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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 73

From जैनकोष



यास्यंति निर्दया नूनं यद्दत्वा दाहमूर्जितम्।

हृदि पुंसां कथं ते स्युस्तव प्रीत्यै परिग्रहा:।।73।।

परिग्रहों की चोट― हे आत्मन् ! यह परिग्रह पुरुषों के हृदय में अत्यंत संतापदाह उत्पन्न करके चला जाता है। यह परिग्रह तो ठहरता नहीं है और इसका मूल में जो दस्तूर है कि पुरुषों के हृदय में अत्यंत दाह उत्पन्न करना, सो अपना दस्तूर निभाकर यह परिग्रह बिछुड़ जाया करता है। यह परिग्रह तेरे प्रीति करने योग्य नहीं है। तू व्यर्थ ही परिजन धन वैभव आदिक परिग्रहों से पीड़ित होता है, ये किसी भी प्रकार तेरे साथ न रहेंगे। कर लो, कितना मोह करते हो, कितने दिन रहते हो? कितने तीव्र भाव से करते हो, कर लो। ये मोह के दिन तो तुझसे जाने न जायेंगे, कहे न जायेंगे और वे हैं बहुत अल्प दिन। अंत में विछोह होगा, खेद होगा, बड़ा संक्लेश सहेगा। उचित है कि तू अभी से यथार्थ बोध बना। मेरा मेरे स्वरूप के सिवाय अन्य सब पदार्थों का समागम मुझसे भिन्न है, मेरे हितरूप नहीं है। ऐसी शुद्ध दृष्टि के प्रताप से इस लोक में भी तू प्रसन्न रहेगा और परलोक में भी तू प्रसन्न रहेगा।

मोहियों के ज्ञानवृत्ति पर आश्चर्य― मोही जन ही ऐसा सोचा करते हैं कि इन त्यागियों को, साधुवों को अथवा इन ज्ञानी गृहस्थों को जो घर में रहते हुये भी जल में भिन्न कमल की नाईं रहते हैं, क्या सुख है, अकेले पड़े हैं, किसी से मन ही नहीं मिलाते। न जाने किस धुन में बने रहते हैं, ऐसा मोहीजन सोचते हैं। किंतु आनंद तो उस एकत्व के रुचिया ज्ञानी संतों को ही है। इसे अज्ञानी क्या समझें? जैसे महापुरुषों की उदारता देखकर कंजूसों को आश्चर्य होता है ऐसे ही ज्ञानी संतपुरुषों की विरक्ति को निरखकर अज्ञानियों को आश्चर्य होता है।

दानवृत्ति पर खेद करने वाले कंजूस का दृष्टांत― एक शहर में किसी कंजूस ने किसी धनिक को धन बांटते देखा। उसी समय से उसका चित्त उदास हो गया। ओह ! ये कैसा अपना सारा धन लुटाये दे रहे हैं― उसका सिरदर्द करने लगा, रोनी सी शकल लेकर वह घर पहुँचा। स्त्री उसे उदास देखकर पूछती है―नारी पूछे सूमसे काहे बदन मलीन। क्या तेरो कुछ गिर गयो या काहू को दीन।। ऐ पतिदेव ! आज आप उदास क्यों हैं? क्या आपका कुछ गिर गया है या आपने आज किसी को कुछ दे दिया है? तो सूम कहता है― ना मेरा कुछ गिर गयो, ना काहू को दीन। देतन देख्यो और को तासों बदन मलीन।। मेरा कुछ गिर नहीं गया और न मैंने किसी को कुछ दे डाला है, किंतु औरों को खूब मनमाना धन बांटते हुये देखा तो मेरा दिल हिल गया। ओह ! कैसा ये अपना सारा धन लुटाये जा रहे हैं? इसी से मेरा चित्त आज दु:खी है।

ज्ञानियों की उदारता पर मोहियों को आश्चर्य― जब किन्हीं महापुरुषों की कहानी को ये अज्ञानीजन सुनते हैं कि वे इस प्रकार के वैरागी थे, बिना ही विवाह किये निर्ग्रंथ दीक्षा धारण करके बड़ी कठिन तपस्या धारण की, ये राजपुत्र इतने सुख साधनों के बीच रहकर इस प्रकार विरक्त रहे, तो उनके दिल में एक चोट सी पहुँचती है और आश्चर्य होता है कि ओह ! उनका दिमाग बिगड़ गया था क्या? आत्मा की सुध रखने वाले ज्ञानी सत्पुरुषों को किस प्रकार का विलक्षण आनंद जगता है? इसकी पहिचान मोहियों को कभी नहीं हो सकती।

अरक्ष्यों में प्रीति की व्यर्थता― ये चराचर पदार्थ चेतन अचेतन परिग्रह, समागम वे तेरे चित्त में दाह उत्पन्न करके निर्दय होकर चले जायेंगे, अर्थात् तू तो इन पदार्थों को बड़ा साज श्रृंगार करके रखता है, धन वैभव बढ़ा-बढ़ाकर तू इनका बहुत ढेर संचय बना लेता है, लेकिन ये सबके सब चेतन अथवा अचेतन कोर्इ दया न करेगा। अचेतन तो दया ही क्या करें? जब समय आयेगा, बिगड़ जायेगा। पर चेतन तो दया कर सकता है ना? अरे ये भी दया न करेंगे। मरने वाले से घर के बचे हुए लोग बड़ी प्रार्थना करते हैं, भाई मत जावो, और मरने वाला सुनता नहीं है तो भगवान को पुकारते हैं, हमारा भाई तो सुनता ही नहीं है, वह तो जा ही रहा है, हे भगवन् ! वह न जा पाये। सभी लोग बड़े-बड़े प्रयत्न करते हैं, पर मरने वाला तो निर्दय होकर वियोग ही करता है। यह सब एक अलंकृत भाषा में कहा जा रहा है। तो जिनके प्रसंग में तूने इतने विकल्प किये, श्रम किया वे सब जब तेरे साथी ही नहीं होते तो इन परिग्रहों के प्रति तू इतनी अधिक प्रीति क्यों करता है?

संयुक्तों के वियोग की अवश्यंभाविता― इन समागमों को कभी तो बिछुड़ना है। जिंदगी में भी बिछुड़े तो बिछुड़े, नहीं तो मृत्यु के समय तो बिछुड़ेंगे ही, उस समय दु:खी होना पड़ेगा। तो जब तक बिछुड़ना ही है तो अभी से ट्रेनिंग क्यों न कर लो कि ये सब अवश्य बिछुड़ेंगे। इस जिंदगी में परोपकार में, परसेवा में जिस किसी भी प्रकार से इन परिग्रहों के विछोह करने की ट्रेनिंग ले लो ताकि उस बिछोह में आकुलता न हो सके, यही तो पुरुषार्थ का अभ्यास है। हे आत्मन् ! वृथा इन धन धान्यादिक परिग्रहों में प्रीति मत करो। अपने आपके आत्मा के कल्याण का प्रोग्राम बनावो और उस ही में बढ़ो।


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