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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 829

From जैनकोष



संगा: शरीरमासाद्य स्वीक्रियंते शरीररिभि:।

तत्प्रागेव सुनि:सारं योगिभि: परिकीर्तितम्।।

शरीर की नि:सारता का परिचय होने पर परिग्रह की नि:सारता के परिचय में सुगमता- ये संसारी जीव शरीर को प्राप्त होकर ही परिग्रहों का ग्रहण करते हैं अतएव योगी महात्माजनों ने इस शरीर को बहुत नि:सार कह दिया है। अपने आपके शरीर में आत्मबुद्धि होती है कि मैं यह हूँ तो इस चेहरे को देखकर ऐसी आत्मबुद्धि होती है। प्राय: शरीर के सब अंगों से एक चेहरे में विशेष आत्मबुद्धि रखते हैं क्योंकि इस मुख से ही इस जीव की पहिचान हो पाती है। बोलचाल की जितनी भी क्रियाएँ इस मनुष्य से संभव हो सकती हैं वे सब एक इस चेहरे को देखकर की जाती हैं। अतएव ये सारी विडंबनाएँ इन चेहरों के कारण ही हो जाती है। यह शरीर मैं हूँ तो शरीर का साधन भी चाहिए, शरीर के विषयों की साधना भी चाहिए। यह शरीर मैं हूँ जब ऐसा सोचे तो ये कुछ कुछ इस शरीर के नाम के लिए, यश के लिए अनेकानेक विकल्प बनते हैं। किसी का नाम और यश लोग करते हैं तो फोटो बनाकर ही तो करते हैं, प्रतिमा बनाकर ही तो करते हैं। तो यश फैलाने का साधन एक इस शरीर की मुद्रा से चलता है, अतएव इस जीव को अपने शरीर का नाम यश फैलाने का मन में चाव होता है, फिर अनेक विपदायें इसी भूल में आ जाती हैं। शरीर में आत्मबुद्धि किया, शरीर को ग्रहण किया तो सारे परिग्रह फिर ग्रहण करने पड़ते हैं, और, फिर जो परिग्रह नहीं है उसका भी परिग्रह लगा हुआ है। किसी भिखारी पुरुष को क्या यह कहा जा सकता है कि इसके पास 10 रुपये का ही परिग्रह है? अरे उसे तो सैकड़ों रुपयों की मूर्छा लगी है। हाँ वह गरीब है, उसकी निगाह तुच्छ है तो वह ज्यादा से ज्यादा 100) की ही चाह करेगा। पर 100) हो जाने पर क्या उसे हजार की चाह न होगी? तो उसे 10) ही होने के कारण निष्परिग्रही नहीं कहा जा सकता। हाँ उसकी कल्पना में 100) या हजार रुपये तक ही सीमित हैं पर उसके संस्कारों में तो तीनों लोक के वैभव की मूर्छा पड़ी हुई है।

अंतर्बहिर्नि:संगता में आत्मयाथात्म्यपरिचय- परिग्रह की जो इतनी दौड़ है, होड़ है यह सब शरीर में आत्मबुद्धि होने के कारण है। शरीर में यह मैं हूँ, इस प्रकार की आत्मबुद्धि की, लो इसी गलती पर यह सारा परिग्रह आधारित हो जाता है। तब जिसे अपने आपको नि:संग बनाना है, नि:संग अनुभव करना है उसे यह अनुभव करना चाहिए कि मैं इस शरीर से भी न्यारा और जो कुछ तरंग विकार औपाधिक परभाव उत्पन्न होते हैं उनसे भी न्यारा केवल ज्ञानानंदस्वरूप मात्र हूँ, ऐसा कुछ प्रयोगात्मकरूप से अनुभव करें और उस अनुभव की वह निशानी है कि उस अनुभव के बाद फिर घर के ही परिजन पुत्र मित्रादिक ये सब ऐसे मालूम पड़ने लगते कि ये सब तो गैर हैं। जिस समय अपने आपमें नि:संग और ज्ञानस्वरूप का अनुभव होता है उसके बाद उसे सब वैभव यों दिखने लगते हैं जैसे और लोगों को दूसरों के पुत्र दूसरे परिजन गैर दिखते हैं वैसे ही अपने घर के परिजनों को भी वह गैर देखने लगता है। जो मोहीजन हैं वे अन्य लोगों को तो गैर की दृष्टि से देखते हैं पर अपने परिजनों को अपने हैं ऐसी दृष्टि से देखते हैं। वे सब एक ढंग से नहीं दिख सके। यह ज्ञानी अनुभवी पुरुष सबको एक दृष्टि से देख रहा है। यह है उस अनुभव की निशानी। तो ऐसा नि:संग अनुभव करने से आत्मा को एक बड़ा शरण मिलता है, शांति मिलती है, कर्म कटते हैं, उसे सच्चे धर्म की प्राप्ति होती है। नि:संगता के अनुभव से ही समस्त समृद्धियाँ प्राप्त होती हैं अतएव अपने को नि:संग अनुभव करें, और जिस प्रकार यह आत्मा अपने को ज्ञानमात्र अनुभव कर सके ऐसे ज्ञान द्वारा ज्ञान के गुप्त होने का यत्न करना चाहिए। इस आत्मध्यान से ही शांति का वातावरण मिलता है।


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