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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 18

From जैनकोष



ठाण जुदाण अधम्मो पुग्गल जीवाण ठाणसहयारी ।

छाया जह पहियाणं गच्छंता णेव सो धरई ।।18।।

अन्वय―ठाणजुदाण पुग्गल जीवाण ठाणसहयारी अधम्मो । जह पहियाणं छाया । सो गच्छंता णेव धरई ।

अर्थ―ठहरते हुये पुद्गल और जीवों के ठहरने में सहकारी कारण अधर्मद्रव्य है । जैसे मुसाफिरों के ठहरने में छाया सहकारी कारण है । वह अधर्मद्रव्य गमन करते हुये जीव पुद्गलों को नहीं ठहराता है ।

प्रश्न 1-―ठहरने से यहाँ क्या तात्पर्य है?

उत्तर―गमन करके ठहराना यहाँ ठहरने का तात्पर्य हैं ।

प्रश्न 2-―इस प्रकार का ठहरना कितने द्रव्यों में होता?

उत्तर―यह स्थिति केवल जीव और पुद᳭गल इन दो द्रव्यों में होती क्योंकि गमनक्रिया भी इन ही दो द्रव्यों में पाई जाती है ।

प्रश्न 3―अधर्मद्रव्य अमूर्त है वह स्थिति में कैसे कारण बनता?

उत्तर―जैसे सिद्धभगवान अमूर्त होकर भी “सिद्ध हूँ, शुद्ध हूँ, अनंतज्ञानादिसंपंन हूँ” इत्यादि सिद्धभक्ति में ठहरते हुए भव्य जीवों के स्वस्थिति में बहिरंग सहकारी कारण होते हैं वैसे अमूर्त होकर भी अधर्मद्रव्य ठहरते हुए जीव, पुद्गलों के ठहरने में सहकारी कारण होता है ।

प्रश्न 4―अधर्मद्रव्य अप्रेरक है, वह कैसे जाते हुये जीव पुद्गलों को ठहरा सकता?

उत्तर―जैसे जाते हुये मुसाफिर वटछाया को निमित्त पाकर अपने ही भाव से और कारण से ठहर जाते हैं वैसे जाते हुये जीव और पुद्गल अधर्मद्रव्य को निमित्त पाकर अपने ही उपादानकारण से ठहर जाते हैं । छाया मुसाफिरों को जबरदस्ती ठहराता नहीं है । अधर्मद्रव्य भी किसी को जबरदस्ती ठहराता नहीं है ।

प्रश्न 5―अधर्मद्रव्य की अन्य विशेषतायें क्या हैं?

उत्तर―अधर्मद्रव्य का असाधारण लक्षण स्थितिहेतुत्व है । शेष सभी विशेषतायें धर्मद्रव्य की तरह हैं अर्थात् अधर्मद्रव्य एक है, लोकव्यापी है, अनंतगुणात्मक है, निष्क्रिय है, परिणमनशील है, नित्य है आदि ।

प्रश्न 6―अधर्मद्रव्य में और अधर्म में क्या अंतर हैं?

उत्तर―अधर्मद्रव्य एक स्वतंत्र द्रव्य है । जो जीव व पुद्गल के ठहरने में सहकारी उदासीन कारण है और अधर्म आत्मस्वभाव से अन्य भावों को आत्मा समझने व अनात्मा में उपयोग लगाने को कहते हैं ।

प्रश्न 7―क्या अधर्मास्तिकाय बिना जीव, पुद्गल स्थित हो सकते हैं?

उत्तर―नहीं, जैसे धर्मास्तिकाय बिना जीव, पुद्गल गति नहीं कर सकते वैसे अधर्मास्तिकाय बिना जीव, पुद᳭गल स्थित नहीं हो सकते ।

प्रश्न 8―यदि ऐसा है तो धर्म, अधर्मद्रव्य प्रेरक व मुख्य कारण माने जाने चाहिये?

उत्तर―धर्म, अधर्मद्रव्य गति, स्थिति के प्रेरक नहीं है और न ये मुख्य कारण हैं, क्योंकि ये यदि प्रेरक या मुख्य कारण हो जाये तो इन दोनों का कार्य मात्सर्यपूर्वक होना चाहिये तथा जो द्रव्य गति करे वह गति करे, जो ठहरे वह ठहरे ही आदि अनेक दोष आते हैं ।

प्रश्न 9―उदासीन कारण मानने पर यह अव्यवस्था क्यों नहीं होती?

उत्तर―जीव, पुद्गल निश्चय से अपने परिणमन से गति, स्थिति करते हैं, हाँ यह बात अवश्य है कि वे धर्म अधर्म द्रव्य को निमित्त पाकर गति स्थिति करते हैं, अत: दोष नहीं है ।

प्रश्न 10―धर्म, अधर्मद्रव्य क्या उपादेय तत्त्व हैं या हेय तत्त्व?

उत्तर―शुद्धात्मतत्त्व से भिन्न होने से ये भी हेय तत्त्व हैं ।

इस प्रकार अधर्मद्रव्य का वर्णन करके आकाशद्रव्य का वर्णन करते हैं―


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