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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 928

From जैनकोष



लोकद्वयविनाशाय पापाय नरकाय च।

स्वपरस्यापकाराय क्रोध: शत्रु: शरीरिणाम्।।928।।

क्रोध की स्वपरापकारकता― यह क्रोधरूपी शत्रु पुरुष के इस लोक को भी नष्ट करता है। तथा नरक में ले जाने वाला और पापों का कराने वाला, अपने और पराये सबको नरक में ले जाने वाला है। क्रोध से इस लोक का जीवन भी नष्ट हो जाता है। क्रोधी पुरुष को कोई महत्त्व नहीं देता है और क्रोधी के कभी अपने चित्त में प्रसन्नता भी नहीं रहती। जिसे क्रोध आता है चाहे व्यक्त आये चाहे मन ही मन बसा रहे, उसके प्रसन्नता नहीं रहती। तो यह जीवन ही उसका नष्ट हुआ समझिये और परलोक का जीवन भी नष्ट हुआ समझिये। और, तीव्र क्रोध हो तो फिर नरक आयु का भी बंध कर लेता है और नरकों में जो जीव उत्पन्न होते हैं वे भी उत्पत्ति के समय क्रोध कषाय को ही लिए रहते हैं और जिस नरक में जाते हैं मरते समय भी उनके क्रोध कषाय रहती है और क्रोध कषाय से ही नरक आयु का बंध होता है नारकियों के जीवन में भी क्रोध की मुख्यता रहती है। तो क्रोधी पुरुष का जो निवासस्थल है वह एक तरह का अलंकाररूप में नरकपुरी समझिये। कोई किसी को नहीं सुहाता, न सभ्यता है, वे एक दूसरे पर क्रोध बरसाते हैं तो यह लोक भी नष्ट हुआ। क्रोध से न अपना ही भला है और न किसी दूसरे जीव का भला है।


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