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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 632

From जैनकोष



स्नुषां श्वश्रूं सुतां धात्रीं गुरुपत्नीं तपस्विनीम्।

तिरश्चीमपि कामार्तो नर: स्त्रीं भोक्तुमिच्छति।।

जीवों की ज्ञानानंदविकासेच्छा- हम आप सब जीव हैं और सभी जीवों का स्वरूप ज्ञान और आनंद है। जैसे किन्हीं बाह्य पुद्गलों में हम निरखते हैं तो वहाँ रूप, रस, गंध, स्पर्श नजर आता है ऐसे ही आत्मा में निरखें तो क्या स्वरूप नजर आता है? वह स्वरूप है ज्ञान और आनंद। अतएव जीव स्वयं सुखी है, इसका सुख स्वरूप ही है। जीव की चाह दो प्रकार की होती है। एक तो हमारा ज्ञान अच्छा बढे़ और एक आनंद मिले। किसी भी परिस्थिति का प्राणी हो, ज्ञान और आनंद की इच्छा जीव के हुआ करती है। बालकों को ज्ञान की बात मिलती है और उन्हें तो प्राय: सभी नई-नई बातें मालूम होती हैं तो उस ज्ञान में वे बड़ा आनंद पाते हैं। नया हिसाब, नया भजन, नई बात, नई कहानी सुनने का कितना चाव रहता है। तो ज्ञान की इच्छा बालक, जवान, बूढ़े सभी को बनी रहती है। इसी प्रकार आनंद की इच्छा भी सबको रहती है। तो इतना तो भला है कि सब लोग अपने स्वभाव की बात को ही चाहते हैं, लेकिन ज्ञानों में ज्ञान क्या है और आनंदों में आनंद क्या है? इसकी परख में भूल हुई कि सारा पटरा उनका उल्टा हो जाता है।

पारमार्थिक ज्ञान और आनंद- ज्ञानों में ज्ञान वही श्रेष्ठ है जो ज्ञान, ज्ञान का भी ज्ञान कर ले। मैं ज्ञानस्वरूप कैसा हूँ और ज्ञान का भी स्वरूप क्या है? जो ज्ञान जानता है उस ज्ञान का स्वरूप क्या है इसका भी जिन्हें ज्ञान हो जाता है उनका ज्ञान ज्ञान है। और, आनंदों में वह आनंद है जिस आनंद को किसी पर के सहारे की जरूरत न पड़े। जो किसी दूसरे पदार्थ का सहारा तक कर आनंद पाते हैं वह आनंद आनंद नहीं है, जो पराधीन सुख है, कर्मों के अधीन है, इष्टजनों के अधीन है, जिस आनंद का अंत है, जिस आनंद के पाने के बीच-बीच अनेक दु:ख भरे पड़े हुए हैं वह आनंद आनंद नहीं है। आनंद वही है जो निरपेक्ष है, स्वाधीन है, सहज है। वह आनंद तब मिलता है जब ज्ञान अपने ज्ञानस्वरूप को जानता है। जो ज्ञान अन्य पदार्थों का विकल्प नहीं करता उस समय में आत्मीय आनंद प्रकट होता है। ऐसे ज्ञान और आनंद की झलक जिन्हें हो जाती है उनके धर्मरुचि है, धर्म का विकास है, वे मोक्षमार्गी हैं। वे मोक्षमार्ग को पार करके निर्वाण प्राप्त करेंगे। यह पथ सबके लिए आदरणीय है। जैनशासन के उपदेश का सार यही है।

ज्ञानी गृहस्थ का लक्ष्य- इस अतुल किंतु गहन आत्मीय मार्ग को जो नहीं पार कर सकते ऐसे ज्ञानी पुरुष विवेक सहित गृहस्थी को बसाते हैं। उस गृहस्थी को बसाने का प्रयोजन यही है कि हमारी अनर्गल हिंसा में प्रवृत्ति न हो, किसी की यह चोरी न करें, किसी परस्त्री को, पर पुरुष को बुरे भावों से न देखें। और, परिग्रह का भी अनाप सनाप संचय न करे। इन मोटे पापों से हम बचे रहें, इसके लिए कुछ थोड़े से पाप उसने स्वीकार किए हैं। स्वीकार नहीं किए बल्कि स्वीकार करने पड़ते हैं।

