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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 34

From जैनकोष



चेदणपरिणामो जो कम्मस्सासवणिरोहणे हेऊ ।

सो भावसंवरो खलु दव्वस्सावणिरोहणो अण्णो ।।34।।

अन्वय―जो चेदणपरिणामो कम्मस्सासवणिरोहणे हेऊ सो खलु भाव संवरो, दव्वस्सासवणिरोहणो अण्णो ।

अर्थ―जो चेतनपरिणाम कर्म के आस्रव के रोकने में कारण है वह निश्चय से भावसंवर । है और द्रव्यास्रव का रुक जाना द्रव्यसंवर है ।

प्रश्न 1―क्या चेतन परिणाम आते हुए कर्मों को रोक देता है?

उत्तर―चेतनपरिणाम आते हुए कर्मों को तो नहीं रोकता है, किंतु शुद्ध चेतनपरिणाम के निमित्त से कर्मों का आना आस्रव रुक जाता है याने कर्म आते ही नहीं हैं ।

प्रश्न 2―शुद्ध चेतनपरिणाम की निष्पत्ति कैसे होती है?

उत्तर―अनादि अनंत, अहेतुक, सहजानंदमय, निष्प्रकाशमान, ध्रुव, कारणपरमात्मस्वरूप शुद्ध चैतन्यस्वभाव की भावना से शुद्ध चेतनपरिणाम की निष्पत्ति होती है ।

प्रश्न 3-―शुद्ध चैतन्यस्वभाव अनादि अनंत कैसे है?

उत्तर―चेतन अथवा चैतन्यस्वभाव सत् है । सत् की न आदि होती है और न अंत होता है, केवल परिणमन होता रहता है । यहाँ परिणमन पर दृष्टि नहीं है, क्योंकि परिणमन तो समयमात्र रहकर नष्ट होता रहता है, मैं आगे भी रहता हूँ । परिणमन समयमात्र को होता है, मैं उससे पहिले भी था, अत: मैं अनादि अनंत हूँ ।

प्रश्न 4―शुद्ध चैतन्यस्वभाव अहेतुक कैसे है?

उत्तर―चैतन्यस्वभाव स्वतःसिद्ध है, वह किन्हीं कारणों से उत्पन्न नहीं हुआ । कारणों से उत्पन्न तो पर्याय होती है, क्योंकि प्रतिविशिष्ट पर्याय जो होती है वह पहिले नहीं थी । मैं अथवा चैतन्यस्वभाव पहिले नहीं था, ऐसा नहीं है । अत: मैं अहेतुक हूँ अथवा चैतन्यस्वभाव अहेतुक है ।

प्रश्न 5―चैतन्यस्वभाव सहजानंदमय कैसे है?

उत्तर―चेतन में आनंदगुण सहज है, स्वभावरूप है । आत्मा का न तो आनंदगुण किसी अन्य द्रव्य से हुआ और न आनंद का विकास किसी अन्य द्रव्य से होता है तथा शुद्ध चैतन्यस्वभाव की भावना में सहज अनुपम परम आनंद प्रकट होता है, जिससे स्वभाव का पूर्ण साक्षात् परिचय मिलता है । अत: चैतन्यस्वभाव सहजानंदमय है ।

प्रश्न 6―चैतन्यस्वभाव नित्य प्रकाशमान कैसे है?

उत्तर―चैतन्यस्वभाव दर्शनसामान्यात्मक है । यह स्वभाव तो नित्य प्रकाशमान है ही, किंतु इसका प्रत्यय सम्यग्दृष्टि को होता है । व्यवहार में भी ज्ञानदर्शन का किसी न किसी रूप में विकास प्रत्येक जीव में रहता है, वह चैतन्यस्वभाव का ही तो विकास है । अत: चैतन्यस्वभाव नित्य प्रकाशमान है ।

प्रश्न 7―चैतन्यस्वभाव ध्रुव क्यों है?

उत्तर―चेतन अथवा चैतन्यस्वभाव अविनाशी है, सत् है । सत् का कभी विनाश नहीं होता । अत: चेतन अथवा चैतन्यस्वभाव ध्रुव है ।

प्रश्न 8―चैतन्यस्वभाव को कारणपरमात्मा क्यों कहते हैं ?

उत्तर―कार्यपरमात्मत्व याने शुद्ध पूर्ण विकास चैतन्यस्वभाव का ही परिणमन है, चैतन्यस्वभाव से ही प्रकट हुआ है, अत: सिद्ध परमात्मतत्त्व चैतन्यस्वभाव से प्रकट होने के कारण इस चैतन्यस्वभाव को कारणपरमात्मा कहते हैं ।

प्रश्न 9―अब संवर का परिणाम किस रूप है?

उत्तर―शुद्ध चेतनभाव रूप है याने अनाद्यनंत, अहेतुक निज चैतन्यस्वभाव की भावना, उपयोग, अवलंबन व सहज परिणतिरूप है ।

प्रश्न 10―द्रव्यसंवर किसे कहते हैं?

