स्वभाव में रति करो।

यौवन की जराक्रांतता― इस श्लोक में दूसरी बात कही गई है कि यह जवानी बुढ़ापे से आक्रांत है। जवानी सदा बनी रहे ऐसा कोई मनुष्य नहीं देखा होगा। जवानी खिरती है, बुढ़ापा आता है। जवानी के बाद बचपन भी आया करता है क्या? मरण न हो तो जवानी के बाद बुढ़ापा ही आया करता है। इस शरीर का नाम शरीर क्यों है? शीर्यते इति शरीरम्। जो शीर्ण हो जाय, छिन्नभिन्न हो जाय उसका नाम है शरीर। तो शरीर शब्द ही यह बतलाता है कि ये छिन्न-भिन्न हो जायेगा, और शरीर में धातुवों की प्रबलता रहना, रक्त माँस आदिक पुष्ट रहना―इसका ही नाम जवानी है। तो जवानी बुढ़ापे से घिरी हुई होती है।

ऐश्वर्य की विनाशांतता― यहाँ तीसरी बात कही गई है कि ऐश्वर्य विनाशांत होता जिसको जो वैभव मिला है उस सबका विनाश होना है। आज पुराण और इतिहासों में देख लो, जिसके पास जो वैभव था, न वह वैभव रहा और न वे खुद रहे। जिनके पास बड़ा ऐश्वर्य था, बड़ा वैभव था वह सब विनष्ट हो गया। तो जो भी जिसको मिला है वह नियम से बिछुड़ेगा। जो बिछुड़ जाय वह मिले अथवा न मिले, पर जो मिला है वह नियम से बिछुड़ेगा। ऐश्वर्य मिला है, संपदा का समागम हुआ है तो जरूर नष्ट होगा। चाहे अपने जीते जी यह नष्ट हो जाय, खुद ही मर जाय तो यों विवेक हो जाय। किसी भी प्रकार से वियोग हो, पर यह नियम है कि जिन पदार्थों का संयोग हुआ है उसका नियम से वियोग होगा।

जीवन की मरणांतता― चौथी बात कही गई है कि यह जीवन मरणांत है अर्थात् इसका निकट मरण है। किसका जीवन ऐसा हुआ कि वह जीता ही रहा, मरा कभी नहीं अथवा मरेगा कभी नहीं? अरे जीवन मरण सन्मुख ही हुआ करते हैं। मरण के बाद जीवन हो या न हो इसका कोई नियम नहीं है। संसारी जीवों के मरण के बाद जीवन होता रहता है, किंतु अयोगकेवली भगवान के मरण अर्थात् आयु के विनाश के बाद फिर जीवन नहीं मिलता। पर जीवन के बाद मरण नियम से हुआ करता है। इस ओर दृढ़ नियम है।

विनाशीक पदार्थों में राग न करने का कर्तव्य― यह संसारी प्राणी इन चार प्रकार की बातों में आसक्त होकर अहंकारी और बेसुध बने हुए हैं। शरीर में अति तीव्र ममता है। जवानी आये तो उस शरीर को निरख निरखकर भी आप चित्त में खुश रहा करते हैं, ऐश्वर्य पाये तो उसका भी बड़ा गर्व रहा करता है और जीवन की तो तीव्र अभिलाषा रहा ही करती है। आचार्यदेव कह रहे हैं कि ये चारों के चारों पदार्थ विनाशीक हैं। नष्ट होने वाले पदार्थों में राग मोह मत करो।


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