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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 991

From जैनकोष



ये केचित्सिद्धांते दोषा:श्वभ्रस्य साधका: प्रोक्ता:।

प्रभवंति निर्विचारं ते लोभादेव जंतूनाम्।।991।।

नरकसाधक सर्व दोषों की लोभप्रभवता― सिद्धांत शास्त्र में जितने भी दोष नरक में साधक बताये गये हैं याने जिन दोषों के फल में नरक में घूमना होता है वे सारे दोष प्राणियों के लोभ से ही हुआ करते हैं। लोभ एक ऐसी चित्त रंगीली तीव्र कषाय है कि इस लोभ में सारे दोषों को गर्भित कर सकते हैं। पर्याय को आत्मा समझना यह भी लोभ है। तो देखो लोभ की तीव्रता ही मिथ्यात्व जैसा रंग ला रही है, और किसी भी पर वस्तु में आत्मीयता का भाव होना यह मूल से विद्या का विनाश कर देने वाला भाव है। जहाँ पर को माना कि यह मैं और मेरा, वहाँवास्तविक में और मेरा स्वरूप मेरे उपयोग से गायब हो जाता है। लोभ कषाय से वे सारे दोष उत्पन्न होते हैं जिन दोषों के कारण जीव नरक में जाता है। काम विकार लोभ कषाय की ही तो पर्याय है। जिस काम को विकार के गिनने में अलग से नाम लिया जाता है काम, क्रोध, मान, माया, लोभ इस तरह लोग काम को अलग बोलते हैं। अलग बोलने की क्या जरूरत थी? कषायें तो चार हैं क्रोध, मान, माया, लोभ। काम को अलग क्यों गिना? यद्यपि काम, क्रोध में शामिल है, फिर भी काम इतना विकट कुभाव है कि उसको अलग गिनने का प्रयोजन आचार्य को विदित हुआ है। जितने दोष हैं ऐब, व्यभिचार अथवा उद्दंडता, अन्याय, नरसंहार आदि, वे सब लोभ से ही उत्पन्न होते हैं। राज्य का लोभ, प्रतिष्ठा का लोभ, धन संतान का लोभ, ये सब दोषोत्पत्ति के कारण हैं। कहते ही हैं―‘‘लोभ पाप का बखाना।’’ पाप का बाप क्या? याने पाप को उत्पन्न करने वाला भाव क्या? वह है लोभ। जितने भी अयोग्य कार्य हैं वे सब इस लोभ से स्वयमेव बन जाते हैं। कषायों के जो नाम हैं उनको अगर उल्टा पढ़ो तो उसमें रक्षा की बात जाहिर होती है। लोभ करना बुरा है और उससे उल्टा पढ़ो तो लोभ का उल्टा होगा भलो। यह भलो कामक्रियाकारी है। कहाँ तो लोभ और कहाँभलो, बिल्कुल उल्टा है, माया करना बुरा है। माया शब्द का उल्टा करो तो हुआ या मा। जो या याने यह है सो सत्य नहीं है। मान करना बुरा है। मान का उल्टा है नमा याने जो नम जाय, मान से वह एक प्रतिपक्षी पर्याय है। रोष का उल्टा है षरो, याने सही हित सारना धैर्य धारण करना, विह्वल नहीं होना।

