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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 862

From जैनकोष



आशामपि न सर्पंतीं य: क्षणं रक्षितुं क्षम:।

तस्यापवर्गसिद्धयर्थं वृथा मन्ये परिश्रमम्।।

आशा के क्षणभर भी निवारण में असमर्थ प्राणियों के मुक्तिश्रम की व्यर्थता- जो पुरुष बढ़ती हुई आशा को क्षणभर में रोकने में असमर्थ हैं उनके मोक्ष की सिद्धि के लिए परिश्रम करना व्यर्थ है। जो क्षणमात्र भी आशा को नहीं रोक सकते, जो मन में आया वह तुरंत हो ही जाना चाहिए ऐसी जिनके अस्थिरता बनी रहती है, इन सांसारिक कार्यों में, सांसारिक लाभों में जिनकी आशा की प्रचुरता रहती है चित्त में आया कि अमुक पदार्थ खाना है तो तुरंत बनवाकर खाते हैं, चित्त में किसी विषय के भोग की प्रचुर आशा को नहीं रोक सकते हैं वे मोक्ष के लिए क्या पुरुषार्थ कर सकेंगे? उनके वे गुण मन बहलाने के लिए या लोक में अपने धर्मात्मापन की बात रखने के लिए होते हैं। वे कुछ श्रम भी करें तो उनका वह श्रम करना व्यर्थ है। प्रथम तो यह विमर्श कीजिए कि यह आशा एक विकार है, जीव में दु:ख के लिए उत्पन्न होती है। इसको नष्ट करना अच्छा है मान लो थोड़ी देर को आपको सिनेमा देखने का भाव जगा, एक आशा लग गयी कि हम सिनेमा देखें, अगर न देखें सिनेमा, उस आशा को मिटा दें तो उससे नुकसान क्या हुआ? शांति तुरंत हो गयी। ऐसी ही समग्र विषयों की बात है। हम आशा के वश न हों तब तो हमारा मोक्ष के लिए पुरुषार्थ चल सकता है, यदि हम आशा के वशीभूत हुए हैं तो धर्मपालन वहाँ नहीं हो सकता। आशा से ही परिग्रह बढ़ता है, अथवा आशा ही परिग्रह है। ये बाह्यपदार्थ रहें न रहें, कैसे ही हों वह परिग्रह नहीं कहलाता, किंतु उनमें मूर्छा परिणाम जगना यही परिग्रह है। यह आशा से होता है, और जिसे परिग्रह लगा है वह अपने आत्मा की सुध नहीं रख सकता। जो आत्मा का ध्यान नहीं कर सकते उन्हें मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती। सदा के लिए संसार के संकट छूट जायें यह तो सम्यग्ज्ञान से ही संभव है।

भगवंतों की निरीह अपार कृपा- हम भगवान के इतने कृतज्ञ क्यों हैं? उनका समारोह मानते हैं, उनका गुणगान करते हैं, सारा विश्व उनका कृतज्ञ है, इसका कारण क्या है कि प्रभु ने समस्त विश्व को वह उपदेश दिया जिस उपदेश पर चलकर हम सदा के लिए संसार के संकटों से छूट सकते हैं। भला यदि एक ही भव के कुछ थोड़े से संकट मिट गये, धन वैभव जुड़ जाने से क्षुधा आदिक की वेदनाएँ शांत कर ली, कोई प्रकार की तकलीफ नहीं रही पर ये विषयकषाय तो अभी नहीं टले। भगवान महावीर स्वामी ने ऐसा उपदेश दिया कि वह कार्य यहाँ कर जावो कि फिर सदा के लिए सारे संकट टल जायें। और, ऐसा ही उपाय अनंत तीर्थंकरों ने बताया। जो सत्य बात है वह सदा एक ही रहती है। जो उपदेश महावीर प्रभु ने दिया है वही उपदेश उनके पहिले जितने तीर्थंकर हुए उन्होंने किया, वही उपदेश समस्त विदेहों में तीर्थंकर किया करते हैं। जो सत्य बात है, जो अनादि से स्वरूप पाया जाता है, जिनके सम्यग्ज्ञान हुआ है वह तो एक ही समान जानेगा। अनंत तीर्थंकरों ने वस्तु का स्वरूप सही-सही जाना और वैसा ही उनकी दिव्यध्वनि से प्रसारित हुआ, तो उनके उपदेश से हमें वे उपाय मिले कि जिन उपायों से चलकर हम सदा के लिए संकटों से छूट सकते हैं। उनके इन उपायों में सर्वप्रथम उपाय है भेदविज्ञान। जो पदार्थ जैसा है उसे वैसा समझ ले उसका सही स्वरूप समझ ले, यही है भेदविज्ञान। यह भेदविज्ञान हमारे मोक्ष का प्रथम साधन है।

