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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 973

From जैनकोष



करोत्युद्धतधीर्मानाद्विनयाचारलंघनम्।

विराध्याराध्यसंतानं स्वेच्छाचारेण वर्तते।।973।।

मान के कारण दुर्बुद्धिजनों द्वारा विनयाचार का उल्लंघन व स्वच्छंद प्रवर्तन― जिसकी बुद्धि मान से मलीमस हो गई है ऐसा पुरुष बड़े पुरुषों के विनयाचार का उल्लंघन करता है।बड़े पुरुषों का विनय न करने का कारण क्या है? मान कषाय। जब मानकषाय उत्पन्न होती है तब प्रथम तो यही देखो कि सबसे बड़े भगवंत सहज ज्ञायकस्वरूप आत्मदेव का विनयाचार रहा ही नहीं। विनय कहते हैं विशेषतया ले जाने को। और नम्रता कहते हैं झुक जाने को। अपने उपयोग को अपने ज्ञानस्वरूप की ओर ले जाना सो विनय है और अपने ज्ञानस्वरूप की ओर उपयोग का झुकना सो नम्रता है ऐसी नम्रता और ऐसा विनय मानकषाय में रहने वाले पुरुष में कहाँ से प्राप्त हो सकता? विनय का संबंध है भाव से। तब यह शंका न रखना चाहिए कि पुराणों में बताते हैं कि तीर्थंकर मुनिजनों को नमस्कार नहीं कर पाते है और वे जब दीक्षा ग्रहण करते हैं तो णमो सिद्धाणं बोलकर करते हैं। इससे कहीं यह न जानना कि इसमें तो उनका अरहंतदेव के प्रति साधुजन के प्रति अविनयभाव है। अरे प्रशंसा करना भी विनय कहलाता है मन में अच्छा समझना भी विनय कहलाता है, लेकिन जो मान कषाय के वशीभूत हैं वे बड़े पुरुष को अच्छा भी नहीं समझ सकते और उसके प्रति नम्रता भी नहीं रख सकते। और, प्रथम बात तो यही देखो कि निज भगवान आत्मा की ओरतो उनकी दृष्टि ही नहीं पहुँचती। जैसे 5 पाप बताये गए हैं उनमें चौथा पाप बताया है कुशील और उसके त्याग को बतलाते हैं ब्रह्मचर्य किंतु वास्तविक अर्थ है सभी पापों का त्याग करना और ज्ञानस्वरूप ब्रह्म में रमण करना लेकिन ब्रह्मचर्य शब्द से चौथे पाप (कुशील) के त्याग को ही कहा गया है, अन्य चारों पापों के त्याग को भी तो ब्रह्मचर्य कहना था। जैसे वहाँयह अनुमान किया जाता कि कुशील एक ऐसा पाप है कि जिसके भाव में रहने पर आत्मा की सुध भी नहीं रह सकती, ऐसी कुछ प्रमुखता से अगर देखें तो इन कषायों में एक मान कषाय भी ऐसी कषाय है कि मान कषाय के रखते हुए में अपने आत्मा की सुध नहीं रह सकती। मद होता है पर्यायबुद्धि की बात निरखकर। जिसको मानकषाय की परतंत्रता है ऐसा पुरुष विनयाचार का उल्लंघन करता है और जो आराध्य पुरुष हैं, आराध्य गुरु हैं उनकी संतान की, उनकी पद्धति की विराधना करके स्वेच्छाचार में प्रवृत्ति करता है।

विनय व नम्रता में आत्मरक्षा― उस पुरुष की बड़ी रक्षा है जो किसी बड़े की विनय में, आज्ञा में अपने आपको इस प्रकार कृतसंकल्प होकर रखता है कि आदेश हुआ कि इस कष्ट को भी सहो, तो वह उसकी मनाही नहीं कर सकता। इस प्रकार जो कृतसंकल्प होकर किसी की नम्रता में विनय में रहता है। रक्षा उसकी है, जैसे घर में देखा होगा― घर में रहने वाला बड़ा पुरुष (मालिक) सुरक्षित है या घर के बाल-बच्चे स्त्री पुत्रादिक सुरक्षित हैं? अधिक आनंद में, निर्भयता में कौन रह रहे है? तो वे स्त्री-पुत्रादिक ही आनंद में रह रहे हैं। वह मालिक तो अनेक लोगों की बातें सुनता है, अनेक उपद्रव सहता है, उसके सामने बड़ी-बड़ी समस्यायें, बड़े-बड़े झंझट रहते हैं। वह तो शोकविह्वल रहा करता है, मगर जो आज्ञा में रहते हैं ऐसे स्त्री पुत्रादिक वे तो सदा सुरक्षित रहते हैं। एक यह मोटी दृष्टि से बात कही जा रही है। उससे हमें यह शिक्षा लेना है कि हम मद के वशीभूत न हों, मानी न बनें, किंतु बड़ों की आज्ञा में, विनय में रहने की अपनी वृत्ति बनायें, उससे हम सुरक्षित हैं। इस मानकषाय के वशीभूत होने से इस आत्मा को कुछ भी लाभ नहीं है।


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