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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 33

From जैनकोष



पयडिट्ठिदिअणुभागप्पदे स भेदाहु चदुविदोबंधो ।

जोगा पयडिपदेसा ठिदि अणुभागा कसायदो होंति ।।33।।

अन्वय―बंधो पयडिट्ठिदिअणुभागप्पदे स भेदाहु चदुविदो । पयडिपदेसा जोगा ठिदि अणुभागा कसायदो होंति ।

अर्थ―बंध प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश के भेद से 4 प्रकार का होता है । उनमें से प्रकृतिबंध और प्रदेशबंध तो योग से होते हैं तथा अनुभागबंध और स्थितिबंध कषाय से होते हैं ।

प्रश्न 1―प्रकृतिबंध किसे कहते है?

उत्तर―जीव को विभाव पर्याय में ले जाने के लिये कर्मस्कंधों में पृथक्-पृथक् प्रकृतियों का (आदतों या स्वभावों का) पड़ जाना प्रकृतिबंध है ।

प्रश्न 2―ज्ञानावरणकर्म की क्या प्रकृति है?

उत्तर―ज्ञानावरण की प्रकृति आत्मा के ज्ञानगुण को आच्छादित करने की है ।

प्रश्न 3―दर्शनावरणकर्म की क्या प्रकृति है?

उत्तर-―दर्शनावरणकर्म की प्रकृति आत्मा के दर्शनगुण को आच्छादित करने की है ।

प्रश्न 4―मोहनीयकर्म की क्या प्रकृति ह?

उत्तर―जीव को हेय और उपादेय के विवेक से भी रहित कर देने की प्रकृति मोहनीयकर्म की है ।

प्रश्न 5-―अंतरायकर्म की क्या प्रकृति है?

उत्तर-―दान, लाभ आदि में विघ्न करने की प्रकृति अंतरायकर्म की है ।

प्रश्न 6―वेदनीयकर्म की क्या प्रकृति है?

उत्तर―वेदनीयकर्म की प्रकृति अल्पसुख और बहुत दुःख उत्पन्न करने की है ।

प्रश्न 7―आयुकर्म की क्या प्रकृति है?

उत्तर―प्रतिनियत शरीर में ही जीव को रोके रहना आयुकर्म की प्रकृति है ।

प्रश्न 8―नामकर्म की क्या प्रकृति है?

उत्तर―नानारूपमय शरीर की रचना में निमित्त होना नामकर्म की प्रकृति है ।

प्रश्न 9―गोत्रकर्म की क्या प्रकृति है?

उत्तर―उच्च अथवा नीच गोत्र करना गोत्रकर्म की प्रकृति है ।

प्रश्न 10―एक समय में क्या एक प्रकृतिबंध होता है या सर्व प्रकृतिबंध होता है?

उत्तर―यदि आयु प्रकृतिबंध अपकर्षकाल नहीं है तो एक समय में आयुप्रकृति को छोड़कर 7 कर्मप्रकृतियों का बंध होता है । यदि अपकर्षकाल है तो आठों कर्मप्रकृतियों का बंध हो सकता है । सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान में आयुप्रकृति और मोहनीयप्रकृति के बिना शेष 6 कर्मप्रकृतियों का (कर्मों का) बंधन होता है । उपशांतमोह, क्षीणमोह व सयोगकेवली के केवल एक देदनीयप्रकृति का आस्रव होता है । यह एक प्रकृतिबंध दूसरे समय भी नहीं ठहरता है, इसलिये इसे आस्रव (ईर्यापथ) आस्रव कहते हैं ।

प्रश्न 11―अपकर्षकाल का तात्पर्य क्या है?

उत्तर―आयुकर्म के बंधने के 8 प्रकार होते हैं―कर्मभूमि मनुष्य व तिर्यंचों के आयु बंध का पहिली बार उनकी वर्तमान आयु के 2 बटा 3 भाग बीतने पर होता है । यदि तब आयु न बंधे तब शेष आयु के दो विभाग बीतने पर होता है । इस प्रकार शेष के दो विभागों में 6 बार और कहना चहिये ।

प्रश्न 12―यदि उन आठ बारों में आयु न बंध सके तब कब आयु बंधेगी?

उत्तर―यदि उन आठ अपकर्षों में अश्रु न बंधे तब अंतिम अंतर्मुहूर्त में अवश्य बंध जावेगी । जिसे मोक्ष जाना है उसके उस चरमभव में कोई आयु नहीं बंधती ।

प्रश्न 13―भोगभूमिया मनुष्य तिर्यंचों के आठ अपकर्ष कब होते हैं?

