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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 977

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क्व मानो नाम संसारे जंतुब्रजविडंबके।

यत्र प्राणी नृपो भूत्वा विष्ठामध्ये कृमिर्भवेत्।।977।।

विडंबित संसार में मान का क्या अवकाश― संसार के प्राणियों को विडंबनाओं में डालने वाली है यह मानकषाय। वह संसार है विडंबनामय इस संसारमें मान नाम की चीज कहाँ। और उससे लाभ क्या? भला बतलाओ, इस प्राणी का मान हे ही क्या? जो प्राणी राजा होकर विष्टा का कीड़ा बन जाय ऐसी तो हो रही है यह संसार की दशा और यहाँकर रहा हो कोई मान, तो उसके समान मूर्ख किसे कहा जाय? इस विडंबनामय संसार में जहाँअद्भुत विडंबनायें चलती हैं, जैसे अभी तो राजा है और मरकर बन गए विष्टा के बीच कीड़ा तो जरा तुलना करो कि जब राजा थे तब क्या ठाठ था? निवास में ठाठ, हुकूमत, तेल, सुगंध स्तुतियों आदि कितने-कितने ठाठ थे। कहाँतो इन ठाठों के बीच थे और कहाँ वही जीव अब विष्टा के बीच में कीड़ा बना हुआ है, तो जहाँनृप भी कीड़ा बन सकता वहाँसंसार में मान के लिए क्या अवकाश। किस बात पर मान किया जाय? कोई पुरुष बड़ा सेठ हो, धनिक हो और वह अगर किसी कलाकार से कोई कला सीखना चाहता है मानो घड़ी बनाने की कला सीखना चाहता है। और वह सिखाने वाला कोई गरीब छोटा आदमी हो तो बिना उस कलाकार के साथ विनय का बर्ताव किए घड़ी बनाने की कला को वह सेठ सीख सकेगा क्या? अरे उस धनिक सेठ को उस कारीगर के सामने नम्र होना ही पड़ेगा तभी वह उस विद्या को सीख सकेगा। तो हममें गुणग्राहिता आयगी नम्रता के कारण। नीति शास्त्रों में स्पष्ट कहते हैं कि विनय से पात्रता और विनय से ज्ञान और विनय से अपने आपकी भावना बनती है। और, विनयों में मूल्य विनय है अविकार ज्ञानस्वभाव भगवंत आत्मदेव की सुध रखने की। तब जो विडंबित पुरुष हैं, मिथ्यात्वग्रस्त हैं उनको यह बुद्धि नहीं उत्पन्न होती। वह तो पर्याय में आत्मबुद्धि करके मानकषाय भी रखता है। इस छंद में बताया जा रहा कि भाई, यहाँ मानकरने का कोई ठिकाना नहीं। अभी तो मनुष्य है, यही जीव है और मरकर बन गए सब्जी भाजी तो क्या हाल होगा? जैसे पहिले समय में जब सब समान सस्ता बिकता था उस समय में अगर कोई साग भाजी खरीदता था तो एक धेला में ढेरों (बहुत) साग भाजी मिल जाती थी। एक धेला में बहुत सी साग भाजी खरीद लेने के बाद खरीदने वाला कहता था कि इसके साथ अभी रूगन और दो। तो रूगन में एक मुट्ठी भाजी और डाल दी जाती थी। तो रूगन में क्या आया? अगर वह भाजी अनंतकाय हुई तो उसमें अनंत जीव आ गए। तो दूसरी रूगन भाव बिकाया। ऐसा दमरियों के भाव से खरीदा हुआ भी यह जीव बना। यहाँमान किस बात का? आँखों से जो कुछ दिखता है वह सारा मिथ्या जाल है इसमें तत्त्व कुछ नहीं, सार कुछ नहीं। वास्तविकता कुछ भी नहीं, परमार्थता कुछ भी नहीं है। पर्याय है, विनाशीक है, नष्ट होने वाली है, मान का यहाँक्या अवकाश?


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