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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 89

From जैनकोष



मनोज्ञविषयै: सार्धं संयोगा: स्वप्नसन्निभा:।

क्षणादेव क्षयं यांति वंचनोऽद्भुतवैभव:।।89।।

विषयों की कल्पितता व क्षणक्षयिता― ये मनोज्ञ विषय जिनके साथ यह थोड़ा संयोग हो रहा है यह सब संयोग स्वप्न के समान है। क्षण मात्र में नष्ट हो जाता है। जिसकी बुद्धि ठगने में उद्यत है ऐसे ठगों की नाई ये विषय भोग समागम थोड़े काल चमत्कार दिखाकर फिर इस जीव का सर्वस्व हरण करने वाले हैं। इन इंद्रिय विषयों के प्रति इस श्लोक में दो बातें दर्शायी हैं, एक तो यह कि इन विषयों का संबंध इनकी प्राप्ति स्वप्न के समान है। जैसे कोई जीव स्वप्न में जो चाहे वैभव निरखता है, पर वह वैभव सब इस जीव को वहाँ प्राप्त नहीं है, केवल एक स्वप्न में दिख रहा है, जग जाने पर फिर वह वैभव कहाँ रहता है और उस स्वप्न के कारण जग जाने पर भी इसे क्लेश भोगना पड़ता है। जैसे स्वप्न में बड़ा वैभव दिखा, निद्राभंग हुई, अब उस वैभव के न दिखने से यह कुछ तो कष्ट मालूम ही करता है। चाहता है कि पहिले जैसी नींद फिर आ जाय और वही वैभव फिर मुझे मिल जाय। तो जैसे स्वप्न में वैभव है नहीं, केवल कल्पित है, इसी प्रकार से ये विषय समागम कुछ तत्त्वभूत नहीं हैं, केवल एक कल्पित हैं। एक बात तो विषयों के संबंध में यह बतायी, दूसरी बात जिसका विषयों के संबंध में संकेत किया है उसे सुनिये।

विषय ठग― ये विषय महा ठग है। जैसे ठग लोग कुछ थोड़ा सा वैभव दिखाकर, कुछ फुसला कर, कोई आशा दिखाकर अथवा कुछ लोभ देकर अंत में उस व्यक्ति का सर्वस्व हर लेते हैं इस ही प्रकार ये विषयभोग इस जीव को कुछ-कुछ चमत्कार सा दिखाकर कुछ बड़प्पन सा दिखाकर अंत में इस जीव का सर्वस्व हर लेते हैं। जिसका ज्ञान हरा गया उसका सर्वस्व हरा गया। जिसका श्रद्धान् बिगड़ गया उसका सर्वस्व बिगड़ गया। ये इन विषय भोगों के समागम केवल दु:ख ही दु:ख बनाते हैं और इन विषय सुखों के प्रसंग में सुख तो राई भर होगा किंतु दु:ख मेरूपर्वत बराबर है। इस संसार में कौनसी स्थिति ऐसी है जिसमें रहकर हम सुखी रह सकें? यह संसरण ही समस्त दु:खमय है। तो ठगियों की ही भाँति ये विषयसमागम कुछ थोड़ा सुख, थोड़ा मनोरंजन यश, नाम, कीर्ति आदिक की कुछ कल्पित घटना ऐसी कुछ कल्पित ऋद्धियाँ बता-बताकर इस जीव का सर्वस्व हर लेते हैं। विषयों की आसक्ति से इस जीव का ज्ञान स्थिर कहाँ रह पाता है?

जीव का स्वास्थ्य― जीव का स्वास्थ्य तो अथवा जीव का परमप्रयोजन तो सदा के लिए अपने आपमें स्थित हो जाने में है। आध्यात्मिक स्वास्थ्य ही इस जीव का परम स्वास्थ्य है। स्वास्थ्य आत्मा का आत्मा में स्थित हो जाना ही है। ये भोग स्वास्थ्य नहीं हैं क्योंकि प्रथम तो ये उपभोग क्षणिक हैं फिर और तृष्णा के संबंध होने से इन भोगों के प्रसंग में शांति नहीं रह सकती। अत: एक आत्मा का आत्मा में आत्मस्वरूप का दर्शन होना और इसमें ही संतुष्ट रहना, प्रसन्न रहना, इसे ही अपना मानना, ऐसा जो ज्ञानप्रकाश है वह प्रकाश ही इस जीव के हितरूप हैं। ऐसा जानकर हे मुमुक्षुजनों ! इन असार भोगों के लिए आसक्त मत होओ, इन्हें सारभूत मत समझो। इनसे विरक्त होकर अपने आपमें ही लीन होने का यत्न करो।


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