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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 990

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स्वामिगुरुबंधुवृद्धानबलाबालांश्च जीर्णदीनादीन्।

व्यापाद्य विगतशंको लोभार्तो वित्तमादत्ते।।990।।

लोभपीड़ितों का प्राणघातक दु:साहस―लोभ ऐसा अनर्थ कराता है कि इस लोभ कषाय से पीड़ित होकर यह पुरुष अपने स्वामी, अपने गुरु, अपने बंधु, मित्र, स्त्री, पुत्र, माता, पिता आदि को भी मारकर नि:शंक होकर धन को ग्रहण करता है। यह बात सुनकर ऐसा लगता होगा कि यह तो डाकुओं के द्वारा लूटने की बात कही जा रही है। हाँ डाकू भी ऐसा करते हैं कि डाकू तो नहीं हैं पर ऐसा कर डालते हैं। तब ही तो कहते हैं कि देखो अब तो आप बूढ़े हो गए, बूढ़े होने पर आपको दोनों तरफ से खतरा है। यदि धन नहीं हे तो बुरी तरह से मर रहे हैं और यदि धन हे तो गला घोटकर मार दिये जाते हैं। देखो यह कैसा विचित्र संसार है? यहाँ प्राय: सभी लोग धन हड़पने की कोशिश में रहते हैं। लोग तो सोचते हैं कि मेरा पुत्र वृद्धावस्था में मेरा सहाय होगा, वही मेरे लिए सब कुछ है, वही मेरी मदद करेगा, पर उनका यह सोचना मिथ्या है। अरे सहाय की बात तो जाने दो, उल्टे लोभ कषाय के वश होकर वे अपने पिता के भी प्राणघात करने के कारण बन जाते हैं। पहिले यह ही सोचो कि जिन-जिन पर हम राग करते हैं वे हमारे चित्त में क्या मददगार होंगे।

पुत्रपरिग्रह से विडंबना पाने का चित्रण― पंडित आशाधर जी ने एक ऐसा चित्रण किया है कि देखो लोग सबसे अधिक अपने पुत्र पर मोह करते हैं। पर पुत्र द्वारा देखिये तो सही कि कितनी विपत्ति है। जब बच्चा गर्भ में आया तो उसने सबसे पहिले उस पुरुष की पत्नी का (बच्चे की माता का) सौंदर्य नष्ट कर डाला, वह पीली हो गई, दुर्बल हो गई। जब जन्म का समय आया तो उस बच्चे ने पिता का चित्त व्याकुल कर दिया। पिता के मन में उस समय यह चिंता बनी रहती थी कि पता नहीं ठीक-ठीक बच्चा पैदा भी हो जायगा या नहीं। कितनी ही गड़बड़ियाँ हो जाया करती हैं। बहुत सी स्त्रियाँ तो मर तक जाती हैं। लो वहाँ भी उस बच्चे ने दु:खी कर डाला। जब जन्म ले लिया कुछ बड़ा होने लगा तो माँ-बाप को उसकी कितनी चिंता करनी पड़ती। उस बच्चे के आराम के पीछे माँ-बाप अपना आराम खतम कर देते। वह बच्चा कुछ और बड़ा हुआतो अच्छी चीज उस बच्चे को खिलाते, कुछ बची कुची थोड़ी चीज खुद खा लेते। कुछ लोग तो ऐसे भी होते कि कोई साफ सुंदर कपड़ा लाये तो पहिले उस बच्चे के काम में लेते, जब वह कपड़ा कुछ पुराना सा हो जाता तब अपने काम में लेते। देखो पुत्रभक्ति में दीनता। जब वह बच्चा कुछ और बड़ा हुआ तो उसके पढ़ाने लिखाने आदि की चिंताएँ माँ-बाप को करनी पड़ी। बाद में शादी ब्याह भी कर दिया, तो वहाँ वह पुत्र सब जगह अपनी स्त्री का पक्ष लेता, माँ-बाप का अनादर करता, तो वहाँ भी उसी बच्चे ने माँ-बाप को दु:खी कर डाला, बाद में उसको धन चाहिए ना, सो वह उस माँ-बाप के ही धन पर पूरा कब्जा करना सोचता है। माँबाप को तो एक उल्लू सा बनाकर रखना चाहता है। लो एक बाप को अपने बच्चे से क्या लाभ मिला सो तो बताओ? और फिर बच्चा अगर कुपूत निकल गया तो वहाँ भी उस बच्चे ने अपने माता-पिता को दु:खी कर डाला। भला कुपूत होने पर तो चलो एक बार ही दु:खी किया, क्योंकि बाद में लोगों के सामने यह प्रकट कर दिया कि अब यह मेरा बच्चा नहीं रहा, इसे जो कुछ दे लें सो वह जाने, हम उसके जिम्मेदार नहीं हैं। और, अगर पुत्र सपूत हो गया तो वहाँभी इस पिता को उससे क्या मिला? उसके पीछे रात दिन दु:खी ही रहना पडा। रात दिन बड़े-बड़े श्रम करके उस बच्चे को ही सुखी देखने की वांछा करता है। इस लोभ कषाय के वश हुआ यह प्राणी जिंदगीभर इन परपदार्थों के पीछे दौड़ लगाता रहता है, जिससे वह पाये हुए धन का उपयोग अच्छे कामों के लिए भी नहीं कर सकता। बस जो कुछ है सो उस बच्चे के लिए, तो भलाबतलाओ जिससे इतना तीव्र अनुराग किया जाता वह किस काम आता? मगर लोभकषाय के वश होकर यह प्राणी कुछ नहीं सोचता। आत्महित से दूर रहता है और निष्फल व्यर्थ की चिंतायें करता है।


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