पाप के बाप की गवेषणा― इन चारों कषायों में लोभ कषाय को पाप का बाप कहा है। एक कथानक प्रसिद्ध हे कि एक विद्यार्थी बनारस से कई परीक्षायें पास करके घर आया, अपनी स्त्री से बड़ी-बड़ी शान की बातें करता रहा। एक दिन स्त्री पूछ बैठी कि बताओ पाप का बाप क्या है? तो उस विद्यार्थी ने अनेक ग्रंथों को उलट-पलट कर देखा, पर कहीं यह लिखा हुआ न पाया कि पाप का बाप क्या है? तो उसने सोचा कि मेरे गुरुजी ने सब कुछ पढ़ा दिया, पर इतनी बात छिपा लिया, नहीं पढ़ाया कि पाप का बाप क्या है? इसीलिए मुझे अपनी स्त्री के सामने अपमानित होना पडा। वह शीघ्र ही बनारस की ओरचल पडा, इस बात को पढ़ने के लिए कि पाप का बाप क्या है। पैदल ही वह जा रहा था एक दिन वह रास्ते में शाम हो जाने से किसी नगर में एक मकान के चबूतरे पर सो गया। जब सबेरा हुआ, वह सो ही रहा था कि इतने में उस मकान की मालकिन स्त्री आयी। उसने जगाया और पूछा कि भाई आप कौन हैं और कहाँ से आये हैं? तो उसने बताया कि हम पंडित जी हैं, हमें गुरुजी ने सब कुछ तो पढ़ा दिया, पर एक बात नहीं पढ़ाया कि पाप का बाप क्या है, सो इस बात को पढ़ने के लिए हम अपने गुरु के पास बनारस जा रहे हैं। तो उस स्त्री ने कहा कि आप एक दिन ठहरें, यहाँआराम करें, भोजन पान करें फिर चले जाना। तो वह पंडित पूछता हे कि आप कौन है? तो वह स्त्री कहती है कि में तो वेश्या हूँ। तो पंडित बोला― अरे रे रे बड़ा गजब हो गया। मुझे तो इस चबूतरे पर लेटने से ही पाप लग गया।तो वह स्त्री बोली― जैसे अन्य चबूतरे हैं वैसा ही यह भी है, इसमें लेटने से पाप की बात क्या? और अगर पाप लग गया हो तो लो ये 20 मोहरें, उनसे कुछ यज्ञादिक कार्य करके प्रायश्चित्त कर लेना। लो, 20 मोहरों के लालच में आकर समझ लिया कि यहाँलेटने में कोई पाप नहीं। फिर स्त्री ने कहा कि आप यही भोजन कीजिए, देखिये जैसा सबका घर वैसा ही मेरा भी घर है। आप यह सब सामान लीजिए और अपने हाथ से भोजन बनाकर भोजन कीजिए और यदि उसमें कोई पाप लगे तो लीजिए ये 20 मोहरें, इनसे यज्ञादिक विधान करके प्रायश्चित्त कर लेना। अब क्या था? 20 मोहरों के लोभ में आकर उसके घर में भोजन बनाना भी स्वीकार कर लिया। जब भोजन बनाने लगा तो स्त्री ने कहा देखो तुम्हारे हाथों से हमारे हाथ ज्यादह साफ स्वच्छ हैं, आप बेकार कष्ट करते हैं, बेकार अपने हाथ जलाते हैं, आज तो आप हमारे हाथ का बना हुआ भोजन ग्रहण कीजिए। और उसमें अगर कोई पाप लगता हो तोये लीजिए 20 मोहरें और इनको धर्म में लगाकर प्रायश्चित्त कर लेना। बस 20 मोहरों के लोभ में आकर उस स्त्री (वेश्या) के हाथ का बना हुआ भोजन करना स्वीकार कर लिया। जब पंडितजी भोजन करने बैठे तो वह वेश्या बोली― पंडित जी तो हमारा जीवन सफल हो गया। हमने जीवन में बड़े पाप किए, पर आपकी कृपादृष्टि हम पर इतनी हुई कि हमारे जीवन को सफल बना दिया। अब आप एक कृपा और कर दें कि हमारे हाथ से एक कौर अपने मुख में ले लीजिए तो हमारा उद्धार हो जायगा। यदि इसमें पाप लगे तो ये लीजिए 20 मोहरें, इनसे धर्म कार्य करके प्रायश्चित्त ले लेना, बस क्या था। 20 मोहरों के लोभ में आकर उस वेश्या के हाथ से भोजन ले लेना भी स्वीकार कर लिया। पर वेश्या ने मुख में कौर तो डाला नहीं और पंडित जी के गालों पर दोनों ओर दो-दो तमाचे जड़ दिए। और कहा― अरे पाप का बाप है यह लोभ। तो जगत में जितने दोष हैं, नरक के साधन हैं वे सब लोभ से प्राणियों के उत्पन्न हुआ करते हैं।


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