उत्तर―अब संवर के निमित्त से होने वाले नूतन द्रव्यकर्म के आने के अभाव को द्रव्यसंवर कहते हैं ।

प्रश्न 11―जो कर्म आ ही नहीं रहे हैं उनका संवर क्या?

उत्तर―कर्म पहिले आया करते थे वे चेतन के परिणामों के ही निमित्त से आया करते थे तो अब विरुद्ध चेतनभाव के प्रतिपक्षी शुद्ध चेतनभाव हैं सो पूर्व में आते थे, उसकी अपेक्षा से व अब वे विभावरूप चेतनभाव नहीं हो सकते जो द्रव्यास्रव के कारण बनते । इन सब दृष्टियों से संवर युक्तियुक्त सिद्ध हो जाता है ।

प्रश्न 12―148 कर्मप्रकृतियों का संवर क्या किसी से कम होता है या यथा तथा?

उत्तर―गुणविकास के याने गुणस्थान के अनुसार इन 148 प्रकृतियों का संवर होता है ।

प्रश्न 13―मिथ्यात्व गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―मिथ्यात्व गुणस्थान में संवर तो नहीं होता है, किंतु प्रायोग्यलब्धि के काल में 34 बंधापसरण होते हैं ।

प्रश्न 14―बंधापसरण और संवर में क्या अंतर है?

उत्तर―बंधापसरण तो मिथ्यात्वगुणस्थान में प्रायोग्यलब्धि के समय हो जाता है । वह मिथ्यादृष्टि यदि कारण लब्धि न कर सका तो प्रायोग्यलब्धि से गिरकर फिर इसी गुणस्थान में बंध करने लगता तथा यदि ऊपर गुणस्थानों में चढ़ा तो भी इनमें से कुछ प्रकृतियों का कुछ गुणस्थानों तक बंध करने लगता । किंतु जिस प्रकृति का संवर जिस गुणस्थान में होता है उसमें व उससे ऊपर के सब गुणस्थानों में व अतीत गुणस्थान में कहीं भी उसका बंध नहीं हो सकता । ये बंधापसरण अभव्य के भी हो सकते हैं, किंतु संवर कभी नहीं होता ।

प्रश्न 15―ये 34 बंधापसरण किस प्रकार होते हैं?

उत्तर―मिथ्यादृष्टि जीव विशुद्धि के बल से जब क्षयोपशमलब्धि, विशुद्धि और देशनालब्धि प्राप्त करने के पश्चात् प्रायोग्यलब्धि में आता है तब वह केवल अंत: कोड़ाकोड़ी सागर की स्थिति बांधता है अर्थात् एक कोड़ाकोड़ी सागर से कम स्थिति बांधता है तथा इसके बाद भी विशुद्धिबल से स्थितिबंध उत्तरोत्तर कम बांधता है । इन्हीं कम स्थितिबंधों कि अवसरों में 1-1 करके 34 बंधापसरण होते हैं अर्थात् उन प्रकृतियों की जिनका निर्देश अभी किया जायेगा बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 16―प्रथम बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―उक्त अंत: कोड़ाकोड़ी सागर से भी कम-कम बंध होते-होते जब शत पृथक्त्व सागर (300 से 900 सागर के बीच) कम बंध होने लगता है तब नरकायु का बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 17―द्वितीय बंधापसरण कब और किसका होता है?

उत्तर―प्रथम बंधापरण में होने वाले स्थितिबंध से कम-कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब तिर्यगायु का बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 18―तृतीय बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―द्वितीय बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम-कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्व सागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब मनुष्यायु का बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 19―चतुर्थ बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―तृतीय बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब देवायु का बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 20―पंचम बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―चतुर्थबंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम-कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब नरकगति व नरकगत्यानुपूर्व्य―इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 21―षष्ठ बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―पंचम बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम-कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्पर संयुक्त सूक्ष्म, अपर्याप्ति व साधारण, इन तीन प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 22-―सप्तम बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―षष्ठ बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम-कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्पर संयुक्त सूक्ष्म, अपर्याप्ति, प्रत्येक शरीर । इन तीन प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 23―अष्टम बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―सप्तम बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शत पृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्पर संयुक्त, बादर, अपर्याप्ति, साधारण शरीर, इन तीन प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 24―नवम बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―अष्टम बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध रह जाता है तब बादर, अपर्याप्ति, प्रत्येक शरीर, इन तीन प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 25―दशम बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―नवम बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शत पृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्परसंयुक्त द्वींद्रिय जाति व अपर्याति, इन दो प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 26―11वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―दशम बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शत पृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्परसंयुक्त त्रींद्रिय जाति व अपर्याप्ति―इन दो प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 27―12वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर-―11वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्परसंयुंक्त चतुरिंद्रिय जाति व अपर्याप्ति, इन दोनों प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 28―13वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―12वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्परसंयुक्त असंज्ञी पंचेंद्रियजाति व अपर्याप्ति―इन दोनों प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 29―14वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―13वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्परसंयुक्त संज्ञी पंचेंद्रिय जाति व अपर्याप्ति―इन दोनों प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद हों जाता है ।

