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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 828

From जैनकोष



रागादिविजय: सत्यं क्षमा शौचं वितृष्णता।

मुने: प्रच्याव्यते नूनं संगैर्व्यामोहितात्मन:।।

संगमुग्ध मुनि की रागादि विजयच्युति- जिन साधुवों का परिणाम परिग्रह से मोहित हो गया है उनकी ये बातें, ये गुण नष्ट हो जाते हैं। रागादिक भावों पर विजय करना। परिग्रह केवल धन का ही नाम नहीं है किंतु अपने स्वभाव से अर्थात् किसी भी परिणाम में मूर्छित होना ‘यह मैं हूँ’ इस प्रकार का बेसुध रहना वह सब परिग्रह है। जिसे नाम की, यश की प्रतिष्ठा की चाह हो वह चाह भी परिग्रह है और इन धन आदिक परिग्रहों से भी अधिक परिग्रह है। भला कितना अज्ञान अंधकार है जिसकी अंतरंग में ऐसी रुचि जगी हो, मेरा इस संसार में यश, नाम प्रशंसा हो, उसे यह पता नहीं कि मैं किन जीवों में यश की चाह कर रहा हूँ, ये सब मलिन संसार में भटकने वाले खुद असहाय हैं, खुद दूसरे की आशा रखने वाले हैं, ऐसे कातर प्राणियों का यह समुदाय है और फिर ये विनाशीक हैं, अथवा यहाँ कुछ परंपरा में मान लो 100-200 वर्ष तक कुछ यश गा दिया तो उससे इस आत्मा का क्या हित होगा, वे परपदार्थ हैं; असार हैं। इतने विशाल संसार में मरण करके कहीं के कहीं उत्पन्न हो जायेंगे, फिर यहाँ के किसी परपदार्थ से क्या हित होगा? किसी भी परपदार्थ से हमारा हित न होगा। हमारा हित तो हमारे ही ज्ञान से होगा। अपने को ज्ञानमात्र सबसे निराला, सर्व से अपरिचित, नि:संग अनुभव करें। ऐसा अंतरंग मौलिक तपश्चरण करने वाले ज्ञानी पुरुष धन्य हैं। यह रुचि जिनके नहीं जगी और इस बाहरी जड़ वैभव परिग्रह में ही जिनकी आसक्ति जग गई है वे पुरुष रागादिक विकारों पर क्या विजय कर सकेंगे? किसी परपदार्थ के सामने अपने आपको झुका लेना यह कायरता है। अंतरंग शौर्य यही है कि अपने को निर्लेप समझना और अपने गुण गौरव से अपने आपको प्रसन्न बनाये रहना, यही है आत्मशूरता। यह कैसे प्राप्त हो सकता है? जिनको बाह्य वैभव में आसक्ति हो गई है।

संगव्यामुग्ध मुनि की सत्यादिगुणच्युति- जिनका मन परिग्रह से मलिन है उनका सत्य धर्म भी निभ नहीं पाता। चाहे कितना ही सत्य बोलने का उन्होंने नियम रखा हो किंतु जब परिग्रहों में मन हो जाता है तो जितनी भी बातें बोलेंगे उनमें कुछ न कुछ असत्य अहित मिथ्या बातें हो जायेंगी। जिनको परिग्रह में व्यासक्ति हो गई है उनको सत्य धर्म नहीं निभता है। फिर वे आत्मध्यान कैसे कर सकेंगे? ऐसे परिग्रहासक्त जीवों के क्षमा भी नहीं निभ सकती, क्योंकि बाह्य जड़ पदार्थों के संचय करने का भाव है और वह अपने अधीन बात नहीं है, उसमें अनेक बाधायें समायी है, जब अनेक बाधायें आती हैं तो वहाँ क्रोध आना संभव है। जहाँ क्रोध है वहाँ क्षमा नहीं है। परिग्रह के संबंध से क्षमा गुण भी नष्ट हो जाता है। और, एक गुण है शौच धर्म। तृष्णा रहित होना यह तो संभव ही नहीं है। तो इन परिग्रहों की व्यासक्ति से आत्मा के गुण नष्ट हो जाते हैं। जहाँ यह आत्मा अवगुणों का धाम बने तो उसे आत्मा का ध्यान कैसे हो सकता है? लोक में करने योग्य काम सर्वोपरि एक मात्र शुद्ध ज्ञानमात्र मैं हूँ ऐसी प्रतीति रखना है इससे बढ़कर कोई कार्य नहीं है हित का। यही करने योग्य है, इससे ही हमारे अंतरंग का नाता रहे, ऐसा निर्णय रहना चाहिए। जिसका ऐसा निर्णय है उसे फिर और कुछ समझाने की बात नहीं रहती। सारी समस्या उसके इस प्रायश्चित्त से ही हल हो जाती है। लोकव्यवहार में जो बड़ी बड़ी समस्यायें कहलाती हैं, किसी बात पर विवाद हो गया, झगड़ा मच गया तो कहते हैं कि बड़ी समस्या हो गयी, इस बड़ी समस्या को भी ज्ञानी पुरुष अपनी ज्ञानकला से तुरंत हल कर लेते हैं। ज्ञानबल से जहाँ जाना कि यह तो मेला झमेला है, पुण्य पाप के अनुसार संग हो रहा है उससे हमारा हित कुछ नहीं है, ऐसा जिसके निर्णय है उसके उदारता प्रकट होती है और उस उदारता के फल में यदि तुरंत कुछ बाह्य वैभव का परिहार भी कर लिया जाय, दूसरों को भी दे दिया जाय, वे शांत हो जायें तो इतने से भी उसका लोकव्यवहार की अपेक्षा भी घटता कुछ नहीं है। जब निर्मल परिणाम की निधि अपने पास है तो उस निधि से कितना वैभव निकलता रहता है, कोई अनिष्ट संयोग हो गया, इष्ट वियोग हो गया, जो अपना परम इष्ट था उसका मरण हो गया, ऐसी अनेक परिस्थितियाँ भी आयें तो अज्ञानी को बड़ी समस्या बन जाती है। अब मेरा जीवन कैसे चलेगा? मेरी दुनिया लुट गयी, यों दिल कमजोर बनाकर वह संक्लेश मरण करता है। लेकिन ज्ञान की ऐसी महिमा है कि वह बाहरी किसी भी परिस्थिति से अपने आपमें कुछ विपदा ही नहीं मानता है। वह ज्ञानी पुरुष तो अपने ज्ञानस्वरूप से चिगकर पर की ओर झुकाव करने में विपदा मानता है।