वस्तुस्वरूप समझने का भागवत उपाय- वस्तु का स्वरूप क्या है कैसे हम जानें कि यह वस्तु सही है? स्याद्वाद से। अनंत भगवंतों ने पदार्थों के जानने का उपाय स्याद्वाद बताया है। स्याद्वाद का अर्थ है स्याद मायने अपेक्षा से, वाद मायने कहना। कोई अपेक्षा रखकर उस धर्म का उपदेश दिया जाय तो स्याद्वाद है। स्याद्वाद में पूर्ण निर्णय बसा हुआ होता है, संशय नहीं रहता है। जैसे लोक में किसी युवक का परिचय दिया जाता है तो यों ही कहा जायगा न कि यह अमुक का लड़का है, इसमें ही और लगा दिया जाय तो हो गया- यह अमुक का लड़का ही है। यही निर्णय हुआ और यही सच है, और जब यों कहा जायेगा कि यह अमुक का पिता ही है तो वह भी सच है। पिता की दृष्टि से पुत्र बताना और पुत्र के मुकाबले पिता बताना इसमें पूर्ण निर्णय भरा हुआ है। स्याद्वाद उपाय बताया वीर प्रभु ने पदार्थों का यथार्थज्ञान करने में। समस्त पदार्थों का अपना अपना स्वरूप होता है। स्वरूप रहित कोई पदार्थ नहीं है। स्वरूप ही नहीं तो उसका सत्त्व क्या? यदि कुछ है तो उसका स्वरूप भी तो होगा। प्रत्येक पदार्थ अपना-अपना स्वरूप रखते हैं और स्वरूप मिलता है 4 बातों से, उसका पिंड, उसका क्षेत्र, उसका समय, अवस्था और उसका गुण। इस स्याद्वाद के द्वारा पहिचानें कि प्रत्येक पदार्थ अपने स्वरूप से हैं पर के स्वरूप से नहीं। मान लो दो मित्र हैं अथवा बहुत दिल मिले हुए पिता पुत्र हैं, पिता अनेक उपाय करता है पुत्र को सुखी करने के लिए, मगर क्या पिता पुत्र के आत्मा के सुखरूप परिणम जायगा? नहीं परिणम सकता। वह पिता अपनी कल्पनाएँ बनाता है, कल्पनाएँ उसकी चीज हैं और कल्पनाओंरूप वह परिणम जाता है। यों प्रत्येक पदार्थ अपने-अपने स्वरूप से ही रहा करते हैं। यह वीरप्रभु के उपदेश से हमें स्याद्वाद मिला है और इस सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होने से ही यह विश्व वास्तव में कृतज्ञ बनता है। हम वीरप्रभु में इसीलिए कृतज्ञ हैं कि हम पदार्थ के सत्यस्वरूप की झलक कर लेते हैं। चाहे हम कर्मविपाकवश उस पथ में भी न चल सकें किंतु झाँकी मिल गयी कि हमको इस पथ से चलना चाहिए। हमारा कर्तव्य इस मार्ग से चलने का है। झाँकी मिल जाना भी एक बहुत बड़े संतोष को उत्पन्न करता है।

नि:संकट आत्मा में संकट बसा लेने की भूल- संसार में जहाँ देखो वहाँ संकट ही संकट है। इस जीव के अज्ञान बसा है अतएव जीव ने संकट समझ रखा है। इष्ट का वियोग हो गया, अब मान लिया कि मुझ पर बड़ा संकट छाया है। अरे संकट क्या है? तुम तो पूरे के पूरे हो। यह दुनिया आनी जानी है। अभी यहाँ बैठे हो, कल को न जाने कहाँ चले जावोगे, यह तो संसार की रीति है। यह तो पदार्थ का परिणमन है, संकट क्या आया सो बतलावो? पर दिल में स्नेह बसा था संकट बना लिया। स्नेह से इस जीव को कुछ भी लाभ होता हो तो परख लीजिए, निर्णय कर लीजिए। किस जीव को चाहे वह स्वजन हो, चाहे मित्र हो, किसी से भी स्नेह परिणाम करने से कुछ भी लाभ मिलता हो तो अंतर में दृष्टि देकर निर्णय कर लें। कैसा ही कोई स्वकीय हो, सगा हो, पुत्र हो, मित्र हो, स्त्री हो, कोई हो किसी में स्नेह भाव जगाने से इस आत्मा को कोई लाभ मिलता हो तो ढूँढ़ निकालो। केवल एक विषयों के साधन की यदि बात कहोगे कि किसी से स्नेह करने से हमारे इंद्रिय और मन के विषयों का साधन मिल जाता है, तो वह क्या लाभ की बात है? अरे ये सब स्वप्नवत् बातें हैं, मायारूप है, इसी तरह यहाँ भी जो समागम मिले हैं वे सब निपट मायारूप हैं, जो दृष्टिगोचर होता है, जो यह अवस्था बनी हुई है इसे एक व्यापक दृष्टि से विचार करो तो यह स्पष्ट विदित होगा कि इससे रंच मात्र भी लाभ नहीं है। यहाँ जो एक दूसरे के स्नेह का भान किया जाता है इससे भी रंच लाभ नहीं है। इंद्रिय के विषयों का साधन मिलना, मन के विषयों का साधन मिलना यह सब मायारूप है, और इस जीव को संसार में भटकाने वाला है। स्नेह करके इस आत्मा को कोई लाभ नहीं मिलता है।