प्रश्न 30―15वां बंधापंसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―14वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्परसंयुक्त सूक्ष्म, पर्याप्ति, साधारण शरीर इन तीन प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 31―16वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―15वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब सूक्ष्म, पर्याप्ति, प्रत्येक शरीर, इन परस्परसंयुक्त तीन प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 32-―17वां बंधापसरण कब और किसका होता है?

उत्तर―16वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब बादर, पर्याप्ति, साधारण शरीर, इन परस्परसंयुक्त तीन प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 33-―18वां बंधापसरण कब और, किसका होता हैं?

उत्तर-―17वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब बादर, पर्याप्ति, प्रत्येकशरीर, एकेंद्रिय, आतप और स्थावर, इन परस्परसंयुक्त छ: प्रकृतियों का बंधापसरण हो जाता है ।

प्रश्न 34-―19वां बंधापसरण कब और किसका होता है?

उत्तर―18वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्परसंयुक्त द्वींद्रियजाति व पर्याप्ति, इन दो प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 35―20वाँ बंधापसरण कब और किसका होता है?

उत्तर―19वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्परसंयुक्त द्वींद्रियजाति व पर्याप्ति इन दोनों प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 36―21वां बंधापसरण कब और किसका होता है?

उत्तर―20वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब परस्परसंयुक्त चतुरिंद्रियजाति व पर्याप्ति इन दो प्रकृतियों का बंधापसरण हो जाता है ।

प्रश्न 37―22वां बंधापसरण कब और किसका होता है?

उत्तर―21वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब असंज्ञी पंचेंद्रिय जाति व पर्याप्ति इन परस्परसंयुक्त दोनों प्रकृतियों का बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 38―असंज्ञी पंचेंद्रियजातिनामकर्म तो कोई नहीं है?

उत्तर―प्रकृतियाँ सब 148 ही नहीं हैं, उन 148 प्रकृतियों के और भी आवांतर भेद हो जाते हैं जो कि असंख्यात और अनंत तक हो जाते हैं । असंज्ञी पंचेंद्रिय जाति व सती पंचेंद्रियजाति, ये दोनों पंचेंद्रियजाति नामकर्म के भेद हैं ।

प्रश्न 39―23वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―22वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्व्य और उद्योत, इन तीन प्रकृतियों का एक साथ बंधापसरण हो जाता है ।

प्रश्न 40―24वां बंधापसरण कब और किसका होता है?

उत्तर―23वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब नीच गोत्रकर्म का बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 41―25वाँ बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―24वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम बंध हो जाता है तब अप्रशस्तविहायोगति, दुर्भग, दु:स्वर व अनादेय, इन चारों प्रकृतियों का एक साथ बंधापसरण हो जाता है ।

प्रश्न 42―26वां बंधापसरण कब और किसका होता है?

उत्तर―25वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब हुंडकसंस्थान व असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 43―27वाँ बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―26वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम-कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब नपुंसकवेद का बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 44―28वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―27वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब वामनसंस्थान और कीलितसंहनन, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 45―29वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―28वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब कुब्जकसंस्थान व अर्द्धनाराचसंहनन, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 46―3॰वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―29वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब स्त्रीवेदमोहनीयकर्म का बंधव्युच्छेद होता है ।

प्रश्न 47-―31वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―-30वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब स्वातिसंस्थान व नाराचसंहनन, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 48―32वां बंधापसरण किसका और कब होता है?

उत्तर―31वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थान व वज्रनाराचसंहनन, इन दोनों प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 49―33वाँ बंधापसरण कब और किसका होता है?

उत्तर―32वें बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब मनुष्यगति, औदारिकशरीर, औदारिक अंगोंपांग वज्रऋषभनाराचसंहनन और मनुष्यगत्यानुपूर्व्य, इन पाँचों प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 50―34व बंधापसरण कब और किसका होता है?

उत्तर―33वेंं बंधापसरण में होने वाले स्थितिबंध से कम बंध होते-होते जब शतपृथक्त्वसागर कम स्थितिबंध हो जाता है तब असातावेदनीय, अरति, शोक, अस्थिर, अशुभ, अयश:कीर्ति, इन छ: प्रकृतियों का एक साथ बंधव्युच्छेद हो जाता है ।

प्रश्न 51―यह 34 बंधापसरण कब तक रहते हैं?