जीव की पारमार्थिकी समृद्धि- इस जीव की समृद्धि मात्र इतनी ही है कि अपने आपके सही स्वरूप को समझकर उसके निकट ही स्थित रहा करे, अपने उपयोग को अपने ही निकट बनाये रहा करे, यही एक उत्कृष्ट समृद्धि है। कदाचित् कोई तीसरा पुरुष यह कह सके कि फिर तो लोक में जीना क्या, जब तक कोई दूसरों के काम न कर सके, पार्टी वगैरह न बना सके, लोक में अपना कुछ करतब न दिखाये तो फिर उसका जीवन क्या रहा? अरे उनके लिए हमारा जीवन कुछ नहीं है तो मत रहो। मेरे को तो अनंतकाल तक यात्रा करना है, हमारा तो उससे संबंध है, यहाँ के लोगों से संबंध नहीं है, ये सब दृष्टि की बातें हैं। जब इस ओर दृष्टि रखते हैं एक सामाजिक ढंग से तो जरूर यह लगता है कि देश में हमारा स्थान होना चाहिए, ठीक है लेकिन ज्ञानी उदार पुरुष हो तो इस प्रकार के स्थानों को तो वह थोड़े से प्रयास से भी प्राप्त कर सकता है और उन स्थानों का अर्थ यह है कि जिस बात को सुनने की जनता प्रतीक्षा करे वही बातें बोलना। ऐसा जो करता है वही नेता है। तो जो ज्ञानी पुरुष हैं, उदार पुरुष हैं, अनेक समस्यावों पर उनकी पूछ वही रहती है। उनके निकट बना रहना भी एक बड़े स्थान को प्रकट कर देता है और फिर ये सभी बातें थोथी हैं, कुछ समय की हैं, सारभूत नहीं है। सारभूत प्रयोजन तो एक आत्मउद्धार का है। अपना उपयोग अपने आत्मा के निकट रहे और यह बात हो सकती है अपने को नि:संग अनुभव करने से। जब हम किसी पदार्थ के संसर्ग में बड़प्पन अनुभव कर रहे हों तो इस नि:संग ज्ञानानंदस्वरूप अंतस्तत्त्व का अनुभव नहीं किया जा सकता। उसकी वहाँ सुध भी नहीं है। तो नि:संगता से ही आत्मा का उद्धार है और नि:संगता न भी बनी हो, लेकिन अपना स्वरूप तो नि:संग ही है, इसमें तो रंच संदेह नहीं है। ये बाह्य वस्तुवें किसकी आत्मा से चिपकी हैं? और, बड़े गौर से देखो तो यह शरीर भी कहाँ आत्मा को छुवे हुए है? जैसे एक रस्सी दूसरी रस्सी को जकड़कर बाँध लेती है इस तरह से यह शरीर आत्मा को बाँधे हुए नहीं है, किंतु निमित्तनैमित्तिक संबंध ऐसा है कि यह आत्मा स्वयं ही शरीर से बँधा फिर रहा है। भला किसी अमूर्त पदार्थ को कोई मूर्तिक पदार्थ बाँध सकता है? क्या किसी पुत्र स्त्री के शरीर से किसी का शरीर बँधा हुआ है? अरे किसी का किसी से कुछ भी बंधन नहीं है, फिर भी लोग रागवश स्त्री पुत्रादिक से बंधे-बंधे फिर रहे हैं। ऐसे ही समझ लो आत्मा भी शरीरादिक किसी मूर्त पदार्थ से रस्सी की भाँति बँधा नहीं है किंतु विकार का ऐसा प्रताप है, ऐसा निमित्तनैमित्तिक बंधन बन गया है कि यह शरीर से जुदा नहीं हो पा रहा है। इस समय भी हम चाहें कि शरीर से अलग-अलग बाहर जरा चला जायें, बैठ जायें तो भी ऐसा नहीं कर पाते हैं। कितना विलक्षण निमित्तनैमित्तिक संबंध है तो नि:संग तो मैं कुछ भी हूँ। भीतर दृष्टि दें तो ऐसे संग वाली स्थिति में भी रहकर भी हम अपने को नि:संग पा सकते हैं, और जब नि:संगता का अनुभव हो रहा हो उस समय का आनंद भी बहुत विलक्षण है और उस ही आनंद के अनुभव में, उस ही नि:संगता के अनुभव में कर्मबंधन ढीले होते हैं। तो परिग्रहों से इन मोह रागद्वेषादिक का विजय करना, शुद्ध वृत्ति से रहना, क्षमाभाव रखना, तृष्णारहित होना आदिक ये समस्त गुण उसके नष्ट हो जाते हैं।


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