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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 633

From जैनकोष



किं च कामशरब्रातजर्जरे मनसि स्थितिम्।

निमेषमपि बध्नाति न विवेकसुधारस:।।

कामजर्जरित मन में विवेक सुधाबिंदु के ठहरने का अभाव- जो इच्छा के वाणों से जर्जरित हो गया है और विशेषतर मदनवाणों से जर्जरित हो गया ऐसे मन में रंचमात्र विवेकरूपी अमृत की बूँद नहीं ठहर सकती है। जिसके हृदय में तृष्णा बसी है उसके चित्त में विवेक कहाँ से ठहरेगा? जो इच्छायें करता रहता है, मन में आशावों के पुल बाँधता ही रहता है उसे लोग शेखचिल्ली कहा करते हैं। मैं ऐसा करूँगा, फिर यों करूँगा, फिर यों करूँगा, यों पुलावा बाँधने वाले शेखचिल्ली कहलाते हैं। कामेच्छा में तो यह प्राणी शेखचिल्ली से भी अधिक मूढ़ और विपन्न हो जाता है ही, किंतु जिनके परिग्रह का परिमाण नहीं है उनकी भी बड़ी दुर्दशा है, क्योंकि चित्त में बड़ी-बड़ी बातें बनी रहती है। हालांकि कोई गरीब हो तो वह अधिक से अधिक बात तो लाख रुपये की बात सोच ले, उसके ज्यादा बुद्धि ही नहीं है, पर लाख होने पर फिर तो आगे की बात सोचेगा। तो जिसको परिग्रह का परिणाम नहीं है उसमें शेखचिल्लीपना बना रहता है।

तृष्णावी का पुलावा- एक परिग्रह पाप की कथा श्मश्रुनवनीत की पुराण में दी गई है। एक मनुष्य था, जिसका नाम श्मश्रुनवनीत था, हिंदी में मूंछमक्खन कह सकते हो। श्मश्रु का अर्थ है मूंछ और नवनीत का अर्थ है मक्खन। वह प्रतिदिन श्रावकों के यहाँ मट्ठा पीने जाता था। एक दिन उसने मट्ठा पीकर अपनी मूंछ पोंछी तो हाथ में कुछ मक्खन लग गया। सोचा कि यह तो बहुत बढ़िया व्यापार का साधन निकल आया। रोज-रोज मट्ठा पीवेंगे तो कुछ दिनों में काफी मक्खन इकट्ठा हो जायेगा। उसने ऐसा ही काम शुरू किया। रोज-रोज मट्ठा पीवे और मूँछों को हाथ से पोंछ कर मक्खन इकट्ठा कर ले। इस तरह से साल में ही दो-तीन सेर घी जुड़ गया। वह झौंपड़ी में तो रहता ही था। एक बार जाड़े के दिनों में वह उसी झौंपड़ी में ताप रहा था। ऊपर सिकहरे में घी का डबला टंगा था। एकाएक ही शेखचिल्लीपने का वेग दौड़ा। सोचा कि अब हम इस घी को बेचेंगे, करीब दस रुपये का हो जायेगा, फिर दस रुपये से खोमचा लगायेंगे, फिर 100) रुपये हो जायेंगे, फिर दुकान बनायेंगे, फिर हजार हो जायेंगे, फिर जमीन खरीदेंगे, बड़ी खेती करेंगे। भैया ! है अभी झौंपड़ी में, पर सोच रहा है इस तरह से। फिर महल बनवायेंगे, विवाह करेंगे, बच्चे भी होंगे तो बच्चे आयेंगे मुझे बुलाने, कहेंगे कि चलो पिताजी ! माँ ने रोटी जीमने को बुलाया है। वह सब बातें अपने मन में गुन रहा है, है वहाँ कुछ नहीं। तो यों ही कह दिया कि अभी नहीं जाते। फिर कहेगा कि चलो दद्दा ! माँ ने रोटी खाने को बुलाया है तो फिर मना कर देंगे कि अभी नहीं खायेंगे। फिर बुलाने आयेगा तो लात फेंककर बोला कि अबे, अभी नहीं जाते। वह लात लगी डबेले में, डबला आग में गिर गया, घी जलने लगा, झौंपड़ी जलने लगी। वह बाहर निकलकर चिल्लाने लगा- अरे दोड़ों ! हमारा मकान जल गया, स्त्री जल गयी, बच्चे जल गए, जानवर जल गये, सारी संपत्ति नष्ट हो गयी। लोग जुड़ गए। सोचते हैं कि अभी तक तो यह भीख मांगता था और आज यह इस तरह से कह रहा है ऐसी क्या बात है? तो लोग उससे पूछते हैं कि तेरे पास तो कुछ भी न था, भीख मांगता था और इस तरह से क्यों कह रहा है कि मेरे स्त्री, पुत्र, मकान, जानवर, सारी संपत्ति जल गयी? तो उसने बताया कि मेरे पास दो सेर घी था, उसे बेचता तो इस इस तरह से इतने-इतने धनी बन जाते इतने-इतने स्त्री, पुत्र, धन, संपत्ति हो जाते, पर आग में वह घी भी जल गया और झौंपड़ी भी जल गयी तो वे सब कुछ तो जल गए। एक सेठजी समझाने लगे कि जला तो तुम्हारा कुछ भी नहीं, वे सब तुम्हारी कल्पना की ही तो बातें थी। तो एक समझदार सेठजी से कहने लगा कि यह बात तो आपकी भी है। तुम अपने घर के चार प्राणियों को, धन वैभव को जिन्हें अपना समझ रहे हो वे भी तो तुम्हारे कुछ नहीं हैं, वे सब भी तो कल्पना से मानी हुई बातें हैं। वे सब तुमसे अत्यंत भिन्न चीजें हैं।