उत्तर―भोगभूमिया मनुष्य तिर्यंच के अंतिम 6 माह शेष रहने पर उसके आठ बार दो विभाग करने चाहियें । जैसे पहिली बार दो माह आयु शेष रहने पर होता है ।

प्रश्न 14―अस्थिर भोगभूमिया के नर व तिर्यंचों के अपकर्ष कैसे लेते हैं?

उत्तर―भरत और ऐरावत क्षेत्रों में भोगभूमि पहले, दूसरे, तीसरे काल में होती हैं । ये अस्थिर भोगभूमि कहलाती हैं । अस्थिर भोगभूमि मनुष्य और तिर्यंचों के अपकर्ष उनकी 9 माह आयु शेष रहने पर 8 बार दो विभागों में लगानी चाहिये । जैसे कि इनका पहिली बार 3 माह आयु शेष रहने पर होता है ।

प्रश्न 15―देव व नारकियों के आयुबंध के अपकर्ष कब होते हैं?

उत्तर―देव व नारकियों के आयुबंध के अपकर्ष उनकी आयु 6 माह शेष रहने पर 8 बार दो विभागों में लगा लेना चाहिये ।

प्रश्न 16―एकेंद्रियादिक असंज्ञी जीवों का आयुबंध का अपकर्ष कब होता है?

उत्तर―एकेंद्रियादिक असंज्ञी जीवों का अपकर्ष कर्मभूमिया की तरह समस्त आयु के 8 बार दो विभागों में लगा लेना चाहिये । जैसे किसी की आयु 81 वर्ष की है तो 54 वर्ष होने पर आयुबंध हो सकता, तब आयुबंध न हो तो फिर 72 वर्ष की आयु में आयुबंध हो सकता । तब न बंधे तो फिर 78 वर्ष की आयु में आयुबंध हो सकता, तब 80 वर्ष की उम्र में आयुबंध हो सकता । इस प्रकार पूरे 8 बार कर लेना चाहिये ।

प्रश्न 17―क्या एक कर्म में आवांतर प्रकृतियाँ भी हो सकती हैं?

उत्तर―कर्मों के जो 148 भेद बताये गये हैं । उनरूप प्रकृतियाँ तो होती ही हैं यह तो स्पष्ट है, किंतु 148 प्रकृतियों में किसी एक प्रकृति में भी आवांतर असंख्यात प्रकृतियां होती हैं । जैसे एक मतिज्ञानावरण को लें, उसमें घटमतिज्ञानावरण, पटमतिज्ञानावरण आदि अनेक प्रकृतियां हो जाती हैं ।

प्रश्न 18―स्थितिबंध किसे कहते हैं?

उत्तर―जीव के प्रदेशों में बद्धकर्मस्कंधों की कर्मरूप से रहने को, काल की मर्यादा पड़ जाने को स्थितिबंध कहते हैं ।

प्रश्न 19―किस कर्म की कितनी उत्कृष्ट स्थिति होती है?

उत्तर―ज्ञानावरण कर्म की 30 कोड़ाकोड़ीसागर, दर्शनावरण की 30 कोड़ाकोड़ीसागर, मोहनीयकर्म की 70 कोड़ाकोड़ीसागर, अंतरायकर्म की 30 कोड़ाकोड़ीसागर, वेदनीयकर्म की 30 कोड़ाकोड़ीसागर, आयुकर्म की 33 कोड़ाकोड़ी सागर, नामकर्म की 20 कोड़ाकोड़ीसागर और गोत्रकर्म की 20 कोड़ाकोड़ीसागर उत्कृष्ट स्थिति होती है ।

प्रश्न 20―एक कर्मप्रकृति के जितनी कर्मवर्गणायें बंधती हैं क्या उन सभी वर्गणाओं की उक्त स्थिति होती है?

उत्तर―आबाधाकाल के बाद किन्हीं वर्गणावों की 1 समय की, किन्हीं वर्गणावों की 2 समय की, किन्हीं वर्गणावों की 3 समय की इत्यादि प्रकार से 1-1 समय बढ़ाकर उत्कृष्ट स्थिति तक लगा लेना चाहिये ।

प्रश्न 21―तब किन्हीं वर्गणावों की उक्त उत्कृष्ट स्थिति हुई, फिर कर्मसामान्य की उत्कृष्ट स्थिति कैसे हुई?

