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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 66

From जैनकोष



अवश्यं यांति यास्यंति पुत्रस्त्रीधनबांधवा:।

शरीराणि तदैतेषां कृते किं खिद्यते वृथा।।66।।

आने जाने की प्रकृति वालों में व्यर्थ का खेद― पुत्र, स्त्री, धन, बंधु, शरीर ये सब अवश्य जाते हैं और जायेंगे। अर्थात् इनका वियोग होता है और वियोग होता रहेगा। फिर इन बाह्यपदार्थों के लिये वृथा खेद क्यों किया जा रहा है? ये 10-20 वर्ष ही तो अधिक से अधिक संग में रहेंगे, सदा संग में न रहेंगे। जो भी समागम मिले हैं ये सब विनष्ट होंगे। इस अनंतकाल के सामने ये 10-20-50 वर्ष कुछ गिनती भी रखते हैं क्या? 100 वर्ष भी, करोड़ वर्ष भी, सागर भी और उत्सर्पिणी काल और कल्पकाल भी इस अनंतकाल के सामने कुछ गिनती नहीं रखते हैं। स्वयंभूरमण समुद्र में जितना पानी होगा उसमें एक बूंद पानी का तो हिसाब लग जायेगा, पर इस अनंतकाल के सामने ये करोड़ वर्ष जल बिंदु बराबर भी कुछ गिनती नहीं रखते हैं। फिर इन 10-20-50 वर्षों की तो बात ही क्या है? जो लोग इन 10-20-50 वर्षों के लिये मौज के साधन, भोगविषयों के साधन, इंद्रियसुख के साधन बनाते हैं, श्रम करते हैं वे अनंत संसारी जीव हैं, व्यामोही प्राणी हैं, मिथ्यादृष्टि जीव हैं। इन नष्ट होने वाले पदार्थों के लिये क्यों खेद किया जा रहा है।

मन के वशीकरण का अनुरोध― देखो भैया ! जैसे कोई उजाड़ करने वाली गाय हो, उसे कितने ही बार खूँटे से बाँध दो, कितने ही उपाय करके बांधो, पर वह गाय दूसरे के खेत उजाड़ करने पहुँच ही जाती है। ऐसे ही यह प्राणी अपने गुण उपवन का उजाड़ करने वाला है। इसे कितना ही मना करो, कितने ही उपदेशों द्वारा समझावो तिस पर भी यह मन, यह उजड्ड गाय, ये इंद्रियाँ उसे उजाड़ने के लिये ही उद्यत हो जाती है। इस जीव पर विपदा वास्तव में रागद्वेष मोह भाव है। जिस विपदा के कारण यह अनंतज्ञान की सामर्थ्य वाला होकर भी आत्मा दबा है, अविकसित है, अपने आपका उत्थान नहीं कर पाता। कुछ उत्थान कर सको या न कर सको, पर एक बार सत्य तो जान जावो। पदार्थ का सत्यस्वरूप जानने पर नियम से दु:ख में अंतर हो जायेगा और आनंद का मार्ग मिल जायेगा।

अज्ञान में ही विह्वलता― जितनी घबड़ाहट है, भय है, शंका है वह अज्ञान विकार में हो रहा है। जब यह जीव अजर अमर अछेद्य अभेद्य निज चैतन्यप्रकाश पर नहीं पहुँचता तो इसके सर्वत्र अँधेरा ही अँधेरा है, वहाँ फिर कुछ नहीं सोचता। यह मैं आत्मा सबसे न्यारा केवल अपने स्वरूपमात्र हूँ, ऐसी दृष्टि जगे बिना शांति का मार्ग तो नहीं मिल सकता। चाहे खूब बढ़िया वैभव मिल गया, स्त्री पुत्र भी अच्छे आज्ञाकारी मिल गए तो उनके संबंध में हम अपने उपयोग को बाहर ही बाहर भ्रमावेंगे कुछ अंतर में शांति न पावेंगे। खूब सुहावना सब कुछ मिल जाय जितना तुम अपनी कल्पना में बात बना सकते हो तो उस ठाठ से कौनसा लाभ उठा लोगे? यह सारी मूर्ख दुनिया जिस ओर दौड़ रही है, चूँकि ये दौड़ रहे हैं तो भली बात होगी, यों ही देखादेखी की दौड़ लगा देते हैं।

