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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 94

From जैनकोष



मोहांजनमिवाक्षाणामिंद्रजालोपमं जगत्।

मुह्यत्यस्मिन्नयं लोको न विद्य: केन हेतुना।।94।।

जगत् की इंद्रजालोपमता― यह जगत् इंद्रजाल की तरह है। इंद्रजाल और अलग चीज क्या होती होगी? वर्णन चला आया है। कोई मायावी पुरुष किन्हीं न हुई चीजों को भी हुई जैसी दिखा दे तो उसे कहते हैं इंद्रजाल। जैसे बाजीगर लोग होते हैं, वे न हुई चीज को भी हुई जैसी दिखा देते हैं। क्या करते हैं, क्या उनका ढंग है कुछ पता नहीं। किसी दर्शक की टोपी उठाई और खन-खन करके रुपये गिराने लगते हैं। किसी दर्शक का दुपट्टा ले लिया और उसे हिलाया तो उससे खन-खन करते हुये रुपये गिरने लगते हैं। ऐसा लोगों को दिखता है। तो कितने ही रुपये खन-खन करके गिरा दिये और बाद में खेल दिखाने के पश्चात् वह बाजीगर सबसे एक-एक, दो-दो पैसा मांगता है। अरे अब वह पैसे क्यों मांगता है? जो खन-खन करके गिरते हुए दिखाये वे क्या रुपये पैसे नहीं थे? यद्यपि लोगों के देखने में आया, सुनने में आया, पर वे पैसे नहीं थे। तो जो है, नहीं है, है जैसा दिखा दे, वही तो इंद्रजाल है। है कुछ भी नहीं और यहाँ दिखता है कि यह सब कुछ है, यही तो इंद्रजाल है।

इंद्रजाल का स्वरूप― इंद्र का अर्थ है आत्मा। इस आत्मा के मायारूप परिणमन से, औपाधिक परिणमन से जो यह भव मिला है, शकल सूरतें बनी हैं, यह पिंड बना है यह सब इंद्रजाल हैं। अब तो समझ लीजिए कि यह इंद्रजाल, इंद्रजाल की तरह है अर्थात् विनाशीक है, कुछ नहीं है तत्त्वभूत, फिर दिखने में लगता है कि यह तत्त्वभूत है। शरीर को ही निरख लो, क्या भरा है इसमें? शरीर में हाड़, खून, माँस, मज्जा, चाम, नाक, थूक, खकार, मलमूत्र इत्यादि सारी की सारी अपवित्र चीजें भी पड़ी हुई हैं और ऊपर से नीचे तक जो चमड़ी है सजी हुई, जिसमें कुछ कांति नजर आती है, इसमें भी कोई सारभूत बात नहीं है, यह इंद्रजाल की तरह है, ऐसे ही यह सारा जगत् इंद्रजाल की तरह है।

मोहनी अंजन में धूल― जैसे किसी पुरुष के नेत्र में मोहनी अंजन लग जाय तो वह भुलावे में आ जाता है, अनेक चीजें ऐसी हैं एक मोहनी धूल ऐसी होती है कि थाल में भोजन सजा दीजिए और उस मोहनी धूल को उस थाल के नीचे रख दीजिये तो खाने वाला उस भोजन को अटपट ढंग से खायेगा। क्या करेगा कि कोई चीज कहीं उठाकर रक्खेगा, कोई चीज कहीं नहीं रखेगा, कोई चीज मुँह से खाने के बजाय कान से ही खाने लगेगा। जैसे अनेक अटपट बातें हुआ करती हैं। बिल्लीलोटन आदिक अनेक उदाहरण दिए हैं तो जैसे नेत्र में मोहनी अंजन लग जाय तो वह भूला देता है, इसी प्रकार से इस जीव में मोह का अंजन लगा है जिसके कारण यह अपने को भूला हुआ है। सुख के लिए न जाने क्या-क्या प्रवृत्तियाँ यह करता है। जिस दिन अपने आपके आत्मा के अंत:स्वरूप का किसी प्रकार परिचय पा ले उस दिन अनंतकाल में आज का यह पाया हुआ जीवन धन्य है।

वैभव में अनुरंज्यता की अपात्रता― भैया ! जो अपूर्व बात अभी तक कभी नहीं पायी ऐसी अपूर्व आत्मस्वरूप के स्पर्श की बात उत्पन्न हो जाय तो इससे भी बढ़कर कुछ वैभव है क्या? वैभव के पीछे आज लोग न जाने कितने शंकित है? जब इन बाहरी बातों पर दृष्टि दी जाय तो शंका करना उचित और योग्य मालूम होता है, किंतु जब तक इस आत्मा के सहजस्वरूप पर दृष्टि देते हैं तो ये सब शंकाएँ नि:सार मालूम देती हैं। उसका कोई क्या कर लेगा? न उसे कोई छेद सकता, न वह पकड़ा जा सकता। यह तो यही है, कदाचित् प्राणांत भी हो जाय तो बिगाड़ क्या हुआ? किसी अन्य जगह इससे भी बहुत विशिष्ट धर्म के और वैभव के वातावरण में पहुँच जायेंगे। यहाँ का पाया हुआ वैभव है कितना सा? विशुद्ध भाव होगा, पुण्यभाव होगा, धर्मप्रेम होगा, शांति रहेगी, तो आज के पाये हुये वैभव से लाखों गुना वैभव मरने के बाद ही तो अधिकृत होगा। कितनी स्वर्ग रचनाएँ हैं, कितनी राजू रचनाएँ हैं, कितना बड़ा द्वीप है, कितना मध्यलोक है? सारी रचनावों पर दृष्टि डालो, जरासी बात में यहाँ क्यों मुग्ध हो?

