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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 789

From जैनकोष



मिथ्यात्वादिनगोत्तुंगश्रृंगभंगाय कल्पित:।

विवेक: साधुसंगोत्थो वज्रादप्यजयो नृणाम्।।

साधुसंग से उत्पन्न विवेक में मिथ्यात्वपर्वत के भंग करने की क्षमता- ज्ञानी विरक्त साधु पुरुषों की संगति से जो विवेक उत्पन्न होता है वह विवेक मिथ्यात्व मोह जैसे ऊँचे पर्वत के शिखरों का खंड करने के लिए वज्र से भी अधिक बलवान होता है। जैसे यह बात प्रसिद्ध है कि इंद्र का शस्त्र बड़े-बड़े पर्वतों के शिखरों को चूर कर देता है उससे भी अधिक समर्थ वह विवेक जगता है जिस विवेक से यह ज्ञानी मोह मिथ्यात्व पर्वतों के खंड खंड कर दे। मिथ्यात्व नाम है उल्टी धारणा का अर्थात् भ्रम हो जाने का। पदार्थ तो है और कुछ, समझ रहे हैं और कुछ, इस ही का नाम मिथ्यात्व है। ये जगत के जीव प्राय: इस ही मोह से ग्रस्त होकर अपने आपको बरबाद कर रहे हैं। यह शरीर सदा रहने वाली चीज नहीं है, आज शरीर का समागम है कहो कल को न रहे। और, जब तक शरीर का समागम है तब तक भी आत्मा न्यारा है, शरीर न्यारा है लेकिन शरीर में यह जीव कैसी आत्मबुद्धि किए है कि यह मैं हूँ। और शरीर में जब आत्मबुद्धि कर ली कि यह मैं हूँ तो शरीर के ही खातिर जो और-और संबंध बने हैं उनमें भी यह ममता करता है कि यह मेरा फलाना रिश्तेदार है। अरे जीव का कोर्इ रिश्तेदार होता है क्या? जीव का तो शरीर भी कुछ नहीं है? फिर रिश्ता क्या चीज है? लेकिन शरीर का तो शरीर से रिश्ता चलता है ना। यह शरीर जिनके निमित्त से जन्मा है वे तो कहलाये माता पिता। इस शरीर के निमित्त से जो जन्मते हैं वे कहलाते हैं पुत्र पुत्री। इसी शरीर को जो रमाती है उसका नाम है स्त्री। इस शरीर के जनक का जो भाई हो वह है ताऊ, चाचा। इस शरीर के उत्पन्न करने वाली माँ की जो बहिन हो वह है मौसी। सारे रिश्ते इस शरीर के कारण हैं। जब इस जीव ने शरीर को मान लिया कि यह मैं हूँ तो ये सारे रिश्ते सही मालूम होने लगे। जिन भगवान को, गुरुवों को हम पूजते हैं उनमें और बात ही क्या थी, यही तो बात थी कि उनका ज्ञान सच्चा था, किसी से रागद्वेष नहीं था, किसी से मोह ममता न थी। वे अपने अनंत आनंद में लीन रहे। ज्ञान के द्वारा समस्त लोकालोक को जानते रहे। यही तो विशेषता है जिससे हम प्रभु की पूजा करते हैं, भक्ति करते हैं। हे नाथ ! जो गुण आपमें हैं वे गुण मुझमें प्रकट हो जायें, ऐसी मेरी निर्मल दृष्टि बने, विवेक जगे कि मैं सत्य को सत्य समझने लगूँ, असत्य को असत्य समझने लगूँ। यह सारा संसार प्राय: असत्य की ओर लगा हुआ है। जीव जीव तो सब एक समान है। पर उनमें भी यह भेद डाल लेना कि ये मनुष्य मेरे हैं, ये गैर हैं, यह कोई विवेक की बात है क्या? उन घर के चार जीवों के अतिरिक्त अन्य जीवों की ओर कुछ दृष्टि ही नहीं जाती। ऐसा जो खोटा परिणाम उत्पन्न हो रहा है, इस ही के कारण इस जीव पर अनेक विपदायें हैं। इससे बढ़कर और क्या विपदा होगी कि सच न जानकर झूठ के उपायों में लगे रहते हैं। यही मिथ्यात्व है, इस मिथ्यात्व भाव के कारण ही सब दु:खी हैं। तो विकट मिथ्यात्व पर्वत को भी विवेक चूर चूर कर देता है।

