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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 95

From जैनकोष



ये चात्र जगतीमध्ये पदार्थाश्चेतनेतरा:।

ते ते मुनिभिरुदि्दष्टा: प्रतिक्षणविनश्वरा:।।95।।

समागम पदार्थों की प्रतिक्षण विनश्वरता― इस संसार में जो जो भी चेतन और अचेतन पदार्थ हैं वे सब प्रतिक्षण विनाशीक हैं, ऐसा मुनिराज ने बताया है। स्वयं भी सामने देख रहे हैं कि ये दृश्यमान् सभी पदार्थ प्रतिक्षण क्षीण होते जाते हैं। कभी उनका रूपांतर हो जाता है कभी उनकी हानि-वृद्धियाँ होती हैं। एक रूप तो कुछ रहता ही नहीं। अनित्य भावना के इस प्रसंग में इन पदार्थों को अनित्य बताकर उनसे अपेक्षा करायी गयी है। तू इन अनित्य पदार्थों की प्रीति में लीन मत हो, अन्यथा इसका फल कुछ ही समय बाद बहुत बड़ा भुगतना पड़ेगा। जिसके संयोग में अधिक प्रीति है उसके वियोग के समय अधिक क्लेश भुगतना पड़ता है, अत: हे शांति के इच्छुक पुरुष ! न तो किसी चेतन पदार्थ में और न किसी अचेतन पदार्थ में तू राग द्वेष कर। इनमें रागद्वेष करना युक्त नहीं है। यद्यपि जितना जो कुछ व्यवहार में आ रहा है और दृश्यमान् है वह सब अचेतन ही है, किंतु जो चेतन सत् है, शरीरी है उनको चेतन समझियेगा। वास्तविक परमार्थभूत चेतन तत्त्व से कौन रागद्वेष करता है? वह चैतन्यस्वरूप जिसकी दृष्टि में आ जाता है वह तो विशुद्ध ज्ञाताद्रष्टा रहता है। प्रतिक्षण विनाशीक इन भवों में और इन अचेतन पदार्थों में हे मुमुक्षु !तू मोह और रागद्वेष मत कर।




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