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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 982

From जैनकोष



मुक्तेरविप्लुतैश्चोक्ता गतिऋज्वी जिनेश्वरै:।

तत्र मायाविनां स्थातुं न स्वप्नेऽप्यस्ति योगयता।।982।।

मुक्ति के सरल मार्ग में भी स्थित हो सकने की मायावियों में योग्यता का अभाव― मुक्ति की प्राप्ति तो सरल है ऐसा जिनेश्वर देव ने कहा है मुक्ति की गति, मुक्ति का मार्ग पाने का रास्ता तो सीधा सादा है। उसको पाने की योग्यता, उसमें स्थिर रहने की योग्यता मायाचारी पुरुषों में स्वप्न में भी नहीं हो सकती। यहाँयह बात बतलाया हे कि मुक्ति पाने की विधि सीधी सादी है और संसार में रुलने की विधि तो टेढ़ी-टाढ़ी है। सीधी तो सरल होती है।टेढ़ी कठिन होती है, संसार में रुलने का मार्ग कठिन है। कैसे कठिन और कैसे सरल मोक्षमार्ग सरल यों है कि वहाँ बात एक है, वह जैसा अपने आप है, जैसा उसका अपने आपका स्वरूप है वैसा रहना, वैसा समझना, वैसी दृष्टि होना, वह स्वभाव है, सरल है, निजी चीज है,अपने आपका स्वरस है इसलिए सरल है और संसार कठिन है, इसके लिए उल्टा भाव बनाना पड़ता, कषायें बनानी पड़ती। सहजसिद्ध अंतस्तत्त्व में जो नहीं है, जो मेरे स्वरूप में नहीं है उस रूप प्रवृत्ति करें तो यह मामला टेढ़ा हो गया, लेकिन खेद है कि टेढ़ा तो बन रहा सरल और सरल बन रहा कठिन। अब देखो इस दृष्टि से तो कोई सिद्ध को भी चेलेंज दे सकता है कि हे सिद्ध भगवान ! तुम क्या कर रहे? सीधा सादा काम कर रहे। उसमें क्या चतुराई? देखो हम कितना कठिन काम कर रहे, कभी मनुष्य बनते, कभी पशु पक्षी कीट पतिंगा आदि बनते, कभी नरक निगोद की योनियों में जाते, देखिये कितने ही नाटक करके हम लोग दिखा देते हैं। अभी तो मनुष्य हैं, कहो यहाँ से मरकर कीड़ा बन जायें कहो अन्य कोई पर्याय वाला बन जायें तो देखिये भगवान !हम संसारी जीव तो अपनी कलायें दिखाने में कितने कुशल हैं, तो टेढ़ामेढ़ा काम तो हम संसारीजनों का है और आपका काम तो बिल्कुल सीधा-सादा है।

परमात्मप्राप्ति का सीधा सरल काम― प्रभु परमात्मा बन गए, जो थे सो ही बन गए। उसमें किसी चीज को लगाने लिपटाने की जरूरत है क्या? परमात्मा होने का क्या विधान है? क्या बन गया परमात्मा, जैसे यहाँकोई दुर्गा, काली वगैरह की मूर्ति बनाता है, बंगाल में इसका रिवाज ज्यादह है, तो बहुत घास-फूस से ढाँचा बनाया जाता है और उसके ऊपर मिट्टी का लेप किया जाता है और ऐसी सुंदर मूर्ति वे बना लेते हैं कि दूर से देखने वाले लोग तो यही समझेंगे कि यह सचमुच ही देवी हैं। तो उस मूर्ति में कितना लाग लपेट किया जाता है? घास, मिट्टी, रंग और जो-जो कुछ भी लगता हो तो यह बतलाओ कि परमात्मा बनने के लिए क्या किया जायगा? क्या कोई लाग लपेट किया जायगा?अरे वहाँ लाग लपेट का तो नाम ही नहीं है, बल्कि वहाँ तो हटाने का नाम है। लगाने का कोई नाम नहीं है। परमात्मा बन गए तो कोई नई चीज बन गई क्या? जो आत्मा था स्वयं सहज स्वरूप, उस स्वभाव में वह ज्यों का त्यों प्रकट हो गया। यही तो परमात्मपद की बात है।तो उसमें कुछ दूसरी चीज को लगाने की बात है क्या? जो था स्वभाव, वह है। वह प्रकट हो गया। और फिर तपश्चरण करने वाले, साधना करने वाले ने क्या किया? किया यह कि जो परभाव हैं, पर चीज है, पर संग है उसको हटाया। विषय कषाय, रागद्वेष आदिक जो भाव हैं ये परभाव हैं, पर प्रसंग से हुए हैं, इनको हटायें। हटाने का काम तो हुआ और लगाने का काम कुछ नहीं हुआ। लो परमात्मपद ऐसा सीधा-सादा सरल है। पर मोक्षमार्ग में मायावी पुरुषों की स्वप्न में भी योग्यता नहीं हो सकती।


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