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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 19

From जैनकोष



अवगासदाणजोग्गं जीवादीणं वियाण आयासं ।

जेण्हं लोगागासं अल्लोगागासंमिदि दुबिहं ।।19।।

अन्वय―जीवादीणं अवगासदाणजोग्गं आयासं वियाण, लोगागासं अलोगागासं दुविहं इदि जेण्हं ।

अर्थ-―जीवादि सर्वद्रव्यों को अवकाश देने में जो समर्थ है उसे आकाश जानो । वह आकाश लोकाकाश और अलोकाकाश इस तरह 2 प्रकार का है । वह सब जिनेंद्रदेव का सिद्धांत है ।

प्रश्न 1-―आकाश द्रव्य कितने हैं?

उत्तर―आकाश एक अखंड द्रव्य है ।

प्रश्न 2―अखंड आकाश के लोकाकाश व अलोकाकाश ये भेद कैसे हो सकते हैं?

उत्तर―ये भेद उपचार से हैं―जितने आकाश देश में सर्वद्रव्य रहते हैं उतने को लोकाकाश कहते हैं और उससे बाहर के आकाश को अलोकाकाश कहते हैं । आकाश में स्वयं भेद नहीं है ।

प्रश्न 3―आकाश में कितनें गुण हैं?

उत्तर-―आकाश में असाधारण गुण तो अवगाहनाहेतुत्व है, इसके अतिरिक्त अस्तित्वादि अनंतगुण भी हैं । यह द्रव्य भी निष्क्रिय और सर्वव्यापी है । इसका कहीं भी अंत नहीं हैं ।

प्रश्न 4―यदि सब द्रव्य आकाश में रहते हैं तो सब आकाश मात्र रह जायेगा?

उत्तर―निश्चय से तो प्रत्येक द्रव्य अपने खुद के प्रदेशों में रहता है । बाह्यसंबंध दृष्टि से ये आकाशक्षेत्र में ही पाये जाते हैं अत: व्यवहार से सब द्रव्य आकाश में रहते हैं ऐसा कहा जाता है ।

प्रश्न 5―इस व्यवहार का प्रयोजन क्या है?

उत्तर―इस व्यवहार का प्रयोजन हेय, उपादेय वस्तुओं के परिचय का व्यवहार चलाना है ।

प्रश्न 6―आकाश के वर्णन से यह प्रयोजन कैसे सिद्ध होता है?

उत्तर―यदि आकाश में वस्तुओं के रहने का वर्णन न चले तो मोक्ष कहां, स्वर्ग कहां, नरक कहां आदि सुगमतया कैसे समझाये जा सकते? जैसे निश्चयनय से सहजशुद्ध चैतन्यरस से परिपूर्ण निजप्रदेशों में ही सिद्धप्रभु विराजते हैं, फिर भी व्यवहारनय से सिद्धभगवान मोक्ष शिला में स्थित हैं, ऐसा समझाना कैसे बनेगा?

प्रश्न 7-―मोक्षस्थान कहां है?

उत्तर―निश्चयनय से तो जिन प्रदेशों में आत्मा कर्मरहित हुआ वही मोक्षस्थान है, व्यवहारनय से कर्मरहित आत्माओं के ऊर्ध्वगमन स्वभाव के कारण लोकाग्र में पहुंच जाने से लोकाग्रभाग मोक्षस्थान बताया गया ।

प्रश्न 8-―मनुष्य कहां रहता है?

उत्तर―मनुष्यपर्याय विजातीयपर्याय होने से अनंत पुद्गलों के प्रदेशों का व आत्मप्रदेशों का बद्धस्पृष्ट समुदाय है । सो वहाँ निश्चय से प्रत्येक परमाणु अपने-अपने प्रदेश में है और आत्मा अपने प्रदेश में है । व्यवहारनय से मनुष्य ढाई द्वीप के भीतर जो जहाँ है वहाँ रहता है ।

प्रश्न 9―यह कौनसा व्यवहार है?

उत्तर―यह उपचरित असद्भूतव्यवहार है । पर्यायरूप से वर्णन है, अत: व्यवहार है, सहजस्वभाव में ऐसा सद्भूत नहीं है, अत: असद्भूत है । दूसरे के नाम से उपचार किया है, अत: उपचरित है ।

प्रश्न 10―अकाश जीव, पुद्गलों की गति, स्थिति का भी कारण है, फिर केवल अवगाहनहेतुत्व ही आकाश में क्यों कहा?

उत्तर―आकाश गति स्थिति का कारण नहीं है, क्योंकि यदि आकाश गति स्थिति का कारण हो जाता तो लोक अलोक का विभाजन नहीं रहता । जो गति करता वह असीम क्षेत्र तक गति ही करता रहता व लोकाकाश के बाहर कहीं स्थित भी हो जाता । इस प्रकार आकाशद्रव्य का सामान्य वर्णन करके उसका विशेष वर्णन करते हैं―


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