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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 790

From जैनकोष



अप्यनादिसमुद्भूतं क्षीयते निबिडं तम:।

वृद्धानुयायिनां च स्याद्विश्वतत्त्वैकनिश्चय:।।

वृद्धसत्संग में अनादिसमुद्भूत गहन अज्ञानांधकार का भी प्रक्षय- जो पुरुष वृद्ध पुरुषों के अनुयायी हैं उनका अनादिकाल का उत्पन्न भी घोर अज्ञान अंधकार नष्ट हो जाता है और तत्त्व का पूर्ण सही निश्चय हो जाता है, जो जैसा है वैसा परख में आ जाय इससे एक बड़ा विश्राम मिलता है। जैसे हम किसी बच्चे से कोई गणित का सवाल पूछे तो जब तक उस सवाल को वह हल नहीं कर लेता तब तक बेचैन रहता है और जब सवाल को हल कर लेता है तो तुरंत उसका उत्तर वह बोल उठता है और प्रसन्न हो जाता है। तो भाई वह दु:खी क्यों हुआ था? क्या उसे कोई शारीरिक कष्ट था, क्या उसे कोई मार पीट रहा था? अरे सही ज्ञान नहीं हो पा रहा था, इससे वह बेचैन था, सही ज्ञान हो जाने पर उसकी बेचैनी दूर हो गई। उसके मुख पर प्रसन्नता आ गई। तो अज्ञान में बड़ी वेदना होती है। ज्ञान जगने पर ही वह वेदना दूर होती है। तो सत्पुरुषों के संग से ऐसा ज्ञान जगता है कि भव-भव से चला आया हुआ अज्ञान भी दूर हो जाता है। कम से कम इतनी असर तो तुरंत पड़ी है सत्पुरुषों के संग में, साधुवों के संग में आने से कि मोह ममता में कुछ ढिलाव हो जाता है। खूब देख लो- जब आप घर में रहते हैं तो मोह ममता तीव्र बन जाती है और जब सत्संग में आते हैं तो आपका मोह कम हो जाता है। भले ही वह जड़ से न मिटे, थोड़ी देर बाद फिर हो जायेगा, लेकिन इतना प्रभाव तो तुरंत मिलता है, कषायें कम हो जाती हैं। कितनी ही क्रोध करने की प्रकृति हो, महापुरुषों के संग में रहने पर गुस्सा में कमी आ जाती है। यद्यपि गुस्सा जड़ से नहीं मिटी, थोड़ी देर बाद गुस्सा आ जायगी लेकिन तत्काल यह असर होता है कि नहीं? खामखा किसी बात पर गुस्सा करे और फिर उपयोग बदल जाता है, ज्ञानी पुरुषों के दर्शन से अथवा सत्संग से एक यह उपयोग बदल जाता है, यह सत्संग का महात्म्य दिखा रहे हैं कि वह कितनी हितकारी वस्तु है, उससे जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह भव-भव के इस मोह अंधकार को दूर कर देता है।