ज्ञानी गृहस्थ की प्रवृत्तियों का आधार- जैसे भोजन में, आरंभ में, उद्यम में कुछ हिंसा हो जाती है, किसी अन्यायी का शत्रु मुकाबला करने में उन मनुष्यों का घात हो जाता है तो ऐसी वृत्तियाँ बन जाती हैं गृहस्थी में। इसके सिवाय अन्य हिंसायें छूट जाती हैं ज्ञानी गृहस्थ की। ज्ञानी गृहस्थ संकल्प से हिंसा नहीं करता। असत्य संभाषण व्यापार आदिक की बात कहने का दोष तो लगता है, वह तो असत्य है ही, पर व्यापार आदिक की कुछ बात बोलने का असत्य माना गया है, क्योंकि वह आत्मा के हित की बात नहीं है। वह एक लौकिक बात है और फिर जो व्यापार आदिक में झूठ बोले जाते हैं वे महा असत्य हैं। और ज्ञानी गृहस्थ अपनी गृहस्थी में काम चलाने के वचन व्यवहार के सिवाय और कुछ अनात्मीय वचन नहीं बोलता। इस प्रकार अचौर्य अणुव्रत में स्थूल चौर्य त्याग रहता है, चीजों का धरना, उठाना, रक्षा करना, कभी अपनी ही चीज की रक्षा के लिए कुछ झूठ भी बोल लिया जाता है, अपनी ही चीज छुपाकर रखी जाती है ये सब काम करने होते हैं, पर ज्ञानी गृहस्थ मोटी चोरी नहीं करता। इसी प्रकार गृहस्थ कामवासना का विजयी न हो सकने से जिससे विवाह हुआ है उस ही स्त्री में संतुष्ट रहता है, अन्य स्त्रीजनों में रंच भी विकार भाव नहीं लाता। इसका कारण यह है कि वह अपनी स्त्री में भी आसक्त नहीं है। वह जानता है कि यह शरीर मल, मूत्र, रुधिर आदि अपवित्र चीजों से भरा है, इसमें सार का कुछ नाम नहीं है जो प्रीति करने के योग्य हों ऐसे ज्ञानी पुरुष को काम सताये तो उसके विवेक यह रहता है कि वह अपनी स्त्री से संतुष्ट रहता है। इसी प्रकार गृहस्थों के परिग्रह परिमाण होता है। परिग्रह का परिमाण हुए बिना तृष्णा का महा दोष लगता है, सारे जगत के परिग्रह का दोष लगता है, जिसके परिग्रह का परिमाण नहीं है। कुछ तो परिमाण हो लाख दो लाख, 10 लाख हजार, तो प्रमाण होने पर फिर इससे अधिक संपदा वालों को देखकर मन में ऐसा विकल्प नहीं उठता कि मैं ऐसा नहीं हूँ क्योंकि उसने नियम लिया है कि हमारा तो 2 लाख का परिमाण है। करोड़पति भी दिख जाय तो उसके चित्त में तृष्णा नहीं जगती कि मैं ऐसा क्यों न हुआ? साथ ही आश्चर्य भी नहीं होता है। वह तो जानता है कि सब पुण्य का फल है, सो भी सांसारिक चीज है। संपदा भी एक तरह की विपत्ति है, उसे आश्चर्य भी नहीं होता। तो यों जो सम्यग्ज्ञान सहित रहते हैं उनका जीवन शांति और निराकुलता में व्यतीत होता है। तो ऐसे पुरुष तो विवेक सहित अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

कामार्तों की अधमेच्छा- जिन्हें तत्त्व के स्वरूप का बोध नहीं है, एक इस शरीर को ही अपना सर्वस्व आत्मा मानते हैं ऐसे पुरुषों के पाप में निरर्गल प्रवृत्ति होती है। सब विषयों में प्रधान विषय है काम। पशु, पक्षी, मनुष्य सभी काम से पीड़ित होकर जो चाहे काम कर लेते हैं जो काम चिंतवन में भी नहीं आ सकते। कामी पुरुष के योग्य अयोग्य कुछ भी विचार नहीं रहता, वह पुत्रवधु, सास, गुरु की स्त्री, तपस्विनी सभी के संग भोग भोगने की चाह करता है। तो उस चाह में कितना अंधेरा है कि जिस अंधेरे में कुछ भान भी नहीं रहता। जगत में स्व पर क्या है, हित अहित क्या है, यह कुछ उसे पता नहीं रहता।

ज्ञान की स्वच्छता का वैभव- भैया ! ज्ञान सही बना रहे इससे बढ़कर और कोई विभूति नहीं है, कोई बड़े धनिक घराने में पैदा हो जाय और उसका ज्ञान व्यवस्थित नहीं है तो उसका जीवन क्या जीवन है, उससे तो दरिद्र मनुष्य भला है, जिसके कुछ बुद्धि तो है, प्रभु का कुछ नाम तो ले सकता है। यदि अपना ज्ञान सही हो, बुद्धि धर्म की ओर चले तो इससे बढ़कर संपदा कुछ न समझिये। जिनके बाह्य संपदा है उनका चित्त अगर धर्म में है तो सोने में सुगंध जैसी बात है। धर्मशून्य मनुष्य का जीवन कोई जीवन नहीं है। कम से कम दिन रात में दो घंटे तो धर्मरुचि में, धर्मपालन में, स्वाध्याय में, ज्ञानार्जन में ऐसे लगायें कि उस समय कोई बाहरी विकल्प न आने दें। रात दिन किसी बात की चिंता करते रहने से कोई सिद्धि नहीं हो जाती है। चित्त और व्यग्र रहता है, पर यह साहस ज्ञानी ही तो कर सकता है। अभी दुकान की ड्यूटी दिया, मंदिर में आया तो दुकान के सारे विकल्प छोड़कर केवल एक धर्म की धुन बनायी, यह बात ज्ञानी पुरुषों से ही बन सकती है। तो धर्म की धुन ही एक वास्तविक शरण है।

