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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 37

From जैनकोष



सव्वस्स कम्मणो जो खयहेदू अप्पणो हु परिणामो ।

णेयो स भावमोक्खो दव्वविमोक्खो य कम्मपुदभावो ।।37।।

अन्वय―हु अप्पणो जो परिणामो सव्वस्स कम्मणो खयहेदू स भावमोक्खो य कम्मपुदभावो दव्वविमोक्खो णेयो ।

अर्थ―निश्चय से आत्मा का जो परिणाम समस्त कर्म के क्षय का कारण है उसे तो भावमोक्ष और कर्मों के पृथक् हो जाने को द्रव्यमोक्ष जानना चाहिये ।

प्रश्न 1―आत्मा का कौनसा परिणाम कर्मक्षय का कारण है?

उतर―निश्चयरत्नत्रयात्मक कारणसमयसाररूप आत्मा का परिणाम कर्मक्षय का कारण है ।

प्रश्न 2―कारणसमयसार क्या है?

उत्तर―कारणसमयसार 2 प्रकार से जानना चाहिये―(1) सामान्यकारणसमयसार, (2) विशेषकारणसमयसार ।

प्रश्न 3―सामान्यकारणसमयसार किसे कहते हैं?

उत्तर―अनाद्यनंत, अखंड, अहेतुक चैतन्यस्वभाव को सामान्यकारणसमयसार कहते हैं । इसका दूसरा नाम पारिणामिक भाव या परमपारिणामिक भाव है ।

प्रश्न 4―क्या सामान्यकारणसमयसार मोक्ष का कारण नहीं है?

उत्तर―सामान्यकारणसमयसार की अशुद्ध शुद्ध नाना परिणतियां होती रहती हैं, केवल मोक्ष का ही कारण हो ऐसा नहीं है अथवा उसका स्वयं स्वरूप पर्याय आदि भेद कल्पना से रहित है अत: वह मोक्षहेतु नहीं है ।

प्रश्न 5―सामान्यकारणसमयसार की दृष्टि हुये बिना तो मोक्षमार्ग का भी प्रारंभ नहीं होता, फिर वही मोक्षहेतु कैसे नहीं है?

उत्तर―सामान्यकारणसमयसार की दृष्टि, प्रतीति, आलंबन, अनुभूति ये सब मोक्ष के हेतु हैं, किंतु सामान्यकारणसमयसार स्वयं न हेतु है और न कार्य है तथा न अन्य कल्पनागत है । यह तो सामान्यस्वरूप है ।

प्रश्न 6―विशेषकारणसमयसार किसे कहते है?

उत्तर―सामान्यकारणसमयसार की दृष्टि, प्रतीति, आलंबन, भावना, अनुभूति, अनुरूप परिणति ये सब विशेषकारणासमयसार हैं ।

प्रश्न 7―मोक्ष का साक्षात् हेतु क्या है?

उत्तर―सामान्यकारणसमयसार के अनुरूप परिणमनरूप विशेष कारणसमयसार मोक्ष का साक्षात् हेतु है । इसके दूसरे नाम निश्चयरत्नत्रय, अभेदरत्नत्रय, एकत्व वितर्क अवीचार शुक्लध्यान, परमसमाधि, वीतरागभाव आदि हैं ।

प्रश्न 8―तब तो विशेषकारणसमयसार का ही ध्यान करना चाहिये?

उतर―नहीं ध्येय तो सामान्यकारणसमयसार होता है । विशेषकारणसमयसार तो कहीं ध्यानरूप और कहीं ध्यान के फलरूप है ।

प्रश्न 9―भावमोक्ष किस गुणस्थान में है?

उत्तर―भावमोक्ष 13 वें गुणस्थान में है और आत्मद्रव्य की अपेक्षा भावमोक्ष याने जीवमोक्ष अतीत गुणस्थान होते ही हो जाता है ।

प्रश्न 10-―द्रव्यमोक्ष किस गुणस्थान में होता है?

उत्तर―घातिया कर्मों की अपेक्षा से द्रव्यमोक्ष 13वें गुणस्थान में है और समस्त कर्म की मुक्ति की अपेक्षा द्रव्यमोक्ष अतीत गुणस्थान होते ही हो जाता है ।

प्रश्न 11-―मुक्तावस्था में आत्मा की क्या स्थिति है?

उत्तर-―मुक्त परमात्मा केवलज्ञान के द्वारा तीन लोक, तीन कालवर्ती सर्वद्रव्य गुणपर्यायों को जानते रहते हैं, केवलदर्शन के द्वारा सर्वज्ञायक आत्मा के स्वरूप को निरंतर चेतते रहते हैं, अनंत आनंद के द्वारा पूर्ण निराकूलतारूप सहज परमआनंद को भोगते रहते हैं । इसी प्रकार समस्त गुणों के शुद्ध विकास का अनुभव करते रहते हैं ।

प्रश्न 12―किन कर्मप्रकृतियों का किस गुणस्थान में पूर्ण क्षय हो जाता है?

उत्तर―जिस मनुष्यभव में आत्मा मुक्त होता है उसमें नरकायु, देवायु व तिर्यगायु की तो सत्ता ही नहीं है । अनंतानुबंधी 4 व दर्शनमोह की 3, इन सात प्रकृतियों का चौथे से लेकर सातवें तक किमी भी गुणस्थान में क्षय हो जाता है । नवमे गुणस्थान में पहिले स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला व नामकर्म की 13 इस तरह 16 का क्षय, पश्चात् अप्रत्याख्यानावरण व प्रत्याख्यानावरण संबंधी 8, पश्चात् नपुंसकवेद, पश्चात् स्त्रीवेद, पश्चात् 6 नोकषाय, पश्चात् पुरुषवेद, पश्चात् संज्वलनक्रोध, पश्चात् संज्वलनमान, पश्चात् संज्वलन माया, इन 36 प्रकृतियों का क्षय होता है । 10वें गुणस्थान में संज्वलनलोभ का क्षय होता है । 12वें गुणस्थान में ज्ञानावरण की 5, अंतराय की 5, दर्शनावरण की अवशिष्ट 6―इन 16 प्रकृतियों का क्षय हो जाता है । इस तरह 3+7+36+1+16=63 तिरेसठ प्रकृतियों का नाश हो जाता है और सकलपरमात्मत्व हो जाता है । पश्चात् शेष की 85 प्रकृतियों का क्षय 14वें गुणस्थान में होता है और गुणस्थानातीत होकर आत्मा निकलपरमात्मा हो जाता है ।

इस प्रकार मोक्षतत्त्व के वर्णन के साथ-साथ तत्त्वों का वर्णन समाप्त हुआ । इन सात तत्त्वों में पुण्य और पाप मिलाने से 9 पदार्थ हो जाते हैं । उन पुण्य और पाप पदार्थों का कथन इस गाथा में बताते हैं―


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