उत्तर―इन 34 बंधापसरणों को करने वाले जीव के या तो मिथ्यात्व गुणस्थान का अंत हो जाये याने सम्यक्त्व उत्पन्न हो जाये या प्रायोग्यलब्धि से पतन हो जाये, इससे पहिले तक 34 बंधापसरण बने रहते हैं ।

प्रश्न 52―सासादनसम्यक्त्व गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―सासादनसम्यक्त्व नामक दूसरे गुणस्थान में 16 प्रकृतियों का संवर होता है । वे 16 प्रकृतियां ये हैं―(1) मिथ्यात्व, (2) नपुंसकवेद, (3) नरकायु, (4) नरकगति (5) एकेंद्रियजाति, (6) द्वींद्रियजाति, (7) त्रींद्रियजाति, (8) चतुरिंद्रियजाति, (9) हुंडकसंस्थान, (10) असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन, (11) नरकगत्यानुपूर्व्य, (12) आतप, (13) साधारणशरीर, (14) सूक्ष्म, (15) अपर्याप्ति और (16) स्थावर ।

प्रश्न 53―सासादन सम्यक्त्व में इन 16 प्रकृतियों का संवर क्यों होता है?

उत्तर―इन 16 प्रकृतियों के आस्रव, बंध का कारण मिथ्यात्वभाव है । सासादनसम्यक्त्व में मिथ्यास्वभाव है नहीं, अतएव अशुभोपयोग की मंदता होने से इन प्रकृतियों का यहाँ संवर होता है ।

प्रश्न 54―मिश्रसम्यक्त्व गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―तीसरे गुणस्थान में 41 प्रकृतियों का संवर होता है । इनमें से सोलह प्रकृतियाँ तो पूर्व संवृत हैं, बाकी 25 प्रकृतियां ये हैं―(1) निद्रानिद्रा, (2) प्रचलाप्रचला, (3) स्त्यानगृद्धि, (4) अनंतानुबंधी क्रोध, (5) अन0 मान, (6) अन0 माया, (7) अन0 लोभ, (8) स्त्रीवेद, (9) तिर्यगायु, (10) तिर्यग्गति, (11) न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थान, (12) स्वातिसंस्थान, (13) वामनसंस्थान, (14) कुब्जकसंस्थान, (15) वज्रनाराचसंहनन, (16) नाराचसंहनन, (17) अर्द्धनाराचसंहनन, (18) कीलकसंहनन, (19) तिर्यग्गत्यानुपूर्व्य, (20) उद्योत, (21) अप्रशस्तविहायोगति, (22) दुर्भग, (23) दुःस्वर, (24) अनादेय और (25) नीचगोत्र ।

प्रश्न 55―इन 25 प्रकृतियों का मिश्रसम्यक्त्व गुणस्थान में क्यों संवर होता?

उत्तर―इन पच्चीस प्रकृतियों के बंध का कारण अनंतानुबंधी कषाय का उदय है । इस तीसरे गुणस्थान में अनंतानुबंधी कषाय और मिथ्यात्व नहीं हैं, अत: इन प्रकृतियों के आस्रव का कारण न होने से संवर हो जाता है ।

प्रश्न 56―अनंतानुबंधी कषाय यहाँ क्यों नहीं होती?

उत्तर―सम्यग्मिथ्यात्व परिणाम के होनेपर अशुभोपयोग की अत्यंत मंदता होने से अनंतातुबंधी कषाय हो नहीं सकती ।

प्रश्न 57―अविरत सम्यक्त्वगुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―अविरत सम्यक्त्व नामक चौथे गुणस्थान में पूर्वोक्त 41 प्रकृतियों का संवर होता है । यहाँ इस संवर का कारण सम्यक्त्वपरिणाम है । इस गुणस्थान में अनंतानुबंधी कषाय 4 मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्प्रकृति, इन सात प्रकृतियों के उपशम, क्षय या क्षयोपशम के कारण अशुभोपयोग का अभाव हो जाता है और शुद्धोपयोगसाधक शुभोपयोग प्रकट हो जाता है ।

प्रश्न 58―देशविरत गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―देशविरत गुणस्थान में 51 प्रकृतियों का संवर होता है । इनमें 41 तो पूर्व संवृत हैं और 10 प्रकृतियां ये हैं―(1-4) अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, (5) मनुष्यायु, (6) मनुष्यगति, (7) औदारिकशरीर, (8) औदारिक अंगोपांग, (9) वज्रऋषभनाराचसंहनन और (10) मनुष्यगत्यानुपूर्व्य ।

प्रश्न 59―देशविरत में इन 10 प्रकृतियों का संवर क्यों हो जाता है?

