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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 74

From जैनकोष



अविद्यारागदुर्वारप्रसरांधीकृतात्मनाम्।

श्वभ्रादौ देहिना नूनं सोढ्व्या सुचिरं व्यथा।।74।।

रागांधों की व्यथा― मिथ्याज्ञान से उत्पन्न हुए राग के दुर्निवार प्रसार में जो जीव अंध हो गये हैं उन जीवों को अवश्य ही नारकादिक दुर्गतियों में बहुता काल पर्यंत दु:ख सहने पडते हैं, इनकी क्या तुझे खबर नहीं है? इस संसार में एक व्यापक दृष्टि से निरखने वाला पुरुष जानता है कि कभी कहीं अन्याय होता ही नहीं। वह कैसे? जिसने जैसा भाव किया, जिसने जितना पुण्य बाँधा उसके उदय के अनुकूल बीत रही है। उसके ही अनुसार सब फल पा रहे हैं। भले ही कोर्इ अत्याचारी है, लेकिन उस अनाचार के कारण घटकर जो भी पुण्य है उसका फल पा रहा है। अब जो कर रहा है उसका निकट काल में ही फल पा लेगा। एक इस वस्तुपरिणमन की दृष्टि से जिस योग्यता वाला पदार्थ है, जिस योग्य निमित्त को पाकर उस रूप परिणमन कर सकता है उस रूप यह सब विभाव व्यवस्था बन रही है। हाँ हितदृष्टि से देखो तो खोटी बात का नाम अन्याय है। उसके करने से न स्व का हित है और न पर का हित है।

स्वपरहित भावना― यहाँ इससे हमें यह शिक्षा लेनी है कि हम जैसा परिणाम करते हैं उसका फल उस रूप से हमें अवश्य भोगना होगा। अत: हम सबका हित सोचें। शत्रु के प्रति भी यही भावना करें कि हममें सद्बुद्धि जग जाय, यदि ऐसी बात हो गयी तो फिर वह शत्रु न रहेगा, फिर अड़चन क्या रही? सद्बुद्धि वहीं जगती है ऐसी ही कोई बात है। हठ हो तो उस शत्रु के विनाश का हो। एक प्रत्याक्रमण के प्रसंग में ज्ञानी विरोध भी करता है, फिर भी भीतर छिपी हुई अंतर्वृत्ति यह ज्ञानी के सदा रहती ही है कि इसके सद्बुद्धि जग जाये तो अच्छा है। इस मुकाबले की अपेक्षा हम अज्ञान भाव रक्खें, विषयकषायों के परिणाम की वृत्ति रक्खें तो उसके फल में नियम से दुर्गति भोगनी होगी। इस अनित्य भावना के प्रसंग में यह बताया जा रहा है कि जिन अनित्य विषयों के खातिर तू अपने भाव बिगाड़ता है ये भी साथ न रहेंगे और तुझे ये नरकादिक दुर्गतियों के दु:ख भोगने के कारण बन जायेंगे।


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