आशा के परित्याग में अन्य सब हितसाधनों की सुगमता- जब श्रीरामचंद्रजी के दरबार में उनका सेनापति कृतांतवक्र यह बोला कि हमें तो इस संसार से उदासी आयी है, अब मैं यहाँ से जाऊँगा और मैं अब अपने इस पद का इस्तीफा देता हूँ और सर्वपरिग्रह का त्याग करता हूँ तब उसे अनेक लोगों ने समझाया, श्रीरामचंद्रजी ने भी कहा कि अचानक तुम ऐसा व्रत धारण करने की क्यों ठानते हो? यह बड़ा दुर्धर व्रत है, मुश्किल से पालन हो पाता है, तो कृतांतवक्र ने कहा कि हे प्रभु ! जब हम आपके स्नेह का त्याग कर रहे हैं तो इससे कठिन और बाकी तपश्चरण नहीं हो सकते। स्नेह का परित्याग कर देना, आशा का परित्याग करना इससे उत्कृष्ट और क्या तपश्चरण हो सकते हैं? तपश्चरण में तो सिंह भी आक्रमण करे, बड़े-बड़े शत्रु भी आक्रमण करें तो उन्हें भी समता से सहन करना पड़ता है। तो जो आशा का विष, स्नेह का विष जीवों में लबालब भरा हुआ है उस विष भरी हालत में कुछ ऊपरी-ऊपरी कार्य करके एक सामाजिक ढंग से, पाटी के ढंग से, मंडली की पद्धति से कुछ धार्मिक कार्य करके अपने को संतुष्ट मान ले, हमने तो प्रभु का समारोह मना लिया, यह काम तो हमारा अच्छा भी बैठ गया। हमने कुछ किया यों हम संतोष कर लें तो जरा भीतरी दृष्टि से विचारों तो सही, जो आशा विष से, गहराई से लबालब भरा हुआ है, उसमें धर्म की गंध कहाँ से आ जायेगी? जब भेदविज्ञान की झलक ही न हुई हो, एक क्षण भी पर के विकल्प तोड़कर निज में आने की बात ही न आती हो ऐसे कठोर चित्त में, अहंकार भरे चित्त में गंध कहाँ से आयेगी?

वीर प्रभु ने आशा का सर्वथा परिहार किया था, और उनके चरित्र से मालूम होना चाहिए कि उन्होंने दुर्धर ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके इस आशा का परिहार किया और नि:संग परित्याग महाव्रत धारण करके समस्त आशावों का परित्याग किया। आज हम उनकी मूर्ति की स्थापना करके उस मूर्ति के समक्ष इतने विनय से रहा करते हैं, इतना आदर किया करते हैं वह सब किसका परिणाम है? भगवंत ने आशा का सर्वथा परिहार किया, जिसके कारण उनमें उज्ज्वलता बढ़ी, विकास बढ़ा, पूर्ण विकास हुआ, उसी से यह विश्व उनका सेवक बन रहा है।