साधु और गृहस्थ के दो दो ढौर― गृहस्थ जीवन में दो बातों की संभाल रखनी है। एक तो गृहस्थी के योग्य लौकिक कार्यों की संभाल रखनी है और दूसरे अपने आत्मधर्म के कार्यों की सँभाल रखनी है। इन दोनों कार्यों का चलते रहना यही गृहस्थ जीवन है। जैसे कि गुणस्थानों में बताया गया है―प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थान में वह झूलता रहता है, किसी एक जगह वह नहीं टिक पाता। अप्रमत्तविरत भी नहीं रहता। जैसे क्षण-क्षण में अंतर्मुहूर्त अंतर्मुहूर्त में प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थान बदलते रहते हैं इसी प्रकार सद्गृहस्थ के उपयोग में लोकव्यवस्था व आत्मधर्म की संभाल ये दोनों उपयोग बदलते रहते हैं। इसी कारण इस गृहस्थ की प्रवृत्ति आदर्शरूप बनती है। जो जीव ज्ञानी है उस ज्ञानी जीव के विषयों की प्रवृत्ति के समय भी जब संवर निर्जरा करने योग्य प्रवृत्ति रह सकती है तब समझिये इसका कोई भी स्थान हो, निद्रा की भी स्थिति हो। वह विषय प्रवृत्ति से तो कम खतरनाक प्रवृत्ति है। वहाँ भी यह अपने संस्कारों के अनुसार अपनी संभाल रखा करता है।

ज्ञान की अनिर्वचनीय महिमा― ज्ञान की महिमा ज्ञानियों के अनुभव में तो आ सकती है पर वह वचनों द्वारा प्रतिपादित नहीं हो सकती है। एक सम्यक्त्व पा लिया जाय तो आपने सब कुछ पाया, एक समीचीन दृष्टि ही न मिली और एक लौकिक वैभव इकट्ठा हो गया तो उससे क्या हुआ? अरे वे ढेर पहिले अलग-अलग थे अब इस शरीर से चिपक गए, इतना ही तो हुआ। धन संचय में, वैभव संग्रह में इससे अधिक और क्या हुआ? किंतु स्वयं का जो स्वरूप है उस स्वरूप का संभालरूप आत्मरुचि बने, सहज आनंद का अनुभव हो तो उस विभूति से बढ़कर कोई विभूति प्राप्त हो सकती है क्या? यह सब एक अनुभव की चीज है। जैसे खाई हुई मिठाई का स्वाद अनुभव में तो आ जाता है पर उसे शब्दों से क्या बताएँ? दूसरों के चित्त में कैसे उतारा जा सके? उसके लिये कोई वचन नहीं है। इस ही तरह अपने उस विशुद्ध आनंद की बात अनुभव में तो आ जाती है किंतु उसे बताने के लिये कोई शब्द नहीं हैं। और शब्द भी हैं तो शब्द वे उन्हीं को बताने में समर्थ हैं जिन्होंने इस आनंद का अनुभव किया है। जैसे मिश्री मिठाई के संबंध में यह कहा जाय कि यह बहुत मीठी है, सुहावनी है, किन्हीं भी शब्दों से कहा जाय तो इसका भाव वही समझ पायेगा जिसने उस मिठाई को चखा है। दूसरा नहीं जान सकता है। तो यह सब प्रयोगसाध्य बात है।

आत्मानुभव के यत्न का अनुरोध― हम इस बात का यत्न करें कि उस तत्त्व की जिसकी महिमा ऋषिसंतों ने बहुत गायी है हम उस रूप अपना श्रद्धान, ज्ञान और आचरण बनाकर उस अंतस्तत्त्वरूप अपना परिणमन बनाकर खुद अनुभव कर लें कि वह आत्मविश्राम का धाम कैसा है? कितना आनंदमय है? उस आनंद के अनुभव होने पर सारे संकट इसके दूर हो जाते हैं। सारी बात भीतर के साहस की है। जैसे किसी कार्य को करते हुये में कभी शिथिलता आये तो भीतर में साहस जगे तो फिर उसकी पूर्ति कर सकते हैं। सब साहस की बात है। निज की ओर उपयोग जगे तो ऐसा साहस प्रकट होता है कि फिर वहाँ संसार के कोई संकट नहीं सता सकते हैं। हे आत्मन् ! तू असार भिन्न, विनाशीक इन पुद्गलस्कंधों से प्रीति हटाकर सारभूत अभिन्न अविनाशी ज्ञानस्वरूप में प्रतीति कर।


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