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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 90

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घनमालानुकारीणि कुलानि च बलानि च।

राज्यालंकारवित्तानि कीर्तितानि महर्षिभि:।।90।।

राज्यादि वैभवों की तरह क्षणभंगुरता― महर्षिजनों ने इतनी चीजों को मेघमाला की तरह देखते-देखते विघट जाने योग्य बताया है। एक तो कुल मायने कुटुंब। सभी जो वयस्क लोग हैं, उन्हें स्वयं आँखों देखा है वे कुटुंबीजन, पुराने लोग देखते-देखते ही विलीन हो गए हैं। यदि किसी घर का कुटुंब बना ही रहता, मरण न करता तो आज वह कहाँ समाता? पर ऐसा होता ही नहीं। जो जन्म लेता है वह नियम से मरण करता है।

ज्ञानी के मरणभय का अभाव― मरण तो अचानक कभी हो सकता था, लेकिन मरण की कल्पना मन में आते ही यह जीव भयभीत हो जाता है। आज यह सोचता है कि कहीं मैं 2-4 वर्ष के भीतर ही गुजर गया तो क्या होगा और यह नहीं जानता कि यदि मैं आज से 10-20 वर्ष पहिले ही गुजर गया होता तो क्या होता? ज्ञान तो वह है जिसमें यह ज्ञानी-पुरुष सदा मरने के लिए उद्यत है अर्थात् मृत्यु आती हो तो आये, यह मैं अपने इस शुद्ध अमूर्त ज्ञानस्वरूप निज अंतस्तत्त्व को संभाले रहूँ तो मेरा कुछ अहित नहीं है ऐसा साहस रखता है और मरण का भय नहीं करता है यह। मैं पूरा का ही पूरा हूँ, पूरा ही था, पूरा ही रहूँगा, इसमें किसी दूसरे द्रव्य का कोई वश नहीं चलता, उसका कोई खंड नहीं कर सकता। खंड करना तो दूर रहा, उसका कोई स्पर्श भी नहीं कर सकता। इस बात का जिन्हें ध्यान नहीं है और बाह्य चीजों में ही जिनकी बुद्धि प्रवर्त रही है वे पुरुष कुटुंब से मोह करके अपने आपको दु:खी किया करते हैं― हाय ! यह नहीं रहा, यह मर गया। अरे मर गया तो क्या हुआ, खुद को भी तो कभी मरना है। यह कुल, यह कुटुंब, यह समागम मेघमाला की तरह देखते-देखते विघट जाने वाले हैं।

बल की विनश्वरता― इसी प्रकार यह देहबल, शरीर की शक्ति यह भी देखते-देखते विघट जाने वाली है। कभी बढ़ गया, कभी घट गया, क्या स्थितियाँ होती हैं? जो आज वृद्ध हैं वे कुछ थोड़े ही समय पहिले बालक अवस्था में रहकर आज के बालकों से भी ज्यादा कूदफाँद करते थे। आज के बालकों में क्या शक्ति है? जो इन बूढ़ों के बचपन में शक्ति थी। कैसा कूदते फाँदते अपने बल का प्रयोग करते थे। आज स्थिति यह है कि खुद खड़ा नहीं हुआ जाता, खुद लेटा नहीं जाता। बल की क्या हालत है, जिसे आज बल मिला हुआ है यह बल भी इस जीवन में रहने का नहीं है, यह भी मेघमाला की तरह देखते-देखते नष्ट हो जाता है। ये राज्य, वैभव, ऐश्वर्य, कीर्ति, प्रतिष्ठा ये सब भी मेघमाला की तरह विनष्ट हो जाते हैं।

कीर्ति समृद्धि की असारता― मान लो कदाचित् कीर्ति फैल गयी तो लोग 10-20 वर्ष तक गुण गा लेंगे और गा लें लोग कुछ वर्ष तक तो इससे जीव को क्या मिला। यह तो अपने परिणाम और अपने भाग्य के अनुसार अपने आपका ही कर्ता भोक्ता होता है। कौन किसका क्या कर देता है? जिन समृद्धियों के पीछे उपयोग जुटाकर, तृष्णा लगाकर, आशा बनाकर अपने आपके प्रभु का घात किया जा रहा है, ये वैभव समृद्धियाँ दु:ख के कारण तो बनेंगे पर शांति के कारण नहीं बन सकते।

विनश्वर में विनश्वर की अदृष्टि से हानि― यह वैभव धन संपदा दिखते-दिखते विनष्ट हो जाने वाली चीज है। धन का बढ़ जाना भी बड़ा दु:खकारी है। जितना अधिक धन होता है विघटने पर उतना ही अधिक उससे क्लेश होता है। कम धन के विघटने वाला तो शीघ्र ही संतोष कर लेगा, पर अधिक धन के विघटने वाला तो उसके पीछे बहुत दु:खी होगा। अरे धन वैभव न रहा, न सही, यह तो घनमाला की तरह देखते-देखते ही विलय को प्राप्त हो जाता है। लेकिन यह मोही प्राणी इन क्षणिक पदार्थों में व्यर्थ ही नित्यपने की बुद्धि करता है। यह मुझे मिला है, मैं इसे ऐसा व्यवस्थिति बनाऊँगा, यह मेरे साथ सदा रहेगा, यों नाना कल्पनाएँ करके यह जीव दु:खी हो रहा है।


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