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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 791

From जैनकोष



अंत:करणजं कर्म य:स्फोटयितुमिच्छति।

स योगिवृंदमाराध्य करोत्यात्मन्यवस्थितिम्।।

सत्संगसेवा से कर्मभेदन कर आत्मावस्थिति का लाभ- जगत में जो जीवों में विचित्रता देखी जाती है, कोई पशु योनि में है, कोई पक्षी, कोई मनुष्य और कोई किसी प्रकृति का है, कोई किसी प्रकृति का है। जो ये नाना भेद देखे जाते हैं। यह सब अपनी-अपनी करनी के भेद से हैं। सब जीवों की जैसी करनी होती है उस करनी के अनुसार वैसा शरीर मिलता है, सुख मिलता है और उस ही करनी का कर्म बँधता है। तो ऐसे मन से उत्पन्न हुए ये पापकर्म कैसे दूर हों उसका उपाय बताया जा रहा है, भव-भव के बाँधे हुए ये कर्म दूर हो सकते हैं। अपने आत्मा के ज्ञान से परपदार्थों में मोह किया कि नाना कर्म बंध जाते हैं। दूसरे के मोह की बात तो झट समझ में आ जाती है कि यह कितनी गलती कर रहा है, यह इतना तेज मोह रखता है। भिन्न पदार्थों में यह व्यर्थ मोह रखता है। यों दूसरे की बात तो जल्दी समझ में आ जाती है पर अपने मोह की पहिचान जरा कठिन होती है। दूसरे की मूर्खता जल्दी समझ में आ जाती है, यह कितना मूर्ख बन रहा है, कैसा क्रोध करता है, कैसा विषयलोलुपी है, यों दूसरे की गलती जल्दी मालूम हो जाती है किंतु अपनी गलती अपने दिमाग में नहीं आती है, यह सब मोह का ही कारण है। अपने आपकी पर्याय में इतनी ममता है कि इसे अपनी गलती समझ में नहीं आती। जैसे कोई बीमार हो तो परहेज न कर पाये तो लोग उसे धमकाते हैं और लोग उसे समझाते हैं कि तू जरा भी जीभ को वश में नहीं कर पाता और दु:खी रहता है और स्वयं का कोई परहेज हो तो बिरले ही लोग ऐसे हैं जो अपने खुश मन से परहेज को कर लें, नहीं तो उस वस्तु की चाह लगी रहती है कि खाने को मिले, और रोग भी ऐसा होता है कि जिस रोग में जो चीज अहितकारी है उसकी इच्छा होती है। तो दूसरे की गलती झट समझ में आती है, अपनी गलती बहुत देर में समझ में आती है। अपनी गलती अपनी समझ में आ जाय तो यह भी एक बड़ा ज्ञान है। मनुष्य को चाहिए तो यह कि रोज एक बार यह विचार कर ले कि मैंने किसी को सताया तो नहीं। मैंने किसी पर क्रोध तो नहीं किया। अगर अपनी गलती समझ में आये तो अपनी गलती का पछतावा करें, मैंने यह कार्य अच्छा नहीं किया। इस असार संसार में मैंने व्यर्थ ही दूसरे को यों सताया या क्रोध किया उससे मुझे लाभ कुछ नहीं हुआ। बल्कि अपना ही बिगाड़ कर लिया। जिस किसी को भी सताया हो या उस पर क्रोध किया हो तो उसके समीप जाकर कहें कि भाई मुझे क्षमा करो। वीर धीर पुरुष ज्ञानी पुरुष अपने किए हुए अपराध में क्षमा मांग लेने में रंच भी संकोच नहीं करते हैं। हाँ किसी का अन्याय न सहें, यह भी मेरा काम है पर अपने द्वारा किसी पर कुछ अन्याय हो गया हो तो उसकी क्षमा मांग लेने में कोर्इ हानि नहीं है। यही तो उसका बड़प्पन है। जो मनुष्य अभिमान से रहता है उसका जनता में कुछ बड़प्पन नहीं होता। जितनी नम्रता से रहें, दूसरों के जितना उपकार में रहे उतनी ही उसकी लोक में प्रतिष्ठा होती है।

अपने पारमार्थिक लाभ हानि के समझ लेने का कर्तव्य- यह कर्तव्य है सबका कि अपना दिनभर का हिसाब देखें। जैसे व्यापारी लोग अपने व्यापार में आय व्यय का हिसाब लगाते हैं, अपना नफा नुकसान देखते हैं ऐसे ही अपनी दिनचर्या का रोज हिसाब देखना चाहिए। यह काम तो सब कोई कर सकता है। रुचिभर चाहिए। इसमें धनी और गरीब की कोई बात नहीं है। अपनी रोज की की हुई गलतियों को परखना और अपनी की हुई गलतियों पर पछतावा करना यह तो सभी लोग कर सकते हैं, सभी पुरुष, सभी महिलायें यह काम कर सकती हैं, उससे दूसरे दिन सावधान रहने की प्रेरणा मिलती है, अब ऐसी गलती कल न हो, उसके लिए मार्ग मिलता है। रोज की चर्या में रोज किसी समय अपना लेखा लगाना और जो गलतियाँ हुई है उनका पछतावा करना, आगे दिन ऐसी गलतियाँ न होने देने का संकल्प करना यह जीवन को पवित्र बनाने वाला कार्य है। जब कभी हमारे किसी दुर्व्यवहार से इंद्रिय के विषयों में आसक्ति हो अथवा कभी मान आदिक के वशीभूत होकर अटपट कार्य करने से जो भी कर्म बंधते हैं उन कर्मों को यदि नष्ट करने की चाह है तो उसका यह उपाय है कि अपने आत्मा का ज्ञान करें। मेरा आत्मा जगत के समस्त पदार्थों से न्यारा प्रभुवत् ईश्वररूप है, ज्ञानानंदस्वरूप है, हममें कोर्इ क्लेश ही नहीं। अज्ञान रागद्वेष मोह ये तो कोई विकार नहीं, ये तो उपाधि से अर्थात् दूसरों के संग से खोटे भाव होने लगते हैं। हमारा स्वभाव नहीं है ऐसा कि हम खोटे विचार बनाते ही रहें। तो आत्मा का जो सत्य स्वरूप है, जिसके दर्शन करने पर सब जीव एक समान नजर आते है, फिर मेरा न कोई किसी से संबंध है, न किसी का कोई परिजन मित्रजन है, ऐसा विशुद्ध विचार रखने वाला पुरुष कर्मों को नष्ट करता है। तो ऐसे आत्मा की भावना सत्संग से बनती है। जिन योगिराजों के साधुवों के साधुसंतों के संग में रहने से ऐसी ज्ञानकला प्रकट होती है अपने आत्मा का अनुभव जगता है, और उस अनुभूति की प्राप्ति से कर्मों का नाश होता है। यह है असली प्रोग्राम। बाकी तो सब बातें अपने भाग्य के उदय के अनुकूल चलती ही रहती है।


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