उत्तर―देशसंयम (संयमासंयम) का भाव होनेपर अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ कषायें नहीं रह सकतीं । देशविरत परिणाम सम्यक्त्व होने पर ही मनुष्य तिर्यंच के होता है । सो इनके सम्यक्त्व होने के कारण आयु बंधती है तो देवायु ही बंधती है, अत: देशविरत देवगति सिवाय अन्य भवों में जाता नहीं है, अत: मनुष्यायु से संबंध रखने वाली 6 प्रकृतियों का भी संवर हो जाता है ।

प्रश्न 60―सम्यक्त्व तो चौथे गुणस्थान में भी है, वहाँ इन 6 प्रकृतियों का संवर क्यों नहीं है?

उत्तर―चौथा गुणस्थान तो देव व नारकियों के भी होता है । सम्यग्दृष्टि देव या नारकी मरणकर देवगति में नहीं जा सकते हैं, ऐसा प्राकृतिक नियम है । वे मनुष्यगति में ही उत्पन्न होते हैं । अत: चौथे गुणस्थान में इन 6 प्रकृतियों की संवर नहीं कहा । विशेष अपेक्षा से तो चौथे गुणस्थान के मनुष्य तिर्यंचों के आयु न बंधी हो तो सम्यक्त्व होने के कारण उनके भी देवायु ही बंधती है और इस तरह उस चतुर्थगुणस्थानवर्ती मनुष्यतिर्यंच के भी इन 6 प्रकृतियों का संवर होता है ।

प्रश्न 61―प्रमत्तविरत गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―प्रमत्तविरत गुणस्थान में 55 प्रकृतियों का संवर होता है । इनमें 51 तो पूर्व संवृत हैं और चार ये हैं―(1) प्रत्याख्यानावरण क्रोध, (2) प्रत्याख्यानावरण मान, (3) प्रत्याख्यानावरण माया, (4) प्रत्याख्यानावरण लोभ ।

प्रश्न 62―प्रमत्तविरत में इन 4 प्रकृतियों का संवर क्यों होता है?

उत्तर―प्रमत्तविरत गुणस्थान में सकलसंयम प्रकट हैं । सकलसंयम का परिणाम प्रकट होने पर सकलसंयम के प्रतिपक्षी इन 4 प्रकृतियों का आस्रव हो नहीं सकता ।

प्रश्न 63―अप्रमत्तविरत गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―अप्रमत्तविरत गुणस्थान में 61 प्रकृतियों का संवर होता है । इनमें 55 प्रकृतियां तो पूर्वसंवृत हैं और 6 प्रकृतियां ये हैं―(1) असातावेदनीय, (2) अरतिमोहनीय, (3) शोकवेदनीय, (4) अशुभनामकर्म, (5) अस्थिरनामकर्म और (6) अयश:कीर्तिनामकर्म ।

प्रश्न 64―अप्रमत्तविरत में इन 6 प्रकृतियों का संवर क्यों हो जाता है?

उत्तर―अप्रमत्तविरत गुणस्थान में संज्वलनकषाय का उदय मंद हो जाने से प्रमाद नहीं रहा । अप्रमत्तविरत अवस्था में इन छ: प्रकृतियों का आस्रव हो नहीं सकता ।

प्रश्न 65―अपूर्वकरण में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―अपूर्वकरण गुणस्थान में 62 प्रकृतियों का संवर होता है । इनमें से 61 प्रकृतियां तो पूर्व संवृत हैं और एक प्रकृति देवायु है ।

प्रश्न 66―आठवें गुणस्थान में देवायु का संवर क्यों होता है?

उत्तर―श्रेणी के परिणाम इतने निर्मल होते हैं कि उनके कारण श्रेणियों में किसी भी आयु का आस्रव नहीं होता । अन्य आयुकर्मों का तो संवर पहले, दूसरे व 5वें गुणस्थान में बता दिया था, शेष रही देवायु का यहाँ संवर हो जाता है ।

प्रश्न 67―अनिवृत्तिकरण में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में 98 प्रकृतियों का संवर होता है । इनमें 62 प्रकृतियां तो पूर्वसंवृत हैं और 66 प्रकृतियां ये हैं―(1) निद्रा, (2) प्रचला, (3) हास्य, (4) रति, (5) भय, (6) जुगुप्सा, (7) देवगति, (8) पंचेंद्रियजाति, (9) वैक्रियक शरीर, (10) वैक्रियक अंगोपांग, (11) आहारक शरीर, (12) आहारकांगोपांग, (13) औदारिक शरीर, (14) औदारिकांगोपाग, (15) निर्माण, (16) समचतुरस्रसंस्थान,, (17) स्पर्श, (18) रस, (19) गंध, (20) वर्णनामकर्म, (21) देवगत्यानुपूर्व्य, (22) अगुरुलघु, (23) उपघात, (24) परघात, (25) उच्छ᳭वास, (26) प्रशस्तविहायोगति, (27) प्रत्येकशरीर, (28) त्रस, (29) वादर, (30) पर्याप्ति, (31) शुभ, (32) सुभग, (33) सुस्वर, (34) स्थिर, (35) आदेयनामकर्म, (36) तीर्थंकरनामकर्म ।

प्रश्न 68―नवमे गुणस्थान में 36 प्रकृतियों का क्यों संवर है?

