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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 32

From जैनकोष



वज्झदि कम्मं जेण हु चेदणभावेण भावबंधो सो ।

कम्मादपतेसाणं अण्णोण्णपवेसणं इदरो ।।32।।

अन्वय―जेण चेदणभावेण कम्मं वज्झदि सो भावबंधो हु कम्मादपते साणं अण्णोण्णपवेसणं इदरो ।

अर्थ ―जिस चेतनभाव के निमित्त से कर्म बंधता है वह तो भावबंध है और कर्म तथा आत्मा के प्रदेशों का परस्पर प्रवेशरूप होना अर्थात् एकाकार होना सो द्रव्यबंध है ।

प्रश्न 1―कौन से चेतनभाव भावबंध कहलाते हैं?

उत्तर―मिथ्यात्व, राग और द्वेष भावबंध कहलाते हैं ।

प्रश्न 2―मिथ्यात्व आदि भाव भावबंध क्यों हैं?

उत्तर-―मिथ्यात्वादि भाव अखंड निज चैतन्यस्वभाव के अनुभव से विपरीत हैं, विरुद्ध भाव हैं, अत: भावबंध हैं ।

प्रश्न 3―बंध में तो दो का संबंध है, यहाँ दो क्या तत्त्व हैं जिनका बंध हो?

उत्तर―यहां उपयोग और रागादि का संबंध हुआ है अर्थात् चैतन्यगुण के विकास में चारित्रगुण का विकृत विकास अभिगृहीत हुआ? है, अत: अर्थात् उपयोगभूमि में रागादि के संबंध होने से भावबंध कहलाता है ।

प्रश्न 4―यह चेतनभाव शुद्ध है अथवा अशुद्ध?

उत्तर―यह चेतनभाव अशुद्ध है, क्योंकि कर्मरूप उपाधि को निमित्त पाकर हुआ है ।

प्रश्न 5―भावबंध की तरह क्या द्रव्यबंध भी एक ही पदार्थ में होता है?

उत्तर―द्रव्यबंध एक जाति के पदार्थों में होता है अर्थात् पुद्गलकर्म का पुद्गलकर्म के साथ बंध होना द्रव्यबंध है ।

प्रश्न 6―यहाँ आत्मा और कर्म के परस्पर बंध को द्रव्यबंध कैसे कहा?

उत्तर―यह दो जाति के द्रव्यों का बंध है, इसे भी द्रव्यबंध कहते हैं । इस द्रव्यबंध का दूसरा नाम उभयबंध है ।

प्रश्न 7―क्या केवल एक पुद्गलकर्म में द्रव्यबंध नहीं माना जा सकता?

उत्तर―प्रकृति, प्रदेश, स्थिति व अनुभाग के बंध की अपेक्षा से एक पुद᳭गलकर्म में द्रव्यबंध माना जा सकता है । किंतु यह बंध केवल एक परमाणु या संख्यात असंख्यात परमाणुओं के स्कंध में भी नहीं बनता । बनता तो अनंत परमाणुओं के स्कंध में, फिर भी सूक्ष्मदृष्टि से उसी स्कंध के एक-एक परमाणु में भी वह सब है ।

प्रश्न 8―आत्मा तो अमूर्त है, उसके साथ मूर्तकर्म का बंध कैसे हो जाता है?

उत्तर―संसारी आत्मा कर्मबंधन से बद्ध होने के कारण कर्मसंबंध से कथंचित् मूर्त माना गया है, ऐसे आत्मा के साथ कर्म का बंध हो जाना युक्त ही है ।

प्रश्न 9―आत्मा के साथ कर्म का एकाकार हो जाने का क्या अर्थ है?

उत्तर―आत्मा का व कर्मस्कंधों का एकक्षेत्रावगाह हो जाना, उनमें निमित्तनैमित्तिक संबंध हो जाना एकाकारता का अर्थ है । ऐसा होने पर भी निश्चय प्रत्येक द्रव्य अपने आप में ही है, अत: स्वतंत्र है ।

प्रश्न 10―भावबंध और भावास्रव में क्या अंतर है?

उत्तर―भावबंध में कर्मबंध की निमित्तता है और भावास्रव में कर्मास्रव की निमित्तता है । भावबंध व्याप्य है और भावास्रव व्यापक है ।

अब द्रव्यबंध के भेद व भेदों का कारण दिखाते हैं―


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