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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 20

From जैनकोष



धम्मा धम्मा कालो पुग्गल जीवा य संति जावदिये ।

आयासे सो लोगो तत्तो परदो अलोगुत्तो ।।20।।

अन्वय―जावदिये आयासे धम्मा धम्मा कालो पुग्गल जीवा य संति सो लोगो त्तोत परदो अलोगुत्तो ।

अर्थ-―जितने आकाश में धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, कालद्रव्य, पुद्गलद्रव्य और जीवद्रव्य हैं वह तो लोकाकाश है और उससे परे अलोकाकाश कहा है ।

प्रश्न 1―लोकाकाश का क्या आकार है?

उत्तर―सात पुरुष एक के पीछे एक इस प्रकार खड़े हो और कमर पर हाथ रखे व पैर पसारे खड़े हों । जो आकार उस समय वहाँ है वैसा आकार लोकाकाश का है ।

प्रश्न 2―लोकाकाश का परिमाण कितना है?

उत्तर―सर्वलोकाकाश का परिमाण 343 घनराजूप्रमाण है । जैसे कि उदाहरण में उस सप्तपुरुषाकार का परिमाण करीब 343 घन विलस्त है ।

प्रश्न 3―लोकाकाश के कितने भाग हैं?

उत्तर―लोकाकाश के 3 भाग हैं―(1) अधोलोक, (2) मध्यलोक, (3) ऊर्ध्वलोक ।

प्रश्न 4―अधोलोक का परिमाण क्या है?

उत्तर―अधोलोक का परिमाण 196 घनराजू है । जैसे दृष्टांत में कमर से नीचे तक सब 196 घन विलस्त है ।

प्रश्न 5―मध्यलोक का परिमाण कितना है?

उत्तर―मध्यलोक का परिमाण 1 वर्गराजू मात्र है ।

प्रश्न 6―ऊर्ध्वलोक का परिमाण क्या है?

उत्तर-―ऊर्ध्वलोक का परिमाण 147 घनराजू है । जैसे दृष्टांत में कमर के ऊपर गर्दन तक 147 घन विलस्त है ।

प्रश्न 7―लोकाकाश में समस्त प्रदेश कितने हैं?

उत्तर―लोकाकाश में समस्त प्रदेश असंख्यात हैं ।

प्रश्न 8―लोकाकाश के असंख्यात प्रदेशों में अनंतानंत जीव, अनंतानंत पुद्गल, एक धर्मद्रव्य, एक अधर्मद्रव्य, असंख्यात कालद्रव्य इस प्रकार अनंतानंत द्रव्य कैसे समा जाते हैं?

उत्तर―जैसे एक दीप के प्रकाश में अनेक दीप प्रकाश समा जाते हैं वैसे आकाश में व अन्य द्रव्यों में भी अनेक द्रव्य समा जाने की योग्यता है, अत: अनेक द्रव्यों का लोकाकाश में अवगाह हो जाता है ।

प्रश्न 9―यदि आकाश में ऐसी अवगाहनशक्ति न मानी जावे तो क्या हानि है?

उत्तर―यदि आकाश में अवगाहनशक्ति न हो तो लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर एक-एक परमाणु ही ठहरेंगे अन्य परमाणु होंगे ही नहीं, ऐसी स्थिति में जीव के विभाव परिणाम नहीं हो सकते, क्योंकि एक या संख्यात परमाणु विभाव में निमित्त नहीं होते ।

प्रश्न 10―अलोकाकाश में तो कालद्रव्य है नहीं, फिर अलोकाकाश का परिणमन कैसे हो जाता है?

उत्तर―लोकाकाश में स्थित कालद्रव्य के निमित्त से समस्त आकाश का परिणमन हो जाता है ।

प्रश्न 11―लोकाकाश में रहने वाले कालद्रव्य का निमित्त पाकर लोकाकाश का ही परिणमन होना चाहिये?

उत्तर―आकाश एक अखंड द्रव्य है, इसलिये आकाश में जो एक परिणमन होता वह पूरे आकाश में होता है । जैसे एक कीली पर चाक घूमता है तो निमित्तभूत कीली तो चाक के बीच के भाग के क्षेत्र में ही है सो कीली पर जितना चाकभाग है केवल उतना ही भाग नहीं घूमता, किंतु पूरा चाक घूमता है ।

प्रश्न 12―इस आकाशद्रव्य के परिज्ञान से हमें क्या शिक्षा लेनी चाहिये?

उत्तर―यद्यपि व्यवहारदृष्टि से देखने पर यह सत्य है कि मेरा (आत्मा का) वास आकाशप्रदेशों में है तथापि निश्चयदृष्टि से मेरा वास आत्मप्रदेशों में ही है । इसके 2 हेतु हैं―(1) अनादि से ही तो आत्मा है और अनादि से ही आकाश है । ऐसा भी कभी नहीं हुआ कि आत्मा कहीं अन्यत्र था और फिर आकाश में रखा गया । (2) आत्मा स्वयं सत् है, अपने गुण पर्यायरूप है, आकाश भी स्वयं सत् है वह अपने गुणपर्यायरूप है, इस कारण कोई भी द्रव्य किसी भी द्रव्य का आधार नही है । अत: मैं आकाशद्रव्य से दृष्टि हटाकर केवल निज आत्मतत्त्व को देखूं यह शिक्षा हमें ग्रहण करनी चाहिये ।

इस प्रकार आकाशद्रव्य का वर्णन करके अब कालद्रव्य का प्ररूपण करते हैं―


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