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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 976

From जैनकोष



अपमानकरं कर्म येन दुरान्निषिध्यते।

स उच्चैश्चेतसां मान: पर: स्वपरघातक:।।976।।

अपमानकरकर्मनिषेधक वृत्ति में सत्य मान का दर्शन―जो उदार चित्त है, उच्चभाव वाला पुरुष है वह पुरुष अपमानजनक कार्यों को दूर से ही छोड देता है। यही प्रशस्त मान है कि जहाँ अपमान करने वाले कार्यों का परित्याग हो जाय। अपना अपमान न हो ऐसा कार्य करके चलना चाहिए। अपना अपमान किसमें होता है? जहाँ विषय कषायों से दबे रहते हैं, कायर बन जाते हैं। वास्तविक शूरता ज्ञानबल से प्रकट होती है, जिन भावों में परम प्रसन्नता नहीं उत्पन्न हो सकती, ऐसा जो कुछ विषय कषाय का आक्रमण है, अशुद्ध भावों में जो हमारे चित्त का लगना है, यह है निज भगवान का अपमान। और इन कषायों के वश होकर ऐसी चेष्टा बन जाती है कि जिसमें हो जाता है दूसरों का अपमान। अथवा लोक में मेरा अपमान हो ऐसे कार्य या पाप के कार्य हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह ये पाप के कार्य अपकारक कार्य कहलाते हैं। ऐसे कार्य जहाँ निषिद्ध हो जाते हैं वही उच्च चित्त वाले का वास्तविक मान है। इसके अतिरिक्त अन्य जितने भी मान हैं वे स्व की बरबादी करने वाले हैं और पर का भी विनाश करने वाले हैं। जितनी भी खोटी प्रवृत्तियाँहोती हैं वे सब प्रवृत्तियाँ इंद्रियज्ञान द्वारा होती है। एक तरफ से व्याप्ति लगाना, तो प्रयत्न यह बताया गया है कि इन इंद्रियज विषयों को जीतो। कषायों पर भी विजय होगी, अंत: आत्मदर्शन भी होगा।एतदर्थ करना क्याहै? प्रथम इन इंद्रिय विषयों को दूर करनाहै। और देखिये―जितनी विडंबना की बातें बनती हैं उन विडंबना के कार्यों में प्रबलता और प्राथमिकता हमारे मुख और आँख की है। आँखों से देखते हैं तो कितने ही अनर्थकार्य बन जाते हैं। जब बाहर में किसी को इष्ट अनिष्ट, अनुकूल प्रतिकूल देखा और मुख से कुछ अटपट बोल दिया तो वह झगड़े की जड़बन जाता है। तो ज्यादह करके यह उपदेश होता है कि भाई मौन से रहो। बाहर कुछ मत देखो अंतरंग में देखो तो ऐसा करना कोर्इ कठिन न होगा। कर सकते हैं, इसके लिए हम आपको सहूलियत मिली हुई है कि मुख में ओठों का ढक्कन है। नेत्रों में दोनों पलकों का ढक्कन है। ओठों को बंद कर लिया तो बोलना बंद, आँखों के पलक बंद कर लिए तो देखना बंद, तो मौन से रहो और नेत्र बंद कर लो।बाह्य पुरुष का अवलोकन छोड़कर विश्राम से बैठ जावो, बाहरी ख्याल बंद कर दीजिए, कुछ प्रक्रिया करके कुछ सहज रूप से। उनके जानने से मुझे क्या फायदा? ये बाहरी बातें हैं, इनसे लाभ क्या है? भिन्न चीज हैं, साथ रहने की हैं नहीं, मिट जाने की हैं, और लाभ भी क्या है? मुझे कुछ नहीं सोचनाहै। तो बाहरी ख्याल जहाँबंद होगा तो ज्ञान ठाली तो रहेगा नहीं। ज्ञान एक ऐसा गुण है कि ठाली नहीं रह सकता। यदि कोर्इ गुण परिणमन न करे ठाली रह जाय तो वस्तु मिट जायगी। पर का हम लगाव छोड़ें तो वहाँहोगा क्या? इस ज्ञान द्वारा सच्चे ज्ञान स्वभाव में प्रवेश होने लगेगा। निरंतर चित्त में जो बाह्य पदार्थों को बसाये रहते हैं इसमें हमारी बरबादी हो रही है। तो इस ज्ञानधारा को क्लियर (साफ) बनायें। चित्त की सफाई यही है कि उनमें बाह्य पदार्थ न बसे हों। जैसे दर्पण में दर्पण से ही स्वच्छता आयी तो क्या वह कोर्इ लदने की बात हुई? यदि दर्पण में बाहरी पदार्थों का प्रतिबिंब हो रहा तो वह लदा कहलाया। दर्पण में निजी स्वच्छता का लदान क्या? ऐसे ही ज्ञान में और अपने उपयोग में इस समय इस छद्मस्थ दशा में जो बाह्य पदार्थों को जानता है, सोचता है, ख्याल में लेता है तो वह तो लद गया। तो अपने आपको भाररहित होकर ज्ञानमात्र अनुभवने की हमारी कोशिश होना चाहिए। ऐसे भावों में जो पुरुष आता है उसके मान कषाय का क्या प्रसंग? जिसमें अपना उत्कर्ष हो सो करें और जिसमें अपनाअपमान हो ऐसा कर्म न करें, यह शिक्षा इस छंद में दी गई है।


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