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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 827

From जैनकोष



संग एव मत: सूत्रे नि:शेषानर्थमंदिरं।

येनासंतोऽपि सूयंते रागाद्या रिपव: क्षणे।।

परिग्रहजाल से बचकर आत्मध्यान में रत होने का कर्तव्य- जीवों को निज विशुद्ध आत्मा का ध्यान ही शरण है। जितने भी अनुभव होते हैं वे ज्ञान द्वारा होते हैं। यह ज्ञान जिस प्रकार का अपना विचार बनाये उस ढंग से उस प्रकार का सुख या दु:ख अथवा आनंद का अनुभव होता है। किसी भी परपदार्थ का आश्रय लेकर जो भी विचार बनता है उसमें क्षोभ अवश्य है। चाहे वह सुखरूप हो अथवा दु:खरूप अनुभव हो। सुख के अनुभव में भी लोभ है अर्थात् आत्मा अपने ठिकाने नहीं रहता। अपने स्वरूप को त्यागकर अर्थात् स्वरूप की दृष्टि छोड़कर अटपट अनेक प्रकार की तरंगे उठा करती हैं उससे भी क्षोभ है और दु:ख का अनुभव है वहाँ भी क्षोभ है, और परपदार्थ चूँकि पर हैं, उनका जब चाहे वियोग हो सकता है तो उससे वियोग का भी खेद है। यों किसी भी प्रकार का सहारा लेकर, पर की शरण गहकर, पर को उपयोग में बसाकर आनंद नहीं पाया जा सकता। आनंद तो एक आनंदस्वरूप निज शुद्ध आत्मा के ध्यान में है। वह ध्यान कैसे बनता है, उसके उपाय में बताया है कि ध्यान के यद्यपि बाह्य साधन अनेक हैं पर ध्यान में अंतरंग साधन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र हैं। कोई पुरुष प्राणायाम श्वास निरोध, प्रत्याख्यान, धारणा, यम, नियम अनेक प्रकार के उपाय बनाये और सम्यक्त्व न हो, आत्मा का विशुद्ध स्वरूप क्या है, स्थिर तत्त्व क्या है इसका उपाय न हो तो किसका उपयोग बनाकर यह जीव स्थिर और आनंदमय बन सकता है? स्थिर आनंदस्वरूप निज अंतस्तत्त्व का परिचय हो तो उसका सहारा लिया जा सकता और इसमें मग्न हुआ जा सकता, अतएव आत्मध्यान ही जीवों को शरण है और उसका अंतरंग साधन है मुख्य सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र।

परिग्रह की सर्वानर्थमूलता- इस प्रकरण में सम्यक्चारित्र के स्थल में परिग्रह त्याग महाव्रत का वर्णन चल रहा है, जिसमें बाह्य और आभ्यंतर परिग्रह का त्याग कर दिया है। धन, मकान आदिक बाह्य चीजों को त्याग दिया है। क्रोध, मान, माया, लोभ, मोह इन अंतरंग विकारों का भी परिहार कर दिया है ऐसा नि:संग संत ही आत्मा के ध्यान का पात्र होता है क्योंकि संग में अनेक अनर्थ होते हैं। समस्त अनर्थों का मूल परिग्रह माना गया है। वादविवाद, कलह, अशांति जितने भी अनर्थ हैं उन सबका मूल परिग्रह माना गया है क्योंकि परिग्रह के कारण सभी शत्रु अंतरंग शत्रु रागादिक और बहिरंग शत्रु ऐसे मनुष्यों की मंडली जो इनके संग को परिग्रह को ग्रहण करना चाहे उसके वे सब शत्रु बन जाते हैं। परिग्रह आया और उसमें राग रूप ही अपने आपका अनुभव किया, वहाँ उस शुद्ध ज्ञान स्वरूप का ध्यान नहीं बन सकता है, मैं नि:संग हूँ, समस्त परपदार्थों से बिल्कुल न्यारा हूँ, अपने ही द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से हूँ, अपने ही प्रदेशों में मेरा अपने आपका अनुभव है और यह अपने गुणमात्र है, अमूर्त है, नि:संग है इस प्रकार नि:संग अनुभव करने पर तो अपने शुद्ध स्वरूप का ध्यान बन सकता है और जो अपने को ससंग अनुभव करता हो कि मैं तो ऐसी पोजीशन वाला हूँ, अनेक अनेक रूप से अनुभव करे तो चूँकि उसने परभावों का अनुभव किया है तो परभावों का अनुभव कैसे हो सकता है और ये अनर्थ अपने स्वभाव से चिग गए, परपदार्थों में आसक्त हो गए यह सब परिग्रह का फल है। गृहस्थजनों को भी यद्यपि समय-समय पर परिग्रह का उपयोग बनाना पड़ता है, दुकान आदिक की व्यवस्था करनी पड़ती है, कमाई की बात सोचनी पड़ती है लेकिन ये सब करने के बावजूद भी उनके पास काफी समय पड़ा हुआ है। दिन रात के 24 घंटे में कभी 10-5 मिनट तो अपने आपको नि:संग अनुभव करने का यत्न किया जा सकता है। अपना उपयोग है अपने आपमें है, इसे किसी ने बाँध नहीं रखा, भले ही गृह में बहुत से परिजन हैं पर किसी ने भी हमारे उपयोग को बाँध नहीं रखा है। ऐसा अपने आपमें निरखिये, हम भीतर तो स्वतंत्र ही हैं। विचार बनाने में तो हम स्वतंत्र ही हैं। जब कभी एक आध मिनट अपने को नि:संग अनुभव कर लिया जाय, मैं निष्परिग्रह हूँ ऐसा अपने स्वभाव को देखा जाय तो खुद ही जो एक अनुपम शुद्ध आनंद प्राप्त होता है वह रक्षा करने वाला है, और शेष जितने भी विकल्प उत्पन्न होते हैं वे साक्षात् विपदा हैं और आगामी काल में भी झंझट का कारण बन जाते हैं, और झंझट ही विपदा है। विपदा से प्रारंभ हुई विपदा का अनुभव करना अनर्थों का मूल यह परिग्रह माना गया है। नि:संग अनुभव करने का जो यत्न करता रहता है वह ज्ञानी पुरुष है और अपने को मोक्षमार्ग में लगाने वाला है।


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