संसारी जीवों की प्रकृति― कोई भंगिन मल से भरा हुआ टोकना लिये जा रही थी। किसी सज्जन पुरुष ने उसे ढाँकने को एक बहुत बढ़िया साफ स्वच्छ रंगीन चमकदार तौलिया दे दिया। तीन पुरुष कुछ देर बाद में उसके पीछे लग गये, सोचा कि इसमें कोई बढ़िया चीज होगी। भंगिन ने समझाया अरे क्यों पीछे लग रहे हो, इसमें विष्ठा भरा है। इतनी बात सुनकर उनमें से एक लौट गया। अभी दो उसके पीछे लगे रहे। भंगिन बोली― भाई पीछे क्यों लग रहे हो? इसमें तो मल है। नहीं-नहीं, इसमें तो कोर्इ अच्छी चीज होगी, सुंदर तौलिये से ढकी है। अरे नहीं इसमें मल है। हम नहीं मानते। अच्छा तो हमें खोलकर दिखा दो। भंगिन ने खोलकर दिखाया तो देखकर उनमें से एक लौट गया। एक अभी भी पीछे लगा रहा। भंगिन ने बहुत कहा कि लौट जावो, पर उसने कहा कि हम तो जब अच्छी तरह से सूँघसाँघ कर देख लेंगे, विश्वास हो जायेगा तब लौटेंगे। भंगिन ने तौलिया उघाड़ा, उस पुरुष ने उसे सूँघा। जब सूँघसाँघ कर सही विश्वास हो गया तब वह लौटा। यही हालत इन संसारी प्राणियों की है। कोई तो भोगों को असार समझकर उनमें पड़ते ही नहीं हैं, कोर्इ कुछ भोगों को भोगकर उनसे पृथक् हो जाते हैं और कोई उन भोगों में ही जीवन भर लिप्त रहते हैं।

विवेक― भैया ! यहाँ किनमें अपना यश चाहते हो, सब असार है, सब इंद्रजालवत् है। क्यों यहाँ के रागी द्वेषी मोही प्राणियों के लिये वृथा खेद कर रहे हो? अहो ! यहाँ लोग अपने यश के पीछे हजारों लोगों को भी मरवा डालते हैं। युद्ध में मूल बात कितनी है? एक निज का प्रभाव बढ़ जाय, यश बढ़ जाय―इसके लिये इतना विकट पाप। ओह ! कितना महान् अज्ञान छाया है। संसार में अंधेर नहीं है। जो अज्ञानी है वह अज्ञान का फल भोगेगा, जो विवेकशील है वह विवेक का फल भोगेगा। अपने लिये यह समझो कि गृहस्थी है, धन, जन, परिजन इन सबकी रक्षा भी करनी होती है, फिर भी बात सच जानने से क्यों मुकरते हो? सत्य बात समझ लो तो इससे अनाकुलता हो जाती है। सम्यग्ज्ञान के होने पर अंतरंग में निराकुलता प्रकट हो जाती है। पुत्र, स्त्री, बांधव, शरीर ये सब नष्ट हो जाते हैं और वियुक्त होंगे। इनके लिये वृथा क्यों खेद किया जा रहा है?

अनित्य के प्रेम से हानि― यह अनित्य भावना का प्रकरण चल रहा है। यहाँ के सभी ठाठ विनाशीक हैं, सभी अनित्य हैं। उन अनित्य चीजों के प्रति क्यों इतना व्यामोह किया जा रहा है? कोर्इ पुरुष 20) का खोमचा रखकर रोज अपने परिवार का पालन पोषण करता है। उससे कोई कहे कि देखो हम कल भर के लिये तुम्हें लखपति बनायेंगे और बाद में जो कुछ तुम्हारे पास है वह भी छीन लेंगे, तो क्या वह लखपति बनना स्वीकार करेगा? अरे वह तो कहेगा कि मुझे तो वह 20) का सट्टपट्ट ही भला है जो जिंदगी में साथ देगा। मुझे वह लाखों का वैभव न चाहिये जो मेरा भी सब कुछ छुड़ा देगा। ये मोही प्राणी अनित्य को नित्य मान रहे हैं। यही अज्ञान है।

अनित्य में अनित्यता के निर्णय में शांतिपथ का दर्शन― सभी जीव सुख चाहते हैं, आनंद चाहते हैं, यह बात तो भली है और इनकी प्रकृति के अनुरूप है। जीव को ऐसा चाहिये भी, लेकिन जो सुख नहीं है, दु:खरूप है उसको ही आनंद मानकर यह जीव भोगता है, यह तो उसकी नादानी है ना? तो अनित्य को अनित्य समझ लो। मिट गया तो क्या हुआ, मिटना ही था। कब तक कहाँ तक कौन साथ रहता है? लोग जानते हैं कि मेरी माँ गुजर गई, अनहोनी हुई, पिता गुजर गया तो यह अनहोनी हुई। अरे वह कुछ अनहोनी नहीं हुई। तुम अपनी कल्पना में अनहोनी समझ रहे हो तो अनहोनी हुई। दूसरे के यहाँ कोई गुजर जाय उसे तो अनहोनी की दृष्टि से नहीं देखते। संसार में होता ही है ऐसा, ऐसी समझ बन जाती है। अरे खुद के संबंध में सही निर्णय करने से ही सम्यग्ज्ञान माना जायेगा। इन विनश्वर पदार्थों में प्रीति मत करो और इनके वियोग में खेद मत करो।


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