उत्तर―एक समय में जितनी कार्माणवर्गणायें बंधी उनमें से जो एक प्रकृति की हुई, उनमें प्रकृति की अपेक्षा अभेद करके उस प्रकृति की जो उत्कृष्ट स्थिति होती है उस ही का उत्कृष्ट में वर्णन किया है ।

प्रश्न 22―अबाधाकाल किसे कहते हैं?

उत्तर―बद्धकर्मस्कंध जितने काल उदय में नहीं आ सकते उतने काल को अबाधाकाल कहते हैं । यहाँ सामान्य अबाधाकाल का प्रकरण है, अत: उस बद्ध कर्मस्कंध में से कोई भी वर्गणायें जब तक उदय में नहीं आ सकतीं उतना अबाधाकाल यहाँ ग्रहण करना ।

प्रश्न 23―विशेषरूप से अबाधाकाल क्या होता है?

उत्तर―एक समय में बंधे हुए कर्मस्कंधों में भी भिन्न-भिन्न कर्मवर्गणावों की जो-जो स्थिति मिली है उससे पहिले का काल उन-उन कर्मवर्गणाओं का अबाधाकाल कहलाता है ।

प्रश्न 24―कर्मों की जघन्यस्थिति क्या है?

उत्तर―ज्ञानावरणकर्म की अंतर्मुहूर्त, दर्शनावरणकर्म की अंतर्मुहूर्त, मोहनीयकर्म की अंतर्मुहूर्त, अंतरायकर्म की अंतर्मुहूर्त, वेदनीयकर्म की 12 मुहूर्त, आयुकर्म की अंतर्मुहूर्त, नाम कर्म की 8 मुहूर्त और गोत्रकर्म की 8 मुहूर्त जघन्यस्थिति होती है ।

प्रश्न 25―इन जघन्यस्थितियों को कौन जीव बांधता है?

उत्तर―आयुकर्म को छोड़कर बाकी सब कर्मों की जघन्यस्थितियों को उपशमश्रेणी अथवा क्षपकश्रेणी में होने वाले मुनिवृषभ ही बांधते हैं । आयुकर्म की जघन्यस्थिति को क्षुद्र जन्म वाले जीव बांधते हैं ।

प्रश्न 26―अनुभाग बंध किसे कहते हैं?

उत्तर―जीव प्रदेशों के साथ बद्ध कर्मस्कंधों में सुख दुःख आदि देने की शक्ति विशेष के पड़ जाने को अनुभागबंध कहते हैं ।

प्रश्न 27―अनुभाग के संक्षिप्त प्रकार कितने हैं?

उत्तर―अनुभाग के संक्षिप्त 4 प्रकार हैं―(1) मंद, (2) मंदतीव्र, (3) तीव्रमंद और (4) तीव्र ।

प्रश्न 28―इन 4 प्रकार के अनुभागों में तारतम्य किस प्रकार है?

उत्तर―अनुभागों का तारतम्य उदाहरण द्वारा बताया जा सकता है । एतदर्थ तीन विभाग करने चाहिये―(1) घातिया कर्मों का अनुभाग, (2) पुण्यरूप अघातिया कर्मों का अनुभाग और (3) पापरूप घातिया कर्मों का अनुभाग ।

प्रश्न 29―घातिया कर्मों के उन चार प्रकार के अनुभागों के उदाहरण क्या हैं?

उत्तर―घातिया कर्मों के अनुभाग लता, दारु (काठ), अस्थि व पाषाण के समान उत्तरोत्तर कोमल से कठोर फल देने वाले होते गये हैं ।

प्रश्न 30―पुण्यरूप घातियाकर्मों के अनुभाग किसके समान हैं?

उत्तर―पुण्यरूप घातियाकर्मों के अनुभाग गुड़, खांड, मिश्री और अमृत के समान उत्तरोत्तर मधुर हैं, फल देने वाले हैं ।

प्रश्न 31―पापरूप घातियाकर्मों के अनुभाग किसके समान हैं?

उत्तर-―पापरूप घातियाकर्मों के अनुभाग नीम, कांजीर, विष और हालाहाल के समान उत्तरोत्तर कटुक फल देने वाले हैं ।

प्रश्न 32―प्रदेशबंध किसे कहते हैं?

उत्तर―कर्मपरमाणुवों का परस्पर व जीवप्रदेशों के साथ बंध होने को प्रदेशबंध कहते हैं ।

प्रश्न 33―एक बार में कितने कर्मपरमाणुवों का बंध होता है?

