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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 983

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व्रती नि:शल्य एव स्यात्यशल्यो ब्रतघातक:।

मायाशल्यं मतं साक्षात्सूरिभिर्भूरिभीतिदम्।।983।।

माया की शल्यरूपता― व्रती पुरुष नि:शल्य ही होते हैं। शल्य बताये हैं तीन― माया, मिथ्या और निदान। कषायों में कौनसी कषाय शल्य है? माया कषाय। देखो क्रोध, मान और लोभ कषायें भी जबरदस्त है फिर भी शल्य मायाकषाय को ही कहा है। छल-कपट एक बहुत बुरी शल्य है। और, लोग ऐसी कोशिश भी करते हैं कि मेरी यह शल्य प्रकट न हो जाय, मेरी यह माया प्रकट न हो जाय तो लो शल्य ही तो है। उससे दु:खी भी हो रहे हैं और उस शल्य को प्रकट करने के लिए एक शल्य और लगी भई है। शल्यों में शल्य, इसकी परंपरा चलती रहती है, यह विकट शल्य है। दसलक्षण के दिनों में लोग हरी नहीं खाते और बुंदेलखंड वगैरह में ऐसा कुछ रिवाज सा है कि उन दिनों बच्चे लोग भी हरी नहीं खाते। मान लो किसी बच्चे ने ककड़ी खा ली हो तो जब सब बच्चे बैठे हों और कोई बच्चा सारे बच्चे से झूठ-झूठ ही कह देता है कि देखो तुम्हारे मुख में तो ककड़ी का बीज लगा है। तुमने जरूर कहीं न कहीं हरी (ककड़ी वगैरह) खा ली है, तो जिस बच्चे ने ककड़ी छिपकर खा लिया हो वह बच्चा अपना मुख पोछने लगता है। तो उस बच्चे की वह माया प्रकट हो जाती है। यह तो एक छोटी सी बात कही पर इससे समझो कि मायाचार करने वाले की यह माया कभी न कभी प्रकट हो ही जाती है। यह माया कषाय इतनी बड़ी शल्य बन जाती कि इस जीव के काँटे की तरह चुभती रहती है। तो ऐसी शल्यों से जो सहित है वह व्रती कैसा? एक कथानक है कि एक मुनि महाराज ने 1 माह तक उपवास किया और पारणा के दिन वह किसी दूसरी जगह प्रस्थान कर गए। इस बात की प्रसिद्धि चारों ओरफैल गई। वही किसी पास के गाँव में एक कोई दूसरे मुनि महाराज आये तो लोगों ने यह समझकर कि वही मुनिमहाराज हैं जिन्होंने इस माह का उपवास किया था, उनकी प्रशंसा कर दी कि धन्य है इन मुनि महाराज को, इन्होंने एक माह का उपवास किया। सभी के मुख से उन मुनिराज के प्रति प्रशंसात्मक बातों को सुनकर वे मुनिराज बहुत हर्ष मान रहे थे। उनमें इस तरह की मायाचारी आ गई कि अपनी वास्तविकता को वे लोगों के सामने व्यक्त न कर सके। बस इस मायाचार के फल में वे दुर्गति के पात्र बने। इस माया कषाय को साक्षात् शल्य कहा है क्योंकि यह माया जीव को अत्यंत भय देने वाली है। इस माया कषाय का फल तिर्यंच गति में उत्पन्न होना बताते हैं। तिर्यंच जीव सभी मायाचारी होते हैं। कुछ तिर्यंच जैसे बिल्ली, छिपकली, कुत्ता आदि तो स्पष्ट मायाचारी दिखते हैं। बिल्ली तो चूहा पकड़ते समय ऐसी छिपकर बैठ जाती है जैसी मानो गुप्ति का रूप रखकर बैठी हो। ये गाय, भैंस वगैरह पशु भी मायाचार से भरे हुए होते हैं, पर इनकी मायाचारी मोटे रूप से लोगों को समझ में नहीं आती। इस माया की माया को समझना कोर्इ सरल बात नहीं है।उन जीवों के भी भीतर में किस तरह की बात चलती है, कैसा भाव होता है सो उन्हें वे ही भोगते हैं। तो इस माया को दुर्गति का कारणभूत, दु:खरूप व भय प्रदान करने वाला ऐसा एक खोटा संस्कार समझो।




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