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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 978

From जैनकोष



जंमभूमिरविद्यानामकीर्तेर्वासमंदिरम्।

पापपंकमहागर्तो निकृति: कीर्तिता बुधै:।।978।।

माया कषाय की अविद्याजन्मभूमिता अकीर्तिवासमंदिरता व पापपंकमहागर्तरूपता― जैसे मानकषाय विडंबना वाली बात है वैसे ही माया कषाय भी बड़ी विडंबना की चीज है। दृष्टियों से देखें तो हर एक कषाय हर एक से बड़ा विकट कठिन जँचा करता है, जैसे कहा कि इससे बड़ा यह, इससे बड़ा यह। दो पुरुष एक से हैं तो उनका परिचय कैसे दिया जायगा? इससे यह बड़ा है, इससे यह बड़ा। तो बड़ा कौन निकला? सभी बड़े बन गए। ये चारों ही कषायें बड़ीविकट है और इस जीव को बरबाद करने वाली हैं। अब माया कषाय का वर्णन चल रहा हैना, तो अब माया की बात देखो―इसमें बड़ी विडंबना है। मायाचारी पुरुष के हृदय में धर्म का सूत जरा भी नहीं जा सकता। जैसे माला के मोती में सूत पिरोया जाने वाला छिद्र टेढ़ा हो गया है तो उसमें सूत नहीं पिरोया जा सकता। उस मोती के दाने को हटाना ही पड़ेगा, वह माला के काम नहीं आ सकता। ऐसे ही जिसका हृदय माया से कुटिल हो गया उस हृदय में धर्म की बात नहीं समा सकती यह माया तो अविद्या की भूमि है। जैसे भूमि में अंकुर उत्पन्न होते हैं ऐसे ही माया में अविद्या, अज्ञान, कुबुद्धियाँ जगती रहती है। मन में और, वचन में और, करे कुछ और। इसे कपटबुद्धि बताया है। कपट की पहिचान यह है कि उसे छुपाने की पड़ती है। चीज छिपावे, बात छिपाये, तो यहाँमायाचार करके कोई किसी को क्या ठग पायगा, अरे वह तो खुद को ही ठगा जा रहा है। तो यह माया अविद्या की जन्मभूमि है और अकीर्तिनिवास मंदिर है। वहाँ कीर्ति क्याहै? अपमान का घर है, और पापरूप कीचड़ का भारी गड्ढा है। जैसे कीचड़ का गड्ढा ऊपर से पत्तियों से गर्दा मिट्टी से ऊपर से ढक जाय और उस पर कोई पैर रख देगा तो वह पैर तो उस कीचड़ में घुस ही जायगा, ठीक ऐसे ही मायाचारी की गई बातें ऊपर से देखने में बड़ी सुहावनी लग रही हैं लेकिन उस मायाचारी के भीतर तो पापरूपी कीचड़ भरा हुआ है। उसके फंदे में जो पड़जायगा वह भी उसके पाप कीचड़ से पापिष्ट, मलिन, गंदा बन जायगा। विद्वान पुरुषों ने इस माया को इतना निकृष्ट बताया है। इस माया कषाय से तो इस जीव का पतन ही है। यहाँमायाचारी किसलिए की जाय? अरे यहाँकी ये दिखने वाली चीजें सब विनाशीक हैं। मायारहित होकर साफ चित्त होकर, बड़ी सरलता से, इस मायाकषाय को दूर करने का प्रयत्न हमें करना चाहिए। यहाँ तो सब दिखने वाली चीजें मायामय हैं, यह सब पुण्य पाप का खेला है, ये यदि आते हों तो आयें और जाते हों तो जायें। इनके पीछे क्या मायाचार करना? इस माया कषाय को छोडने में ही अपनी भलाई है।


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