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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 927

From जैनकोष



क्रोधाद्द्वीपायनेनापि कृतं कर्मातिगर्हितम्।

दग्ध्वा द्वारावती नाम पू: स्वर्गनगरीनिभा।।927।।

क्रोध से द्वीपायन द्वारा द्वारावती नगरी जलाया जाकर अतिगर्हित कर्म का आपादान― वही दृष्टांत इस श्लोक में दिया है कि जैसे द्वीपायनमुनि ने क्रोध का ऐसा यत्न किया कि द्वारिकापुरी को भस्म कर दिया। भगवान के समवशरण में कृष्ण नारायण को उत्तर मिला जब श्रीकृष्ण ने अपने नगर, वंश सबकी कुशलता का प्रश्न किया तो भगवान उत्तर नहीं देते हैं, उनकी तो दिव्यध्वनि ही खिरती है, गणधर उसे झेलते हैं, उत्तर गणधर देते हैं तो यह उत्तर आया कि इस कुल में उत्पन्न हुए द्वीपायन मुनि के द्वारा यह द्वारिकापुरी नगरी भस्म हो जायगी और जरतकुमार के निमित्त से नारायण का देहांत होगा। ये दो बातें जब सुनी तो जरतकुमार को भी खेद हुआ और द्वीपायनमुनि को भी खेद हुआ। नारायण और द्वीपायनमुनि ये दोनों नगरी छोड़कर चले गए। अब द्वीपायनमुनि के प्रसंग घटना तो यों हुई कि 12 वर्ष के बाद द्वारिकापुरी में प्रवेश होने का संदेश था। तो कभी-कभी 13 महीने का वर्ष होता है इस कारण 12 वर्ष ठीक-ठीक गिनती में न आया। 12 वर्ष बीतने के जब कुछ ही दिन शेष थे तो द्वीपायनमुनि स्नेहवश द्वारिकापुरी पहुँचे। वह द्वीपायनमुनि सम्यग्दृष्टि थे, उन्हें तैजसऋद्धि प्राप्त थी, मगर द्वारिकापुरी के नौजवान लड़कों ने जो कि नगरी के उपवनों में खेल रहे थे उन्होंने द्वीपायनमुनि पर कंकड़ पत्थर फेंककर मारा। उस 12 वर्ष के बीच में राजा ने क्या प्रबंध करा रखा था कि सारी मदिरा बाहर फिकवा दी थी ताकि मदिरा वगैरह पीकर मदमस्त होकर कोई द्वारिकापुरी में आग न लगा दे। आखिर हुआ क्या कि वह सारी मदिरा बरसात में बहकर एक जगह इकट्ठी हो गयी थी और वहाँ पानी में मिल गई थी। उस पानी को पीकर वहाँ के नौजवान लड़कों ने मदमस्त होकर द्वीपायनमुनि पर कंकड़ पत्थर चलाया तो उस समय द्वीपायनमुनि के बड़ा क्रोध जगा। उसी समय उनके बायें कंधे से बिलाव के आकार में तैजस निकला। श्रीकृष्णनारायण के प्रसंग में उस समय क्या घटना घटी कि श्रीकृष्ण नारायण रथ पर सवार होकर जब नगरी से बाहर जाने लगे तो नगरी का फाटक बंद हो गया रथ भी थम गया। उसी समय वहाँ एक आवाज आयी कि नारायण और बलभद्र यहाँ से चले जायें इस द्वारिकापुरी में कोर्इ अन्य न बचेगा। तो नारायण और बलभद्र नगरी छोड़कर बाहर चले गए। उस जंगल में वे पहुँचे जहाँ पर जरतकुमार रहता था। नारायण एक जगह पीतांबर ओढ़कर सो गए, बलभद्र जल भरने चला गया, जरतकुमार ने नारायण के पैर में चमकते हुए चिन्ह को देखकर सोचा कि यह तो कोई हिरण है, लो उस पैर में बाण मार दिया। नारायण का वहीं मरण हो गया। तो इस कथानक से शिक्षा की बात यह लेना है कि कोर्इ कितना ही बचाव करे, पर अनर्थ होना है तो हो ही जाता है। और कोर्इ कितना ही दूसरे का बिगाड़ करना चाहे यदि उदय प्रतिकूल नहीं है तो कोर्इ उसका बिगाड़ नहीं कर सकता लेकिन क्रोधी पुरुष क्रोध करके अपना तो सारा ही बिगाड़ कर लेता है। उसने अपना संयम खोया, श्रद्धान खोया, सब तपश्चरण व्यर्थ किया। और, इस लोक में भी उस क्रोधी पुरुष की लोग दुर्गति कर डालते हैं। क्रोध करने से इस लोक में भी बड़ी-बड़ी आपत्तियाँ सहनी पड़ती है। चाहे कोई ज्ञानी पुरुष भी हो पर क्रोध के वशीभूत होकर वह अपने आपकी बुद्धि को खो देता है और अटपट व्यवहार करता है जिससे उसे इस लोक में भी विपत्तियाँ मिलती हैं और ऐसा खोटा कर्मों का बंध कर लेता है कि जिससे परभव में भी उसे बड़े-बड़े क्लेश भोगने पड़ते हैं। तो इस क्रोध करने वाले को आत्मध्यान में सफलता नहीं मिल सकती। जिसे आत्मध्यान चाहिए, जिसे उत्कृष्ट सुख शांति चाहिए उसका कर्तव्य है कि इस क्रोध कषाय को दूर करें।


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