विवेक की सर्वसमृद्धियों में महनीयता- सबसे बड़ी समृद्धि है विवेक। यदि विवेक साथ है तो चाहे धन कम रह जाय, चाहे अन्य शारीरिक संकट आ जायें, चाहे कुछ भी स्थिति हो, सब स्थितियों को एक समान कर सकते हैं और सुखी रह सकते हैं। विवेक न हो तो सब कुछ होकर भी दु:ख ही दु:ख भोगना पड़ता है। इस ही भारत देश की तो बात थी, पहिले जब कौरव और पांडव थे। उनके सब कुछ था, पर हो गया उनमें परस्पर में विद्रोह। यद्यपि पांडवों ने कौरवों का अकल्याण नहीं सोचा गलती विशेष कौरवों की ओर से थी, पर कुमति जग जाने के कारण कौरव तथा पांडव दोनों को दु:ख भोगना पड़ा। अंत में महान युद्ध हुआ जिसमें लाखों मनुष्यों का संहार हुआ। यह क्या विडंबना है? यह सब मोह का ही काम है। मोह के समान जीव का कोई दूसरा बैरी नहीं है। जिस ज्ञानी के चित्त में दूसरे जीवों के प्रति प्रेम बना हुआ है, सब जीव एक स्वरूप वाले हैं, केवल जीवस्वरूप पर दृष्टि है, अपने आपमें ज्ञानप्रकाश सच्चा जग रहा हो उस पुरुष को तो सब समृद्धियाँ मिली हुई हैं। शांति संतोष हो तो इससे बढ़कर और धन क्या है? जब संतोष धन हृदय में प्रकट होता हे तो ये सब हाथी, घोड़ा, धन, वैभव, मकान ये सब तृण के समान लगने लगते हैं। है क्या चीज? अपना परिणाम सुधरे तो भाग्य सामने अच्छा आये। आल कल देख लो लोगों में परस्पर में विद्रोह है, ईर्ष्याद्वेष है, दूसरों के प्रति दया नहीं है तो ऐसा परिणाम बनने से देखिये समय भी किनारा करता जा रहा है। जब वर्षा चाहिए तब वर्षा नहीं होती जब वर्षा न चाहिए तब वर्षा होती, कंकड, पत्थर गिरते, एक ही क्या, अनेक प्रकार के बाहरी उपद्रव आते। भाग्य प्रतिकूल है तभी तो ये सारे उपद्रव आ रहे हैं। अब यह बतलावो कि धन को बढ़ाने से, धन के लालच करने से क्या लाभ? उदय अनुकूल नहीं है तो लाखों का धन भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यदि हम उदारता न रखें, धन की तृष्णा बढायें और हो जाय अचानक उपद्रव तो लो एक साथ क्या से क्या हो गया? किसी का कल भी पता नहीं कि क्या से क्या हो जाय? ऐसी कठिन हालत में हम आप सबका यही कर्तव्य है कि अपने परिणामों की संभाल करें, दया का भाव भरें, सब जीवों के सुखों की चाह करें, सब प्राणी सुखी हों, किसी को अपना विरोधी बैरी न मानें, इन परिणामों से पुण्य बढ़ता है और पुण्य से सब कुछ साधन ठीक मिलते हैं। यह सब ऐसा पुण्य का परिणाम होना सत्पुरुषों के संग से मिलता है। सज्जनों की संगति से गुरुजनों के संग से, उनकी सेवा में रहने से विवेक सही रहता है, कर्तव्य का भान रहता है। दूसरों पर दया की बात मन में आती है।