केवलीप्रणीत धर्म का शरण- हम आप लोग पूजा में बोलते हैं- केवली पण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि। मैं केवली द्वारा बताये गए धर्म की शरण को प्राप्त होता हूँ। प्रभु ने धर्म बताया है कि हे भव्य आत्मन् ! धर्म तुममें ही है। तुम अपने स्वभाव पर दृष्टि दो और धर्म की शरण गहते रहो। प्रभु ने यह उपदेश नहीं किया कि तुम्हें यदि संसार के दु:ख मिटाना हो तो तुम हमारी शरण में रहो। उनका उपदेश है कि तुम्हारा शरण तुम्हारे स्वभाव में ही मौजूद है, उसकी दृष्टि करो, उसमें लीन हो और मुक्ति प्राप्त करो। भला जो इतना निरपेक्ष शुद्ध बिना लाग लपेट के सत्य उपदेश करे तो ऐसा उपदेश सुनने वाला तो प्रभु की उपासना में भक्ति में गद्गद् हो जायगा। जब प्रभु के उपदेश किए हुए मार्ग से हम अपने आपमें कोई अद्भुत आनंद पायेंगे तो हम प्रभु के कितने भक्त बनेंगे?

प्रभुता की परम भक्ति- प्रभु का भक्त वही है सच्चा जो उसके गुणों को निरखकर उसके प्रति प्रेम बनाये। वही है वास्तविक प्रेम। और, गुण कुछ न मालूम हो लेकिन कहता रहे कि यह बड़ा ज्ञानी है, बड़ा महात्मा है, बड़ा त्यागी है, ऐसा बड़ा-बड़ा सुनकर ही जो भक्ति की जाती है उस भक्ति में अंतर है। किसी साधु के किसी महापुरुष के गुण भी समझ में आ रहे हों, उनके भीतर की दृष्टि भी अपने अनुभव में आयी हो और फिर भक्ति जगे तो उस भक्ति की अपूर्वता है और एक कहने सुनने मात्र से भक्ति जगे तो वह एक रूढ़ि भक्ति है। ऐसे ही प्रभु के गुण समझकर प्रभु का क्या स्वरूप है, कितना निर्दोष स्वरूप है, केवलज्ञान है, शुद्ध आनंद है, जहाँ रागद्वेष मोह का निशान नहीं है, जिसका ज्ञान इतना स्पष्ट है कि समस्त लोक और अलोक एक साथ ज्ञान में झलक रहे है ऐसी प्रभु के गुणों की समझ आये और फिर प्रभु के भक्त बने वह भक्त है अपूर्व, और चूँकि प्रभु की मूर्ति है, इसकी वंदना करने से पुण्य होता है। केवल एक ऊपरी बातों से जो भक्त होता है उसमें वह अपूर्वता नहीं है इस कारण कल्याणार्थी पुरुष को सर्वत्र गुणग्राही होना चाहिए।

देवगुरुस्वरूपनिर्णेता का संकटहारी कदम- देवभक्ति करें तो देव के गुणों की समझ बनायें। देव क्या चीज है? गुरुभक्ति करें तो गुरु के गुणों की समझ आनी चाहिए। गुरु का अर्थ है ज्ञान और वैराग्य का पुतला। यों समझ लीजिए छोटे शब्दों में। जहाँ स्पष्ट ज्ञान हो और संसार के मायाजालों से विरक्ति भी हो, ऐसे आत्मा का नाम है गुरु। और, देव ऐसे ही ज्ञान वैराग्य की उत्कृष्ट साधना से जो पूर्व में तो सर्वज्ञ हो गए हैं ज्ञान पूर्ण विकसित हो गया है और वैराग्य भी पूर्ण बन गया है, रागद्वेष का सर्वथा अभाव हो गया है, ऐसे सर्वज्ञ और वीतराग को देव कहते हैं। तो जैसे देव का हम स्वरूप सर्वज्ञ और वीतराग को जानते हैं ऐसे ही गुरु का भी स्वरूप है- उसमें सर्वज्ञता का लगार तो हो, वीतरागता का कुछ अंश तो हो। तो उनके गुणों को निरखकर जो भक्ति की जाती है वह सच्ची भक्ति है और वही सच्चा भक्त है। तो जिसे अपने स्वरूप का परिचय है, देवगुरु के स्वरूप का परिचय है, शास्त्र में क्या उपदेश है वह तथ्यभूत है, इन सबका निर्णय है ऐसा पुरुष संसार के संकटों से दूर होने का उपाय कर लेता है।


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