तृष्णा में विवेक का पलायन- भैया ! इन बाह्य विभूतियों से कोई धनिक नहीं कहलाता, ये सब तो आत्मा से भिन्न क्षेत्र में हैं, भिन्न प्रदेश में हैं। उनसे इस आत्मा का क्या संबंध? कल्पना से ही यहाँ बड़े बन रहे। मान लो कोई कंजूस आदमी है और बड़ा धनी भी है धन को खर्च नहीं करना चाहता, गाड़कर रखता है, खुद भी नहीं ठीक ठीक खा पी सकता तो उसमें और गरीब में अंतर क्या है? हाँ इतना अंतर जरूर है कि कंजूस का कदाचित् भाव बदल जाय तो वह अपनी संपत्ति को दान और परोपकार में तो लगा सकता है, पर यह गरीब यदि दान करने का भाव भी करे तो क्या दान में लगावेगा? उसके पास धन तो है ही नहीं। ऐसा वर्तमान में मात्र औपचारिक तो अंतर है पर जिसके विवेक नहीं, परिग्रह परिमाण नहीं, सबसे न्यारा अपने आत्मतत्त्व को समझता नहीं उस पुरुष के संतोष नहीं जग सकता। तृष्णा लगेगी तो सारे विश्व को चाहेगा और योग्य, अयोग्य का कुछ भी विचार न रखेगा। इच्छावों की रानी है कामेच्छा। जो कामबाण से जर्जरित हैं उनके मन में विवेकरूपी अमृत की बूँद रंच भी नहीं ठहर सकती। जैसे फूटे घड़े में पानी नहीं ठहरता इसी प्रकार कामबाणों से जिसका चित्त छिदा हुआ है उस चित्त में विवेकरूपी अमृत जल ठहर नहीं सकता।

कल्याणार्थी का प्रशस्त पथ- कल्याणार्थी का कर्तव्य यह है कि वह समस्त पदार्थों का न्यारा-न्यारा स्वरूप समझे। घर में जितने जीव हैं वे सब अपने-अपने मालिक हैं। वे अपने आत्मा के ही धनी हैं, स्वतंत्र-स्वतंत्र उनका परिणमन है। भाग्य सबका सबके साथ है, उनका परिणाम उन उनके साथ है। यहाँ कुछ विवेकी पुरुषों का संग जुड़ जाय तो विवेक के कारण कुछ धार्मिक चर्चा कर ले, सो भी सब अपने-अपने भाव की बात करते हैं। कोई किसी का साथी नहीं है यह बात स्पष्ट निर्णय में होनी चाहिए तब शांति प्राप्त हो सकती है। नहीं तो बाहरी चीजें जोड़-जोड़कर कौन शांति पा सकता है? वैभव कितना ही संचित हो जाय पर उसके संचय से शांति नहीं प्राप्त होगी। इस वैभव को क्षणिक जानकर पुण्योदय से जो वैभव प्राप्त होता है उसमें ही अपना बटवारा बना लें। इतना गुजारे के लिए है, इतना दान परोपकार के लिए है, इतना अन्य आवश्यक कार्यों के लिए है। और इसमें करना ही क्या है? मनुष्य हुए हैं, थोड़े दिनों का जीवन है, अंत में मरण होगा ही, इतने दिन स्वाध्याय ज्ञानार्जन में चाव रहेगा। साधु, संत, गुरुवों की आराधना में चाव रहेगा तो हमारा भविष्य उज्ज्वल रहेगा और वहाँ ही अपने आपका दर्शन करके, प्रभु की भक्ति करके वहाँ भी तृप्त रहेंगे। यहाँ के वैभव संग प्रसंग से बस आत्मा को कुछ भी संतोष नहीं हो सकता, न आनंद हो सकता। इस कारण ज्ञान और वैराग्य की शरण लें। धन वैभव के संचय में शरण न मानें। ये समस्त वैभव विनश्वर है, नष्ट होंगे, इनसे मेरे आत्मा में कुछ भी लाभ नहीं। परपदार्थों से राग द्वेष मोह हटे, अपने आपका शरण गहें तो समझिये कि अपने भगवान का दर्शन प्राप्त हो गया। यह सारा संसार तो मायाजाल है, यहाँ की सारी चीजें असार हैं।


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