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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 974

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मानमालम्व्य मूढात्मा विधत्ते कर्म निंदितम्।

कलंकयति चाशेषचरणं चंद्रनिर्मलम्।।974।।

मूढ़ात्माओं द्वारा मान का आलंबन कर निंदित कर्म का विधान― मान कषाय का आलंबन लेकर यह मूर्ख प्राणी निंदित कर्म को कर डालता है। इसके लिए दृष्टांत क्या देखना। प्राय: हर एक के जीवन में यही बात हे कि मान के वशीभूत होकर जो न करना चाहिए वह भी कार्य कर बैठता है जैसे दूसरे की तुच्छता प्रकट करना, दूसरे को विपत्ति में डाल देना, और तो क्या? मानी बड़े-बड़े नरसंहार तक कर देता है। और उसमें सारा जहान चाहे निंदा करता हो पर खुद में उसकी दृष्टि तक नहीं। ऐसी बड़ी-बड़ी विडंबनायें इस मानकषाय के कारण हो जाती हैं। तो मानकषाय के वशीभूत हुआ यह प्राणी बड़े से बड़े निंदित कार्य भी कर डालता है और समस्त चरित्र जो चंद्र की तरह निर्मल हो उसको भी कलंकित कर देता है। खुद आचरण कर रहा है, अच्छा आचरण कर रहा है और एक मानकषाय आ गई तो सब पर कलंक आ गया। मुनिजनों की प्रवृत्ति बताई गई है कि वे अपने को मुनि अनुभव नहीं करते, किंतु चैतन्यस्वभावमात्र अपने को प्रतीति में रखते हैं। यह तो एक गुजरने की स्थिति है। यह मान की स्थिति नहीं है। किंतु यह स्थिति गुजर रही है। कोई गृहस्थ धर्म से गुजरता है।कोई मुनिधर्म से गुजरता है।धर्म का आचरण करने की ये विशेष पदवियाँ हैं, किंतु जो अपने को ऐसा अनुभव करता है कि मैं मुनि हूँ, त्यागी हूँ, तपस्वी हूँ...तो वह है क्या? मानकषाय की विशेषता वहाँआ गई और पर्यायबुद्धि का महादोष आ गया। प्रतीति में तो एक शुद्ध चित्स्वरूप ही रहना चाहिए। मैं तो यह हूँ, श्रद्धान मुनि का हो, गृहस्थ का हो, एक ही पद्धति का होता है। गृहस्थ भी यह अपने को न मानें कि में गृहस्थ हूँ, अमुक पदाधिकारी हूँ। इस तरह पर्याय में, भेष में अपने स्वरूप की प्रतीति न करें। वह तो पर्याय बुद्धि की बात है। गृहस्थ भी अपने आपको चित्स्वभावमात्र प्रतीति में रखता है। मैं यह चित्स्वभाव हूँ, व्रत आदि जो करना पड़रहा है वह अच्छे स्थान में पहुँचने के लिए यह करना पड़रहा है।

मानकषाय का मूल आधार पर्यायबुद्धि― मानकषाय का संबंध पर्यायबुद्धि से है, उसका मूल पर्यायबुद्धि है, यह जिसके हट गया और ज्योतिर्मय अनादि अनंत निज सहज स्वभाव को जिसने आत्मा स्वीकार किया उसके मानकषाय कहाँरहेगी? जो मान के वशीभूत है यह चारित्र को भी कलंकित करता है। किसीकी बड़ी सेवा की हो, मान लो खूब अच्छा भोजन कराया हो, मिष्ठान्न, व्यंजन अच्छे-अच्छे परोसा हो, खूब खिलाया हो, और खिलाने के बाद वह यह कह दे कि कहो भाई भोजन ठीक रहा ना?...हाँठीक था।...अच्छा था ना? हाँअच्छा था।...ऐसा भोजन तो तुम्हारे बाप-दादा ने भी न किया होगा?...लो उसकी सारी इज्जत चली गई। और उसको यह पड़ गई कि किसी तरह यह तय हो जाय तो अच्छा है। पद-पद में यही बात है, किसी की कोई सेवा करके, किसी का उपकार करके उस पर एहसान धरना, अपना मान बरसाना ये सब कुबुद्धि की बातें हैं। जो संत है, जो सुलझा हुआ पुरुष है उसको तो स्पष्ट है सबका प्रकाश। इसमें उसने अपनी ही रक्षा की, परोपकार किया, लगे रहे शुभोपयोग में। उसने अपनाही काम किया, अपनी ही रक्षा की, किया क्या? तो परोपकारी पुरुष को तो इस तरह रहना चाहिए और जिसका उपकार हो उसे भलाई चाहिए, आत्महित चाहिए तो उसे उसका कृतज्ञ रहना चाहिए। जैसे कृतघ्नता उपकृत पुरुष के लिए महादोष है ऐसे ही एहसान या उसके प्रतिकूल होने पर क्रोधादिक बातें आना यह परोपकारी के लिए भी दोष है। तो जो मान का आलंबन करता है ऐसा मूढ़पुरुष निंदित कर्म करता है और उज्जवल चारित्र को कलंकित कर डालता है।


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