उत्तर―उपशमक अथवा क्षपक अनिवृत्तिकरण परिणामों की विशेषता के कारण उक्त प्रकृतियों का संवर है । अपूर्वकरण परिणामों में भी उत्तरोत्तर विशेषता थी, जिसके कारण अपूर्वकरण गुणस्थान में ही कुछ समय पश्चात् उक्त 36 प्रकृतियों में से 2 और कुछ समय पश्चात् 30 प्रकृतियों का संवर हो गया था ।

प्रश्न 69―सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―दसवें गुणस्थान में 103 प्रकृतियों का संवर होता है । इनमें 98 प्रकृतियां तो पूर्व संवृत हैं व 5 प्रकृतियां ये हैं―(1) संज्वलन क्रोध, (2) संज्वलन मान, (3) संज्वलन माया, (4) संज्वलन लोभ, (5) पुरुषवेद ।

प्रश्न 70―दसवें गुणस्थान में इन 5 प्रकृतियों का संवर क्यों है?

उत्तर―सूक्ष्मलोभ के अतिरिक्त सर्वकषायों के अभाव से मोहनीयकर्म की अवशिष्ट, इन 5 प्रकृतियों का संवर होता है । अनिवृत्तिकरण परिणामों की विशेषता से भी उक्त 5 प्रकृतियों में से अनिवृत्तिकरण के दूसरे भाग में पुरुषवेद, तीसरे भाग में संज्वलनक्रोध, चौथे भाग में संज्वलन मान, पांचवें भाग में संज्वलन माया नामक मोहनीयकर्म का संवर हो गया था ।

प्रश्न 71―उपशांतमोह में कितनी प्रकृतियों का संवर है?

उत्तर―उपशांतमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान में 119 प्रकृतियों का संवर होता है । इनमें 103 प्रकृतियां तो पूर्वसंवृत हैं, शेष 16 प्रकृतियां ये हैं―(1) मतिज्ञानावरण, (2) श्रुतज्ञानावरण, (3) अवधिज्ञानावरण, (4) मन:पर्ययज्ञानावरण, (5) केवलज्ञानावरण, (6) चक्षुर्दर्शनावरण, (7) अचक्षुर्दर्शनावरण, (8) अवधिज्ञानावरण, (9) केवलदर्शनावरण, (10) यश:कीर्तिनामकर्म, (11) उच्चगोत्रकर्म, (12) दानांतराय, (13) लाभांतराय, (14) भोगांतराय, (15) उपभोगांतराय और (16) वीर्यांतराय ।

प्रश्न 72―उपशांतमोह में उक्त 16 प्रकृतियों का संवर क्यों होता है?

उत्तर―समस्त मोह के अभाव से होने वाली वीतरागता के कारण केवल सातावेदनीय को छोड़कर सर्वप्रकृतियों का संवर हो जाता है ।

प्रश्न 73―यहाँ सातावेदनीय का संवर क्यों नहीं होता?

उत्तर―यद्यपि वीतरागता हो गई, किंतु योग का सद्धाव है । कारण याने योगों के सद्भाव से सातावेदनीय का ईर्यापथ आस्रव होता है ।

प्रश्न 74―उपशांतमोह में सातावेदनीय का ईर्यापथ आस्रव क्यों है?

उत्तर―सांपरायिक आस्रव कषाय होनेपर ही होता है । योग से आस्रव तो होता है, किंतु आकर तुरंत खिर जाता है । कषाय न होने से स्थितिबंध नहीं होता । अत: उपशांतमोह में केवल सातावेदनीय का ईर्यापथ आस्रव है ।

प्रश्न 75―क्षीणमोह में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―क्षीणमोह गुणस्थान में भी उक्त प्रकार से 119 प्रकृतियों का संवर होता है ।

प्रश्न 76―सयोगकेवली में कितनी प्रकृतियों का संवर होता है?

उत्तर―सयोगकेवली गुणस्थान में भी उक्त 119 प्रकृतियों का संवर है ।

प्रश्न 77―अयोगकेवली गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का संवर है?

उत्तर―अयोगकेवली गुणस्थान में 120 प्रकृतियों का संवर होता है । इनमें 119 तो पूर्व संवृत हैं और एक सातावेदनीय का भी संवर होता है ।

प्रश्न 78-―यहाँ सातावेदनीय का संवर क्यों हो जाता है?

उत्तर―योग का अभाव रहने से यहाँ अवशिष्ट सातावेदनीय का संवर होता है ।

प्रश्न 79―शेष 28 प्रकृतियों का कहां संवर होता है?

