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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 621

From जैनकोष



प्रवृद्धमपि चारित्रं ध्वंसयत्याशु देहिनाम्।

निरुणद्धि श्रुतं सत्यं धैर्यं च मदनव्यथा।।

लोकबलशाली पुरुषों का भी कामवीर द्वारा मानखंडन- कोई पुरुष अपने बल के कारण मानरूपी ऊँचे पर्वत की शिखर पर चढ़ा हुआ रहता हो, कोई पुरुष धन बल से, विद्याबल से अन्य-अन्य बलों से शिखर पर चढ़ा रहता हो, वह लोकबल में उच्च भी हो, लेकिन ऐसे पुरुष का भी मान यह कामरूपी बैरी क्षणभर में खंडित कर देता है। काम की ज्वाला के सामने किसी का मान भी नहीं रहता। इतना निष्कृष्ट है यह काम भाव। यह काम नीच से नीच काम कराकर ऐसे बड़ों को भी उसके मानरूपी पहाड़ को धूल में मिला देता है। अनेक ऋषि जो अपने तपश्चरण से कुछ बहुत ऊँची साधना तक भी पहुँच गए थे उनमें से कोई कोई ऐसी इस विद्या सिद्धि के बहाने से धीरे धीरे उस काम की ओर बढ़कर पतित हुए कि उनका निर्वाण समाप्त हो गया। भले ही वे कुछ अपने चमत्कार के कारण लोक में देवता रूप से मान लिए गए हों, लेकिन श्रेयोमार्ग से तो च्युत हो ही गए। तो बड़े से बड़े अभिमानशाली पुरुषों का भी मान इस काम के वश होकर नष्ट हो जाता है। जो पुरुष इंद्रिय के विषय में आसक्त नहीं रहता वही पुरुष सुरक्षित रह सकता है, लेकिन जैसे ही कोई भी पुरुष इस मनोजविकार से व्यथित हुआ कि उसका अभिमानरूपी पहाड़ सब धूल में मिल जाता है। जो पुरुष काम व्यथा से अत्यंत दूर होता है वही आत्मध्यान का पात्र होता है। इस तथ्य को बताने के प्रकरण में इस काम की निंदा की जा रही है कि यह कामविकार कितना अहितकारी भाव है।


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