उत्तर―सिद्धों अनंतवें भाग और अभव्यों से अनंतगुणे कर्मपरमाणुवों का एक समय में बंध हो जाता है । यह संख्या इतने लंबे माप की है कि एक जीव के साध इतने कर्मपरमाणुवों का बंध होता है और एक जीव के एक-एक प्रदेश पर इतने कर्मपरमाणुवों का बंध हो जाता है ।

प्रश्न 34―बद्ध कर्मपरमाणु द्रव्यों का किस-किस कर्मप्रकृति में कितना विभाग होता है ?

उत्तर―सबसे अधिक वेदनीयकर्म में, उससे कम मोहनीयकर्म में, उससे कम ज्ञानावरण में, ज्ञानावरण के बराबर दर्शनावरण में, ज्ञानावरण के बराबर अंतरायकर्म में, उससे कम नाम कर्म में, नामकर्म के बराबर गोत्रकर्म में और गोत्रकर्म से कम आयुकर्म में बद्ध कर्मस्कंध के परमाणु बंट जाते हैं ।

प्रश्न 35―इस बंटवारे को कौन करता है?

उत्तर―यह विभाग स्वयं हो जाता है, इस विभाग का भी कारण यही परिणाम है जो बंध का कारण है । जैसे भोजन करने के बाद पेट में जो आहार पहुंचा उसका कितना खून बने, कितना मल बने आदि बंटवारा स्वयं हो जाता है । उसका कारण कहा जा सकता है तो वही जठराग्नि ।

प्रश्न 36―चारों प्रकार के बंध किस कारण से होते हैं?

उत्तर―प्रकृतिबंध और प्रदेशबंध तो योग से होते हैं और स्थितिबंध एवं अनुभागबंध कषाय से होते हैं ।

प्रश्न 37―योग किसे कहते हैं?

उत्तर―आत्मा के प्रदेशों के परिस्पंद होने को योग कहते हैं ।

प्रश्न 38―योग क्या आत्मा का स्वभाव है?

उत्तर―आत्मप्रदेशपरिस्पंदरूप योग आत्मा का स्वभाव नहीं है, वह तो कर्मोंदयवश होता है । योगशक्ति अवश्य गुण या स्वभाव है, सो कर्मोंदय से उसका परिस्पंद परिणमन होता है और प्रतिनियत कर्मोंदय के अभाव से व सर्वथा कर्मोंदय के अभाव से उसका निष्क्रिय परिणमन होता है । निश्चयनय से शुद्ध आत्मप्रदेश निष्क्रिय होते हैं, व्यवहारनय से सक्रिय होते हैं ।

प्रश्न 39―कषाय किसे कहते हैं?

उत्तर―जो आत्मा को कषे याने दुःख दे अथवा जो निर्दोष परमात्मतत्त्व की भावना का अवरोध करे उसे कषाय कहते हैं ।

प्रश्न 40―इन बंधों के स्वरूप जान लेने से हमें क्या शिक्षा लेनी चाहिये?

उत्तर―ये बंध आत्मा के स्वभाव नहीं हैं और न आत्मा के हैं, ऐसा यथार्थ तत्त्व जानकर निज शुद्ध आत्मतत्त्व की भावना करनी चाहिये ।

प्रश्न 41―बंध के कारण जानकर हमें क्या शिक्षा लेनी चाहिये?

उत्तर―योग और कषाय से उक्त बंध होते हैं, अत: बंध के विनाश के अर्थ योग और कषाय का त्याग करते हुए शुद्ध आत्मतत्त्व की भावना करनी चाहिये ।

प्रश्न 42―योग और कषाय का त्याग किस प्रकार होगा?

उत्तर―मैं ध्रुव आत्मा निष्क्रिय और निष्कषाय हूँ, इस प्रकार को प्रीतिपूर्वक भावना से योग और कषाय की उपेक्षा होकर शुद्ध आत्मतत्त्व की अभिमुखता होती है । इस पुरुषार्थ के बल से योग और कषाय भी समुच्छिन्न हो जाता है ।

प्रश्न 43―योग और कषाय में पहिले कौन नष्ट होता है?

उत्तर―पहिले कषाय नष्ट होती है पश्चात् योग नष्ट होता है । कषाय का सर्वथा नाश दसवें गुणस्थान के अंत में हो जाता है ।

इस प्रकार बंधतत्त्व का वर्णन करके अब संवरतत्त्व का वर्णन करते हैं―


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