उत्तर―शेष 28 प्रकृतियों में 2 तो दर्शनमोहनीय हैं―(1) सम्यग्मिथ्यात्व और (2) सम्यक्प्रकृति । 5 बंधननामकर्म हैं, 5 संघातनामकर्म हैं, 6 स्पर्शादि संबंधी हैं । इनमें ते सम्यग्मिथ्यात्व व सम्यक्त्व᳭प्रकृति का तो आस्रव ही नहीं होता, इसलिये उनके संवर का वहाँ प्रश्न ही नहीं है । 5 बंधन, 5 संघातनामकर्मों का शरीर में अंतर्भाव किया है, सो जहां शरीरनामकर्मों का संवर होता है नहीं उसी नाम वाले बंधन व संघातनामकर्मों का संवर होता है ।

स्पर्शादि नामकर्म 20 हैं, उन्हें मूल नाम से 4 मानकर 4 का संवर बताया है । इस तरह 16 नंबर कम रहते थे, सो जहाँ (नवमें गुणस्थान में) इन 4 का संवर बताया तो 20 का ही संवर समझना ।

प्रश्न 80―अतीतगुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का संवर है?

उत्तर―अतीतगुणस्थान में (सिद्ध भगवान) में समस्त कर्म प्रकृतियों का सदा के लिये संवर रहता है । क्योंकि अत्यंत निर्मल, द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्म से मुक्त सर्वथा शुद्ध वहाँ शुद्धोपयोग बर्तता रहता है ।

प्रश्न 81―संवर की विशेषता में क्या उपयोग की विशेषता कारण नहीं है?

उत्तर―उपयोग की विशेषता का भी कारण मोह का भाव व अभाव है । संवरप्रदर्शक उपयोग के प्रकार से भी मोह का तारतम्य व अभाव समझना चाहिये ।

प्रश्न 82―उपयोग के कितने प्रकार हैं?

उत्तर―उपयोग के 3 प्रकार हैं―(1) अशुभोपयोग, (2) शुभोपयोग और (3) शुद्धोपयोग ।

प्रश्न 83―अशुभोपयोग किन गुणस्थानों में हैं?

उत्तर―मिथ्यात्व, सासादनसम्यक्त्व और मिश्रसम्यक्त्व, इन तीन गुणस्थानों में ऊपर ऊपर मंद-मंद रूप से होता हुआ अशुभोपयोग है ।

प्रश्न 84―शुभोपयोग किन गुणस्थानों में है?

उत्तर―अविरतसम्यक्त्व, देशविरत और प्रमत्तविरत, इन तीन गुणस्थानों में ऊपर-ऊपर शुद्धोपयोग की साधकता के विशेष से होता हुआ शुभोपयोग है ।

प्रश्न 85―शुद्धोपयोग किन गुणस्थानों में हैं?

उत्तर―शुद्धोपयोग दो प्रकारों में होता है―(1) एकदेशनिरावरणरूप शुद्धोपयोग, (2) सर्वदेशनिरावरणरूप शुद्धोपयोग । इनमें से एकदेशनिरावरणरूप शुद्धोपयोग अप्रमत्तविरत गुण स्थान से लेकर क्षीणकषाय नामक बारहवें गुणस्थान तक ऊपर-ऊपर बढ़ती हुई निर्मलता को लिये हुए होता है ।

प्रश्न 86―इसे एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग क्यों कहते हैं?

उत्तर―इस शुद्धोपयोग में शुद्ध चैतन्यस्वभावस्वरूप निज आत्मा ध्येय रहता है और इसका आलंबन भी होता है । इस कारण यह उपयोग शुद्धोपयोग तो है, किंतु केवल ज्ञानरूप शुद्धोपयोग की तरह शुद्ध नहीं है, अत: इसे एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग कहते हैं ।

प्रश्न 87―सर्वदेशनिरावरण अथवा शुद्धोपयोग किन गुणस्थानों में से होता है?

उत्तर―सर्वदेशनिरावरण अथवा पूर्ण शुद्धोपयोग सयोगकेवली व अयोगकेवली, इन दो गुणस्थानों में तथा अतीत गुणस्थान में पूर्ण शुद्धोपयोग होता है । इस पूर्ण शुद्धोपयोग का कारण एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग है ।

प्रश्न 88―पूर्णशुद्धोपयोग का कारण एकदेशशुद्धोपयोग क्यों है?