सत्संग से कषायविजय का लाभ- सत्संग में निवास करने का एक असर यह होता है कि मानकषाय नहीं रहती। लोग मान से अपने को उच्च समझते हैं लेकिन मान होने से मनुष्य पतित हो जाता है। किस बात पर अभिमान होना, संसार की कौनसी विभूति ऐसी है जो अभिमान करने लायक है? प्रथम जो मिला है उस सबका वियोग हो जायेगा चाहे हमारे जिंदा रहते ही वियोग हो जाय। चाहे मैं मर जाऊँ तो वियोग हो जाय, पर जिसका भी संयोग हुआ है उसका वियोग नियम से होगा। फिर जिस चीज का वियोग हुआ है उसका क्या अभिमान? और फिर मिली हुई जो ये जड़ संपदायें हैं ये तो जड़ ही हैं। ज्ञानरहित है, इनका क्या अभिमान करना? यों मान लो कि जो कुछ तीन लोक में पड़ा है यह सब मेरा है एक मानने भर की तो बात है, चीज तो आपकी नहीं बनती। यह मानते रहे कि यह मेरा घर है, यह मेरा वैभव है, यह मेरी चीज बैंक में जमा है अथवा अमुक जगह है, ऐसा मानते हैं ना। लोकव्यवस्था में यद्यपि है वह आपकी चीज, फिर भी आपकी नहीं है। आपका तो वह शरीर भी नहीं है। तो इन सब जुदे पदार्थों पर काहे का अभिमान करना? यह विवेक जगता है सत्पुरुषों की संगति से। मायाचार भी नहीं रहता सज्जन पुरुषों के संग में। किस बात का मायाचार करना? उन वृद्ध पुरुषों की संगति में रहने से एक ऐसा प्रभाव बनता है कि सरलता जग जाती है। लोभ लालच नहीं रहता। आप देखिये कि अब भी मनुष्यों में कितना धर्मप्रेम है कि धर्म के हित, पर के उपकार के हित, अपनी सामर्थ्य के अनुसार जब तब व्यर्थ करते ही रहते हैं। तो यह धर्मरुचि की ही तो बात है। तो धर्ममय जो जीव हैं उनके संग में रहने से लोभ लालच की भी बात परिणाम में नहीं रहती है, ऐसा ज्ञानप्रकाश जगता है सज्जन पुरुषों के संग में या धर्मात्मा पुरुषों की सेवा से, वैयावृत्ति से कि मोह अंधकार दूर हो जाता है और फिर तत्त्व का यथार्थ निर्णय हो जाता है।

स्वरूपनिर्णय और सत्संगवाद से ज्ञानानंदानुभव के लाभ का अनुरोध- मैं जीव हूँ, ये सब पदार्थ अजीव हैं। जब यह जीव इन अजीव पदार्थों की ओर झुकता है तो इसके कर्म बँधने लगते हैं और जब यह पर को पर जानकर उससे विरक्त रहता है और अपने को ज्ञानमात्र हूँ ऐसा ही अनुभव करता है तो इसका कर्मबंध दूर हो जाता है और अपने आपमें अवर्णनीय आनंद प्रकट हो जाता है। भाई चाहिए तो आनंद ही ना, तो आनंद का जो सच्चा रास्ता है उस रास्ते का ज्ञान जरूर करना चाहिए और अपनी शक्ति माफिक उस रास्ते पर चलना चाहिए। आनंद पाने का रास्ता है अपने को सबसे भिन्न समझ लो। पर को पर समझ लो और यह निर्णय कर लो कि किसी परपदार्थ के कैसे ही परिणमन होने से मेरे आत्मा में सुख दु:ख नहीं होता, किंतु मैं ही अपने अज्ञान में आ जाऊँ तो दु:खी होता हूँ और मैं ही ज्ञान में आ जाऊँ तो सुखी होता हूँ। यह बात यथार्थ सत्य है, अतएव मैं पर को पर जानकर उसमें मोह न करूँ और अपने को आत्मस्वरूप परमात्मस्वरूप भगवान का रूप निरखकर अपने में प्रसन्न रहा करूँ, ऐसी यदि हम परिणति बना सके तो हमने इस मनुष्यजन्म का लाभ लिया और यदि विषयों में, कषायों में, क्रोध, मान, माया, लोभ, ममता, अहंकार, व्यसन, पाप हिंसा इन ही बातों में यदि अपना चित्त लगाया तो मनुष्य होना, पशु होना, पक्षी होना, ये सब एक ही प्रकार की बातें हैं। मनुष्य होकर कोई खास लाभ न लिया तो क्या फायदा पाया? समस्त लाभों में लाभ है सत्संग करना। जो ज्ञान और तपस्या में बढ़े हुए सत्पुरुष हों उनका संग करना इससे वे सभी गुण प्रकट होते हैं, वह ज्ञानप्रकाश जगता है जिस ज्ञानप्रकाश में हम अपने शांतिपथ की ओर चल सकते हैं। सत्संग में रुचि करो और अधिकाधिक अपने में ज्ञान प्रकट करने का यत्न करो।


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