सद्विेवेक का प्रताप- सत् विवेक में इतना प्रताप है कि जीव के बैरी मोह को चूर चूर कर देता है। देखिये घर वही है, रहना भी वहीं हो रहा, काम भी कहीं कर रहे हो, एक उसके साथ अज्ञान और लगा हो कि यह मेरा ही तो सब कुछ है, इससे ही तो मेरी तरक्की है, इससे ही मेरा हित है, बड़प्पन है, यों अज्ञान बना रहे इन जड़पदार्थों में तो उसकी आकुलता देख लो कितनी तीव्र आकुलता रहती है? जरा सा नुकसान हो जाय तो छटपटा जाते हैं और एक वही काम किए जा रहे हैं कि हम संसार में यत्र-तत्र जन्म लेते रुलते आज मनुष्यभव में आये हैं। जिन प्राणियों से हमारा कुछ भी संबंध न था वे प्राणी हमें परिवार में मिले हैं, तो एक गृहस्थी के कर्तव्य के नाते हम यह सब कर रहे हैं लेकिन ये मेरे कुछ नहीं हैं, और यह बात सच है कि अपना यहाँ है कुछ नहीं। यहाँ से मरकर न जाने कहाँ से कहाँ पैदा हो गए, फिर यहाँ का क्या रहा इसका? तो जो सच बात है उस सच बात की दृष्टि बनी रहे तो गृहस्थी वही है, सब बात वही है लेकिन एक सम्यग्ज्ञान बनने से आकुलताओं में कमी आ जाती है। विवेक सही रहता है तो अपना विवेक ज्ञान सही बना रहे यही है सबसे बड़ी संपदा। और इन जड़ वैभवों का संबंध यह कोई सच्ची संपत्ति नहीं है और फिर इनका भरोसा भी कुछ नहीं है। उदय अनुकूल हो, पुण्य का प्रभाव हो तो मनचिंती संपदा आ जाती है। और पाप का उदय जगा तो आयी हुई संपदा भी खतम हो जाती है। बतावो तृष्णा का वेग उठता है कल्पनावों का क्या उठता है? तृष्णा करके थोड़ा उस ओर बढ़े, कुछ खेद किया तो समझों कि अपना कुछ न कुछ नुकसान तो हो ही गया। अब कल्पनाएँ बनायें कि हमारा क्या होगा, ऐसा बन जायगा, यों बनेगा। कल्पनाओं का उठना क्या? और, गनीमत है इस बात की कि हम चाहें कि बड़ा नुकसान न हो। अरे बड़ा भयंकर कोई उपद्रव बने तो सब कुछ नष्ट हो सकता है। यों ही व्यापार की बात है। हम सोचें, तृष्णा करें, धन जोड़ें, उसकी रक्षा करें तो कहाँ तक करेंगे? भाग्य अगर अनुकूल नहीं है तो वैभव सम्हाला न सम्हलेगा। अगर हमारा परिणाम पवित्र है, अपने भाग्य को सम्हाले हैं तो समझो कि अपना सब कुछ सम्हाला है। ये सब विवेक वृद्धसेवा से उत्पन्न होते हैं। ज्ञानी, तपस्वी, विरक्त संत पुरुषों की संगति से ये परिणाम स्वयमेव प्राप्त होते हैं। विवेक जगता है उससे पुण्य बढ़ता है और मिथ्यात्व आदिक मोह बैरियों का भी लोप होता है। तो सत्संग से बढ़कर और कुछ वैभव नहीं है। ऐसे सुगम उपाय से हम अपने पापों को दूर कर लें। सत्संग से प्रताप से भव-भव के पाप भी नष्ट हो जाते हैं।


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