भगवंतों के शासन से अपने अनुशासन की भावना- भगवंतों के उपदेश से हमें कुछ अपना भी अनुशासन सीखना चाहिए। मैं भी अब इस आशा का सर्वथा परिहार कर सकूँगा और विकार रहित शुद्ध ज्ञानस्वरूप का अनुभव करूँ, ऐसी अपनी भी तो इच्छा होनी चाहिए। भला इस कुटुंब में ही, इस वैभव में ही आशा लगा लगाकर स्नेह बना-बनाकर जीवन पूरा करने में लाभ क्या पा लोगे? कुछ सोचना तो चाहिए। बहुत काल जाता है स्नेह में, बहुत काल जाता है कषायों में, बहुत काल जाता है विषयविकारों में, तो क्या कुछ क्षण अपने को निर्विकार अनुभव करने में कठिनाई न होना चाहिए। जो चीज एक बार देख ली गई है वह तो वैसी की ही वैसी जानने में आया करती है। कितने भी अन्य-अन्य प्रसंग आयें, अपना उपयोग कुछ बदल भी जाय, लेकिन देखी हुई चीज अन्यथा गलत नहीं होती। इसी तरह सत् पुरुषार्थ से, स्वाध्याय से, सत्संग से, किसी भी प्रकार अपने आपका सही अनुभव जग जाय कभी, अनुभव जग जाने पर फिर कितने भी प्रसंग आयें उनकी प्रतीति नहीं टाली जा सकती है। तो करने का काम यही है, आशायें रखकर जीवन व्यतीत करना अपना कर्तव्य नहीं है। प्रभुवीर भगवान ने हम सब जीवों को यह उपदेश दिया जिस पर चलकर हम सदा के लिए संकटों से छूट सकते हैं, पर साथ ही यह भी समझें कि जो सर्वोत्कृष्ट उपदेश होते हैं उन उपदेशों की शैली में पद पद पर वे भी दु:खी रहते हैं जिससे हम अपना लौकिक जीवन भी सुखी बना सकें।

प्रभुभक्ति की वास्तविकता का आधार- हम प्रभु की याद करते हैं तो उनकी याद में हम एक यह शिक्षा लें, आज यह संकल्प करें कि हम अपने जीवन में सद्भावना बनायें रहेंगे। किसी भी जीव का हम बुरा न सोचेंगे, धर्म का कोई कार्य होता हो तो अपने नाम के खातिर अथवा उसमें नाम नहीं हो पाया, इससे कुछ बुरा मानकर उसमें विरोध करना यह अत्यंत बुरी असद्भावना है, ऐसा असद्भाव न रखेंगे, और यह भावना करें कि जो भी लोग इस हितकारी धर्म की प्रभावना में जितना जो कुछ अपनी सामर्थ्य करके प्रभाव बढ़ाना हो बढ़ायें और उसमें प्रसन्नता मानें। परस्पर में किसी दूसरे के प्रति ईर्ष्याभाव न रखें, जितना बन सके सधर्मीजनों के संकट दूर करें, तन, मन, धन, वचन सब कुछ यथाशक्ति लगाकर अपने सधर्मीजनों के संकट दूर करें, और विशेष क्या बताया जाय? सम्यग्ज्ञान के 8 अंगों में हमें व्यवहार में क्या करना चाहिए यह सब कुछ दर्शा दिया है। प्रथम तो हम धर्म के तत्त्व में शंका न करें। जो प्रभु ने पथ बताया है उस पथ पर संदेह न रखें। अपने शरीर की पोजीशन के लिए मनचाही इच्छायें न बनायें। धर्मात्माजनों की सेवा में हम घृणा न करें। ग्लानि को छोड़कर हर संभव उपायों से हम धर्मात्मावों की सेवा करें। कभी किसी कुपथ से प्रभावित न हो जायें। मन में यह श्रद्धा रखें कि मुक्ति का मार्ग तो यह विज्ञान वीतरागता है। सम्यक्त्व, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र का ही पथ संकटों से छुड़ाने वाला है। लौकिक चमत्कारों से प्रभावित होकर अपने भीतरी निर्णय को न बदलें। दूसरे के दोषों को प्रकट न करें अर्थात् निंदा न करें। हम अपने गुणों को अपने मुख से न बोलें। कोई धर्मात्मा पुरुष किसी भी बात से पतित हो रहा हो उससे घृणा न करें, किंतु जैसे वह धर्म में स्थिर हो सके वह उपाय बनायें। सधर्मीजनों से भी निष्कपट भाव रखें और अपना चारित्र बढ़ाकर अपना आचरण शुद्ध करके ईमानदारी से रहकर, न्यायवृत्ति से रहकर लोगों में धर्म की प्रभावना बढ़ायें, ये सब कार्य प्रभु ने बताये हैं। इन कर्तव्यों पर चलते रहेंगे तो लौकिक जीवन में भी हम कष्ट न पा सकेंगे। और परमार्थ पथ का तो मुख्यतया उन्होंने उपदेश किया ही है। हम आज अपने में यह संकल्प बनायें कि हे प्रभो ! मुझमें ऐसी सुमति जगे कि सद्भावना ही बर्तती रहे। सब जीवों के हित के लिए हमारा भाव बना रहा करे, किसी के हम विरोधी न बनें, निंदक न बने। हे प्रभो ! हममें ऐसी सद्बुद्धि बने और उस ही शुद्ध आचरण पर चल सकें तो हम प्रभु के सच्चे मायने में भक्त कहला सकते हैं।


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