उत्तर―अशुद्धपर्याय वाले आत्मा को शुद्ध होना है । अशुद्ध के अवलंबन से अशुद्धता और शुद्ध के अवलंबन से शुद्धता प्रकट होती है । यह आत्मा अभी तो शुद्ध है नहीं, फिर किसके अवलंबन से शुद्धता प्रकट हो? तथ्य यहाँ यह है कि आत्मा स्वभावदृष्टि या द्रव्यदृष्टि से एक स्वरूप चैतन्यमात्र जाना जाता है । वह स्वभाव न सकषाय है, न अकषाय है, ऐसा स्वभावमात्र शुद्ध है । इस शुद्ध आत्मतत्त्व का जो उपयोग है यह पुरुषार्थ उत्तरोत्तर दृढता से शुद्ध का उपयोग करता हुआ स्वयं शुद्ध उपयोग हो जाता है । वह शुद्ध तत्त्व का उपयोग पूर्ण शुद्धोपयोग तो है नहीं और अशुद्धोपयोग भी नहीं, किंतु शुद्ध तत्त्व का भाव, आलंबन शुद्धता के यथायोग्य परिणमन के कारण एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग कहा जाता है ।

प्रश्न 89―मुक्ति का कारण कौनसा उपयोग है?

उत्तर―मुक्ति का कारण एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग है, क्योंकि पूर्ण शुद्धोपयोग तो मुक्तिरूप ही है और अशुभोपयोगरूप मोक्ष का कारण नहीं हो सकता तथा मिथ्यात्व के साथ रहने वाला शुभोपयोग भी शुद्धोपयोग का कारण हो नहीं सकता । अत: एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग ही मुक्ति का कारण है ।

प्रश्न 90―शुद्धोपयोग साधक शुभोपयोग जो कि चौथे गुणस्थान से छठे गुणस्थान तक कहा गया है वह मुक्ति का कारण है कि नहीं?

उत्तर―इस शुभोपयोग में शुद्ध आत्मतत्त्व की प्रतीति तो निरंतर है और शुद्ध आत्मतत्त्व की भावना व अवलंबन भी यथासमय अल्प समय को होती रहती है । अत: यहाँ भी एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग पाया जाता है, किंतु यहाँ शुद्ध आत्मतत्त्व के अवलंबन की स्थिति कदाचित् हीने से शुभोपयोग की मुख्यता है । वस्तुत: तो यहाँ भी रहने वाला एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग और शुद्धात्मतत्त्व की प्रतीतिरूप शुद्धोपयोग मुक्ति का कारण है ।

प्रश्न 91―साक्षात् मुक्ति का कारण कौनसा उपयोग है?

उत्तर―उत्कृष्ट एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग मुक्ति का कारण है । उससे पहिले के समस्त एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग परंपरया मुक्ति के कारण हैं अथवा उनके पश्चात् ही उत्तर समय में होने वाली एकदेश मुक्ति के कारण हैं ।

प्रश्न 92―तब तो एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग ही उपादेय व ध्येय होना चाहिये ?

उत्तर―एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग क्षायोपशमिक भाव है, वह स्वयं शुद्ध भाव नहीं है, किंतु शुद्धाशुद्धरूप है, अपूर्ण है । यह ध्येय अथवा उपादेय नहीं है । एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग का विषयभूत अखंड, सहजनिरावरण परमात्मस्वरूप ध्येय और उपादेय है, खंडज्ञान रूप यह एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग ध्येय व उपादेय नहीं है । इस अपूर्ण शुद्धोपयोग के ध्यान से यह एकदेशनिरावरण शुद्धोपयोग होता भी नहीं है ।

प्रश्न 93―इस उक्त समस्त वर्णन से हमें क्या शिक्षा लेनी चाहिये?

उत्तर―परमशुद्धनिश्चयनय के विषयभूत अखंड निजस्वभाव की दृष्टि करके अपने आपकी इस प्रकार स्वरूपाचरण सहित भावना होनी चाहिये―मैं सर्व अन्य पदार्थों से अत्यंत जुदा हूँ, अपने ही गुणों में तन्मय हूँ, त्रैकालिक चैतन्यस्वभावमय हूँ, स्वतःसिद्ध हूँ, अनादि शुद्ध हूँ, सहजसिद्ध हूँ, निरंजन हूँ, ज्ञानानंदस्वरूप हूँ इत्यादि ।

प्रश्न 94―आत्मा के शुद्धस्वरूप की भावना का क्या फल है?

उत्तर―शुद्ध आत्मतत्त्व की भावना, आश्रय से निर्मल पर्याय प्रकट होता है जो कि सहज आनंद का पुंज है ।

प्रश्न 95―संसार-अवस्था में आत्मा शुद्ध तो है नहीं, फिर असत्य की भावना मोक्षमार्ग कैसे हो सकता?

उत्तर―सामान्य स्वभाव, द्रव्यदृष्टि से परखा गया स्वभाव आत्मा में अंत: सदा प्रकाशमान है । वह तो अन्योपयोग से तिरोभूत हुआ था, किंतु इस ही के उपयोग में यह स्वभाव प्रत्यक्ष हो जाता है ।

इस प्रकार संवर के लक्षणों का वर्णन करके भावसंवर के कारणरूप भावसंवर के भेदों को कहते हैं―


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